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बेरोजगारी का सफर – हिंदी कविता

बेरोजगारी ने इतना समय लिया लंबा अब तो डिग्री लगे बस कागज का पन्ना कितने दिए इंटरव्यू कितने एग्जाम मिला ना अब तक कोई अच्छा काम अब तो प्राइवेट नौकरी भी मांगे एक्सपीरियंस देगा भला कौन पहला एक्सपीरियंस घिस गया चप्पल टूट गया जूता मिला नहीं फिर भी कोई काम ढंग का समझ नहीं

करुण कविता – नेक मुर्गा

करुण कविता – ‘नेक मुर्गा’ अपने मालिक की भूख से बेहाली देख मुर्गे की आंखों में आया पानी सोचा इसी घर में खाया चुग-चुग कर दाना आज मालिक के काम है आना भूख से दिन बीते हैं चार मालिक मेरा हुआ बीमार मालिक को मुझे बचाना है नमक का कर्ज चुकाना है सोच गया

उम्मीद की किरण – हिंदी कविता

हिंदी कविता शीर्षक – “उम्मीद की किरण” निराशा के घोर अंधेरे के बीच उम्मीद की एक किरण झिलमिलाती है वहीं किरण लौ फिर मसाल बन जीवन को जगमगाती है हे मानव हिम्मत ना हार समस्या करे प्रहार पर प्रहार खुशियां कदम चूमेगी तेरी लक्ष्य पर नजर तू डाल हर समस्या का समाधान उसके आसपास

कविता शीर्षक – “माता पिता की खुशी”

कविता शीर्षक – “माता पिता की खुशी” बड़े नाजों नखरे उठा माता पिता अपने बच्चों को पढ़ाते हैं वही बच्चे बड़े होकर के ऊंचे-ऊंचे ओहदे पाते हैं शादी विवाह के बाद वो अपने परिवार में खो जाते हैं ढूंढती होगी माता-पिता की नजर यह भी भूल जाते हैं जिन बच्चों की खुशियों के खातिर

आँसू – हिंदी कविता

कविता शीर्षक – “आँसू” आँसू के कई हैं रूप जैसे छाँव और है धूप कुछ खुशी के, कुछ गम के आंँसू होते हैं कुछ छलकते हैं, कुछ आँखों को नम करते हैं अत्यधिक खुशी पाकर भी आँखों से आँसू ढलक जाते हैं दर्द का फफोला फूट कर आँसू बनकर बह जाते हैं कुछ आँसू

पंछी की चाह – हिंदी कविता

भला कैद रहकर जीना कौन चाहता है , फिर वो चाहे इंसान हो या एक परिंदा। पिंजरे में कैद एक पंछी आखिर क्या सोचता होगा ? कुदरत ने उसे अनंत आकाश में उड़ने का वरदान दिया मगर इंसानी ताकतों नें उसे कैद कर अपना ग़ुलाम बना लिया। एक कैद पंछी की चाहत को बयां

माँ पर एक हिंदी कविता

माँ का होना हर बच्चे के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि बच्चे सबसे ज्यादा अपनी माँ के ही करीब होते हैं। नीचे लिखित पंक्तियाँ माँ की मत्ता और उसका अपने बच्चे के प्रति प्रेम व स्नेह को दर्शातीं हैं। प्रस्तुत है हिंदी कविता “माँ” जिसकी लेखिका हैं रीना कुमारी। हम बेटियाँ ओ मेरी माँ

हाय ये महंगाई – हिंदी कविता

जहां एक ओर इंसान शारीरिक रूप से कमजोर होता जा रहा है तो उसके उलट महंगाई और अधिक मजबूत होती जा रही है। इंसान की उम्र भले लंबी हो न होने परंतु महंगाई विगत कई वर्षों से लंबी होती जा रही है। पखेरू पर आज की कविता का शीर्षक “हाय ये महंगाई” इसी दशा