अभिव्यक्ति की आजादी Freedom of Expression और राष्ट्रहित – क्या राष्ट्र हमारे लिये कोई मायने नहीं रखता

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पिछले कुछ महीनों से देश के बड़े विश्वविद्यालयों में ‘राष्ट्रहित’ का मुद्दा गरमाया हुआ है जिसको लेकर ‘ABVP’ और ‘AISA’ छात्र समूह के बीच हिंसक झड़पें भी हुयीं हैं। क्या सच में Freedom of Expression राष्ट्रवाद से बड़ा है ? कहीं ऐसा तो नहीं अभिव्यक्ति कि आजादी की आड़ में हम अपने ही देश को नीचा दिखा रहे हैं ; अगर सच में हम ऐसा कर रहे हैं तो ये राष्ट्र का विरोध हुआ जिसकी माकूल सजा भी मुकर्रर की गई है संविधान में।

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जहाँ कई धर्म और जाती के लोग हैं जिसको एक सामान अधिकार भी हैं ऐसे में कोई Freedom of Speech की आड़ लेकर देश को ही कोसना शुरू कर दे तो उसे देशद्रोही कहना गलत नहीं होगा। फिलहाल कुछ मामले हमें ऐसे ही दिखने को मिले हैं जहाँ ‘भारत देश’ को चंद अपने ही लोगों द्वारा अपमानित होना पड़ा हो। देश एक Identity है देश के बिना इंसान की कोई पहचान नहीं फिर भला हम ऐसे में कैसे अपने देश को अपमानित कर सकते हैं।

Freedom-of-expression-in-India

साल 2016 की शुरुआत राष्ट्रहित को लेकर अच्छा नहीं रहा – JNU में हुए विवाद को याद किया जाये तो वो सच में शर्मशार करने वाली घटना थी। जहाँ विद्यार्थी मुफ्त में शिक्षा लेते हैं आजाद घूमते हैं और आगे चलकर अच्छी नौकरी प्राप्त करते हों भला वहाँ कोई देशविरोधी नारे कैसे लगा सकता है। ABVP, AISA, NUSI, SFI जैसी तमाम छात्र संगठन जिनको अपने विश्वविद्यालय के campus तक ही रहना चाहिये वो अब देश के नेताओं की तरह मुख्य धारा की राजनीति में शुमार होना चाहते हैं। मुख्य धारा की राजनीति में आना कोई गलत बात नहीं पर उसके लिये उन्हें भी चुनावी प्रक्रिया से गुजर कर संसद तक आना होगा; अन्यथा वो अपने छात्र नीति के तहत ही राजनीति करें तो अच्छा।

मैं अगर चर्चा करूँ JNU में हुए विवाद कि जो मीडिया के अनुसार रहा वो था Umar Khalid और Kanhaiya Kumar की नारेबाजी। इसकी सत्यता क्या है ये मैं तो नहीं जानती मगर जो देश की मीडिया ने कहा उसके अनुसार Umar Khalid द्वारा कश्मीर की आज़ादी के पच्छ में नारे लगाना।

“भारत तेरे टुकड़े होंगे” , “कश्मीर को आजाद करो”, “हमें चाहीये आजादी आजादी” इन दिए गए नारों पर अगर गौर करें तो ये वाकई एक राष्ट्रभक्त को अखरते हैं मगर जो छात्र ये नारेबाजी कर रहे हैं उन्हें ये सिर्फ एक Freedom of Expression लगता है जो कि सरासर गलत है। Majority से अलग हटकर कुछ कहने में कोई गुरेज नहीं है परंतु देश की तो लाज रखें उसको अपने Freedom की भेंट ना चढ़ाएं। मैं उमर खालिद और कन्हैया कुमार जैसे विद्यार्थियों के बारे में बात नहीं करना चाहती पर छात्र संगठन केवल छात्रहित की राजनीति करें तो ही अच्छा , देश की राजनीति करने के लिए बहुत सारी राजनीतिक पार्टियाँ हैं जो ये काम कर रही हैं।

JNU विवाद अभी ठीक से सुलझा भी नहीं था कि दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुए ABVP व AISA के बीच झड़प नें एक बार फिर राष्ट्रवाद का मुद्दा गरमा दिया। मगर इसबार कहानी कुछ अलग है – AISA जो कि एक कम्युनिस्ट एवं मार्क्सवादी संगठन है जिसकी स्थापना सन 1990 में हुयी थी जो अब भारत के हर विश्वविद्यालय में अपनी पकड़ बना चुका है ऐसे में उसका बार बार ABVP से टकराव मन में एक शंका भी पैदा करता है। क्योंकि ABVP की स्थापना 1948 में हुयी और ये RSS एवं BJP की child body है जिसका खामियाजा ABVP को उठाना पड़ता है।

AISA उमर खालिद को लेकर इतनी व्याकुल और उतावली क्यों है खासकर जब उनपर Anti Nationalist का आरोप भी लग चुका है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि AISA बिना ‘उमर खालिद’ के ही दिल्ली के कॉलेज में अपना प्रोग्राम करे ? पूरे प्रसंग पे गौर फरमाया जाये तो AISA स्वयं ज्वलंत मुद्दे को उकसाना चाहती है जिसे ABVP उसके ऊपर पलटवार करे और लोगों के अंदर BJP, RSS, ABVP को लेकर रोष पैदा हो। जहाँ तक AISA की विचारधारा को देखा जाए तो ये वही विचारधारा है जिसनें पूरे बंगाल को मिट्टी में मिला दिया और अब तो केरल भी इससे काफी प्रभावित हो रहा है यानि मार्कसदी कम्युनिष्ट विचारधारा समाज को अलग थलग करती जा रही है। समाज और देश जुड़ता है राष्ट्रवाद से जिसकी पैरवी ABVP कर रही है ; पर बैद्धिक व उदारवादी लोग राष्ट्रवाद को ही झूठा मानकर बैठ गए हैं। अगर सच में ABVP गुंडा छात्रसंघ होता तो वह 1948 से लेकर आज तक मौजूद नहीं रहता।

आप सोच रहे होंगे कि मैं ABVP की पैरवी कर रही हूँ पर ऐसा नहीं है किन्तु झगड़े में दो पच्छ होते हैं और दोनों पच्छों को जाने बगैर हम एक को पाक साफ़ घोसित नहीं कर सकते। ये बात काफी हद तक सच्ची लगती है की ABVP एक वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी BJP की चाइल्ड विंग है ऐसे में वो एक soft target है। साफ़ शब्दों में मैं ये कहना चाहती हूँ कि अगर कुछ ऐसा है जो राष्ट्रद्रोह से जुड़ा है तो AISA उसे दरकिनार कर अपना काम करे जिससे उसका किसी से टकराव भी न हो और Freedom of Expression की आजादी भी बनी रहे। पर अगर राष्ट्रद्रोही, राष्ट्रविरोधी तत्वों को संग लेकर ही कार्य करना है तो फिर टकराव की स्थिति में AISA भी बराबर की दोषी है।

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