ऑटिस्म क्या है बच्चों में मानसिक विकार – कैसे पहचानें, Child Autism Spectrum Disorder Symptoms, Causes Treatment

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रोहित’ मेरे पड़ोस में रहने वाला 7 साल का बच्चा है। वह बाकी बच्चो से थोड़ा अलग है उसके दोस्त भी नहीं हैं और वह किसी से ज्यादा बातें भी नहीं करता है। लोगों के बीच जाने से घबराता है, स्कूल जाता है पर वँहा भी कुछ सीख नहीं पाता है और ठीक से बोल भी नहीं पाता है। उसी की कक्षा में एक और बच्ची है ‘रिया’ जो कि बहुत जिद्दी है बहुत ज्यादा शैतानी करती है , चीजों को तोड़ती फोड़ती रहती है और बहुत ही ज्यादा बोलती है। आपने भी अपने आस-पास या समाज में ऐसे कई बच्चों पर गौर किया होगा जो दिखते तो सामान्य हैं पर बाकि बच्चो से थोड़े अलग होतें हैं। जरुरी नहीं की ये बच्चे बाकि बच्चों से शांत (slow) या शैतान हों पर यह संभव है कि वे ऑटिस्म Autism नामक मानसिक समस्या से ग्रसित हों।

ऑटिस्म क्या है बच्चों में मानसिक विकार – कैसे पहचानें, Child Autism Spectrum Disorder Symptoms, Causes Treatment



क्या होता है ऑटिस्म What is Autism ?

ऑटिस्म बच्चों में होने वाला एक मानसिक विकार (mental disorder) होता है। यह मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला ऐसा विकार है जो बच्चों के सामाजिक व्यव्हार और संचार पर प्रभाव डालता है। इसे हिंदी में “आत्मविमोह और स्वलीनता” कहते हैं, जो नाम से ही स्पष्ट है स्वयं में लीन रहना । बच्चा इसमें बाहरी दुनिया से अनजान एक अपनी ही दुनिया में खोया रहता है । ऑटिस्म के लक्षण (symptoms of autism) बच्चे के जन्म से तीन साल तक के होने से पहले दिखाई देने लगते हैं । यह बच्चों कि बातचीत और दूसरों से व्यव्हार करने की क्षमता को सीमित कर देता है। ऐसे बच्चों में रिपीटिटिव बिहेवियर (repetitive behavior) देखने को मिलता है, ऐसे बच्चे एक ही काम को बार-बार दोहराते हैं । इस विकार में बच्चे का विकास सामान्य बच्चे की तुलना में बहुत ही धीमी गति से होता है ।

ऑटिज़्म एक स्प्रेक्ट्रम विकार है क्योंकि इसके लक्षण और विशेषताएँ बच्चों को अलग-अलग रूप से प्रभावित करती हैं। कुछ बच्चों में गंभीर समस्या आ सकती है और उन्हें मदद की ज़रूरत रहती है; जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो हल्की-फुल्की मदद के साथ स्वतंत्र रूप से अपना काम स्वयं ही कर लेते हैं।




मानसिक मंदता (mental retardation) के विकार जैसे कि ऑटिस्टिक डिसऑर्डर (autistic disorder) , व्यापक विकासात्मक अनिर्दिष्ट विकार (pervasive developmental disorder not otherwise specified (पीडीडी-एनओएस) और ऐसपर्जर सिंड्रोम (Asperger’s syndrome) को अलग-अलग विकारों के रूप में माना जाता था लेकिन अब ये सारे विकार एक साथ रखकर ही देखे जाते हैं और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम (autism spectrum disorder) विकार कहे जाते हैं।




क्या लक्षण हैं ऑटिस्म के what are the symptoms of autism ?

1 . बच्चों का बातचीत करने में दिक्क्त आना, बच्चे इसमें सामान्य रूप से बोल नहीं पाते हैं। कुछ बच्चे कुछ शब्दों को ही बोल पाते हैं और कुछ ना के बराबर बोलते हैं।

2 . ऑस्टिस्टिक बच्चे (autistic child) आँखों से आँखें मिलाकर बातचीत नहीं करते ये चेहरे के हाव-भावों को नहीं पढ़ पाते हैं कि आप उनसे क्या कह रहे हैं, ना ही आप उनके हावभावों को समझ पाते हैं।

3 . उन्हें किसी बात पर प्रतिक्रिया देने में अधिक समय लगता है।

4 . बदलाव इन्हे पसंद नहीं होता, एक ही काम को बार-बार दोहराना; सुने हुए या अपने सीखे हुए एक ही शब्द को बार-बार बोलना।

5 . ऑटिस्टिक बच्चे एक ही वस्तु या कार्य में उलझे रहते हैं तथा अजीब क्रियाओं को बार-बार दोहरातें हैं -जैसे, आगे-पीछे हिलना, हाँथ को हिलाते रहना, आदि।

6 . कभी–कभी किसी भी बात का जवाब नहीं देते या फिर बात को सुनकर अनसुना कर देते हैं। कई बार आवाज लगाने पर भी जवाब नहीं देतें हैं ।

ऑटिस्म कोई बीमारी नहीं है यह एक मानसिक अवस्था है (autistic mental disorder) जो बच्चों के मानसिक विकास को धीमा कर देता है। इस विकार को यदि हम शुरूआती अवस्था में ही पहचान लें तो काफी हद तक हम बच्चे की स्थिति में सुधार ला सकते हैं । बच्चो में जन्म से तीन साल तक होने के भीतर ही ऑटिस्म के लक्षण दिखाई देने लगते हैं आप इन लक्षणों को पहचान सकते हैं।

a. साधारण बच्चा जब 6 माह का होता है तब से ही वह अपनी माँ को पह्चानने लगता है उसके हावभावों के प्रति प्रतिक्रिया दर्शाता है। किसी आवाज को सुनकर उसकी ओर आकर्षित होता है, लेकिन ऑटिस्टिक बच्चा ऐसा नहीं कर पाता है।

b. सामान्यतः बच्चे बोले गए शब्दों को सुनकर धीरे-धीरे बोलना सिख जाते हैं परन्तु ऑटिस्टिक बच्चे या तो नहीं बोल पाते या अजीब-अजीब आवाजे निकालते लगते हैं।

c. सामान्य बच्चे माँ के दूर होने पर या अनजाने लोगों से मिलने पर परेशान हो जाते हैं परन्तु ऑटिस्टिक बच्चे किसी के भी आने या जाने से परेशान नहीं होते। ऑटिस्टिक बच्चे अपनी दिक़्क़तों के प्रति कोई क्रिया नही करते तथा उससे बचने की कोशिश भी नहीं करते।

d. सामान्य बच्चे पारिवारिक लोगो से मिलने पर मुस्कुरातें हैं पर ऑटिस्टिक बच्चे कोई प्रतिक्रया नहीं देते हैं वो अपनी ही किसी दुनिया में खोये रहतें हैं ।

e. इन बच्चो में अधिकतर कुछ विशेष बातें होती हैं जैसे इनकी किसी एक इन्द्री का तीव्र होना। कभी-कभी इन बच्चो में हाइपरएक्टिविटी (hyperactivity) दिखाई देती है।

इस तरह के बच्चों के लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। डॉक्टर से सही सलाह लेनी चाहिए, आटिज्म एक आजीवन रहने वाली अवस्था है जिसे पूरी तरह से ठीक तो नहीं किया जा सकता पर सही डॉक्टरी सलाह पर बच्चों को सही से समझाकर उनके आसामन्य लक्षणों में सुधार लाया जा सकता है।

गंभीर मानसिक मंदता (mental retardation) और ऑटिस्म (autism) में अंतर होता है। जो बच्चे मानसिक रूप से दुर्बल होते हैं वह social support के अभाव की वजह से उदासीन, भीड़ से अलग और अजनबी से दिखने लगते हैं। वे अपने कार्यो को करने के लिए अपनी मानसिक उम्र के सहारे वयस्कों से ख़ुद को जोड़ते हैं और उस भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो वे दूसरों के साथ संचार के लिए करते हैं। ऑटिस्टिक बच्चों की अपनी क्षमताएँ और प्रतिभाएँ होती हैं। ये थोड़े धीमे होते हैं और खुद को सामजिक रूप से लोगो से जोड़ नहीं पाते ना ही उनसे संचार स्थापित कर पाते हैं। हमें उनके सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और बच्चे को उन्हीं पहलुओं का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

क्यों होता हैं ऑटिस्म what causes autism ?

21 वीं सदी में medical science ने बहुत तरक्की की हैं फिर भी आटिज्म के कारणों का सही रूप से पता नहीं चल पाया हैं । इसके कुछ संभव कारण इस प्रकार हैं :

(i). वैज्ञानिकों को संदेह हैं कि एक दोषपूर्ण जीन एक व्यक्ति में ऑटिज़्म विकसित करने की अधिक संभावना पैदा कर सकता हैं (gene mutation is that when a DNA gene is damaged or changed in such a way as to alter the genetic order carried by that gene.)

(ii). कुछ मामलों में, ऑटिस्टिक व्यवहार का कारण गर्भवती माँ में रूबेला (जर्मन खसरा)का होना भी हो सकता हैं । बच्चे के जन्म से पहले गर्भवती महिला को और जन्म के बाद बच्चे को जरुरी टीके लगवाना बहुत जरुरी होता हैं ।

(iii). बच्चे के जन्म से पहले जरुरी जाँचों को ना कराना भी इसका कारण हो सकता हैं; गर्भावस्था के समय जाँच कराने से जन्म से जुड़े child defects की पहचान की जा सकती हैं।

(iv). गर्भवस्था के समय सही खान-पान का ख्याल ना रखना या माँ का किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होना।

(v). गर्भावस्था के दौरान अपने मन से अनुचित दवाइयों का सेवन करना।

(vi). दिमाग के विकास में रूकावट डालने वाले रसायनों का विकसित होना।

(vii). गर्भवस्था के अंतिम महीनो में ही बच्चे के दिमाग का विकास तीव्र गति से होता है। बच्चे का 9 माह से पूर्व जन्म लेना (premature birth) भी ऑटिस्म का कारण माना जाता है क्योकि यह बच्चों के दिमागी विकास में रूकावट डालता हैं।

ऊपर दिए हुए कारणों के कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं पर यह माना जाता हैं कि ये सभी कारणों द्वारा बच्चे आटिज्म का शिकार हो सकते हैं।




ऑटिस्म के प्रभाव effects of autism:

आज ऑटिस्म ने विश्वव्यापी रूप ले लिया हैं आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2010 तक 7 करोड़ लोग ऑटिस्म से ग्रसित हो चुके थे इससे प्रभावित लोगो की संख्या cancer, diabetes, AIDS के रोगियों से भी अधिक होती जा रही है। दुनियाभर में प्रति दस हजार में से 20 व्यक्ति इस रोग से प्रभावित होते है। ऑटिज्म महिलाओं के मुकाबले पुरूषों में अधिक देखने को मिला है, यानी 100 में से 80 फीसदी पुरूष इस बीमारी से प्रभावित हैं।

भारत में भी यह विकार व्यापक रूप से फ़ैल रहा है आंकड़े दर्शाते हैं कि 2016 तक भारत में 10 करोड़ से अधिक व्यक्ति इस विकार से प्रभावित हैं और disability की पिछले कुछ वर्षों में वृद्धि हुई है। रोग नियंत्रण और रोकथाम (सीडीसी) के मुताबिक, आज प्रत्येक 88 बच्चों में से एक ऑटिस्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (autism spectrum disorder) से पीड़ित है।

ऑटिस्म आजीवन रहने वाली अवस्था है इसका कोई इलाज नहीं हैं। हम प्रभावित व्यक्ति को उचित थेरेपी और उपचारों द्वारा उसके सही विकास में सहायता प्रदान कर सकते हैं। जैसा कि हम जान चुके हैं, आटिज्म के लक्षण बच्चो में 18 माह के होने तक दिखाई देने लगते हैं अगर हम शुरू से ही उन बच्चो में आटिज्म के उन लक्षणों को पहचान लें और उन बच्चों के बौद्धिक विकास की ओर ध्यान दें तो ऐसे बच्चों के मानसिक विकास को सही दिशा मिल सकती है। उपचार ऐसा होना चाहिए जिससे बच्चा स्कूल आने-जाने, सबसे घुलने-मिलने और पढ़ने-लिखने, सिखने और खेलने की अपनी योग्यताओं को समझ सके। बच्चा सामाजिक तौर पर खुल सके, सबसे हँस कर बातचीत कर सके। व्यस्क होने पर स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी बिता पाने में सक्षम हो सके । ऐसा बनाने में बच्चे के माता पिता के अलावा थेरेपिस्ट कि अहम् भूमिका होती है। थेरेपी का प्रभाव भी ऐसा हो कि उनके communication skill सही तरीके से develop हो सकें; उसका व्यव्हार सामाजिक तौर पर सामान्य हो जाये और उसके अजीब व्यव्हार में कमी आ जाय।

मनोचिकित्सक (psychologist ) की सलाह लेकर और उनकी थेरेपी या निर्देशों के अनुसार पालन कर बच्चे में प्रभावित लक्षणों को पहचानकर उनको सुधारने का प्रयास करें । ऑटिस्टिक बच्चे के माता-पिता को बहुत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है वह तनाव महसूस करते हैं। अधिकांश समय वह अपने बच्चों के साथ व्यतीत करते हैं जो कि जरूरी भी है। उनकी प्रत्येक जिम्मेदारी निभाना इतना आसान नहीं है खासकर बच्चों की माताओं के लिए यह एक बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य होता है। माताओं को अपनी दिनचर्या और बच्चे की स्थिति में संतुलन बना कर चलना पड़ता है। ऑटिस्टिक बच्चे के भाई-बहन को भी समझा दिया जाता है कि आपका विशेष भाई बहन है जिसे आपको प्यार से व्यव्हार करना है, उनकी मदद भी करनी है। हम अगर ऑटिस्टिक बच्चे को सही माहौल दें उनके विकास संबंधी सही विकल्प मुहैया करायें तो उनके विकास में काफी मदद मिल सकती है।

बच्चे के माता पिता क्या करें ?

>> ऑटिस्म के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करें।

>> रोज़ के सभी कार्यों के लिए योजना बनाएँ और नियमित रखें।

>> जिस प्रकार आटिज्म विकार से ग्रसित बच्चों के लक्षण अलग-अलग होते हैं उसी प्रकार उनके माता-पिता का अनुभव भी अलग होगा। अन्य अभिभावकों से बातचीत करें जिनके बच्चों को Autism की समस्या है, बच्चों के विकास से सम्बंधित उनके प्रयासों को जानें।

>> सायकोलॉजिस्ट (psychologist) की सलाह लें, समय-समय पर बच्चे के developments कि reports चिकित्सक को देते रहे जिससे वह आपको बच्चे के विकास से जुड़े सही दिशा निर्देश दे सके।

>> प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लें, वहाँ आप बच्चों के व्यव्हार में बदलाव लाने वाली विधियों के बारे में जान सकते हैं जिनका इस्तेमाल आप अपने बच्चे की कठिनाइयाँ दूर करने में कर सकते हैं।

>> अपने लिए समय निकालें अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत का भरपूर ख़्याल रखें।

IT IS VERY IMPORTANT TO AWARE ABOUT AUTISM DISORDER

भारत में आमतौर पर लोगो को अभी भी ऑटिस्म के बारे में जानकारी नहीं हैं पूरे विश्व में मानसिक विकारो में आटिज्म तृतीय स्थान पर है। ऐसे बच्चे अलग होते हैं पर ऐसा नहीं हैं की इनमे सुधार नहीं हो सकता। इनका नजरिया और समझ अलग होता है, संभवतः हर बच्चे के लक्षण भी अलग हो सकते हैं हमें उनकी social skills को improve करने में मदद करनी होगी और उन्हें समझना पड़ेगा ।अगर शुरुआत मे ही आटिज्म की पहचान कर ली जाए तो आगे उन बच्चों का जीवन सामान्य बनाया सकता हैं ।

पूरे विश्व में 2 अप्रैल ऑटिस्म दिवस (April 2nd as World Autism Awareness Day. It was first observed in 2008.) के रूप में मनाया जाता है। लोगों को इस मानसिक विकार के प्रति जागरूक किया जाता है । हम सभी को भी इस मानसिक विकार के प्रति जागरूकता फ़ैलाने का हर संभव प्रयास करना होगा ताकि नन्हे पुष्प के सामान प्यारे बच्चों का जीवन सुरक्षित रहे। वह सभी अच्छे भविष्य की ओर अग्रसर होकर अपना जीवन सामन्य रूप से व्यतीत कर सकें।

ध्यान देने योग्य बातें :

a) – 2 अप्रैल ऑटिस्म दिवस के दिन 2016 में, ऑटिसम स्पेक्ट्रम विकारों के निदान के लिए अखिल भारतीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान (AIIMS एम्स) ने एक autism application शुरू किया था इसमें लोग किसी भी smartphone पर Google Play store से आसानी से “Autism Spectrum Disorder – Diagnostic Tool App” डाउनलोड कर सकते हैं। यह App ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार के लिए बहुत उपयोगी है जिसके माध्यम से autism जैसी मानसिक समस्या को अच्छे से पहचाना जा सकता है।

b) – ऑटिस्टिक बच्चों के माता-पिता को विद्यालय में प्रवेश, यात्रा आरक्षण आदि के लिए प्रमाण पत्र जारी गया है। इस प्रमाण पत्र ऑटिस्म स्पेक्ट्रम विकार वाले बच्चों के लिए प्रमाणन का अनुमोदन भारत सरकार द्वारा किया है।

c) – ऑटिस्म हेल्पलाइन नंबर: +91 – 986839937

All India Institute Of Medical Science (AIIMS) नें एक ऑटिस्म हेल्पलाइन नंबर भी शुरू किया है। ऑटिस्म हेल्पलाइन का उद्देश्य माता-पिता को किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने में सहायता करना है ।




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  1. Sandip s. Kamble