ऐकल्लता भाग – 2, अनजानी भूल

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छोटे-छोटे पर्वत एक तरफ जंगल इलाका एक तरफ मैदानी इलाका दूर से देखने में ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी देवता ने इस गांव को बनाया हो। 25 से 30 मुसलमानों और सिक्ख रहते थे एक स्कूल जहां सिर्फ उर्दू की भी पढ़ाया जाता था। दो दोस्त निहाल सिंह और शौकत अली दोनों ने पांचवीं कक्षा तक गांव में पढ़ाई की।


आगे की पढ़ाई के लिए बहुत दूर स्कूल था लेकिन उन दोनों के मां-बाप का विचार था कि बच्चे इतनी दूर कहां जा सकेंगे; इस कारण दोनों ने पढ़ाई छोड़ दी। उन्होने सोचा की हमारे लिए इतना पढ़ जाना काफी है क्योंकि उस समय पढ़ाई ज्यादा नहीं कराई जाती थी खेती पर ही ध्यान दिया जाता था। अब वह दोनों खेती का काम करने लगे। कभी फुर्सत मिलती तो दोनों दोस्त खेतो में पेड़ के नीचे बैठ जाते और एक दूसरे का हाल चाल पूछते। वह अपनी पुरानी यादें ताजा करते और वो अध्यापकों की बातें करते निहाल सिंह ने बोला “जितनी शायरी उर्दू भाषा में चमक आती है, शायद ही किसी और भाषा आती हो। फिर अपने अध्यापक के कहे हुए बोल बोलने लगे।

“खुदी को कर बुलंद इतना कि हर
तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है”।

एक रोज की बात है, निहाल ने शोकत से पूछा दोस्त “यह बात सच है कि तेलिया की बुढ़िया फातमा मर गई”
शोकत ने कहा – निहाल यह बिल्कुल सच है , निहाल ने फिर कहा “जब हम बच्चे थे तेलिया से जब हम सरसों का तेल खरीदने जाते, तब बुढ़िया जिस दिन तेल में बने हुए पकौड़े तलती सभी को अपने बच्चे समझकर पकौडे देती। बच्चों को पास बुलाकर प्यार से समझाते कि बुरा क्या है और अच्छा क्या है।

निहाल ने कहा – उसका मर जाना बहुत बुरी बात है।
निहाल और शौकत दोनों की शादियां हो चुकी थी, दोनों के बच्चे भी हो गए थे। शौकत की तो पड़ोस में ही पर प्रेम प्रसंग से शादी हो गई। निहाल की शादी दूसरे गांव मे हो गई। लेकिन उनकी दोस्ती में कोई भी अंतर ना आया। जब भी उनको काम से फुर्सत मिलती वह कभी-कभी खेतों में मिलते और कभी-कभी घर में एक दूसरे के चले जाते।

अनजानी भूल हिंदी कहानी

एक बार मिले तो निहाल ने कहा “शौकत मैंने किसी से सुना है कि तू भी राइफल लेकर आया है”। शौकत ने कहा “अब्बू का कोई तीसरे गांव का सईद अली जाति का उच्च अधिकारी पहचान वाला है, उसने अब्बू का लाइसेंस बनाकर राइफल मोल ले ली है। सईद ने कहा” निहाल यह किसी को मारने के लिए नहीं है, जो हम रातभर जागकर फसलों की राखी के लिए कुत्ते साथ में ले जाते हैं, वो नही अब ले जाएगे, शाम को एक गोली चला दिया करेंगे, जंगली जानवर गोली से डर कर भाग जाएंगे”। शोकत ने निहाल से बात की रात को बाघ हमारे कुछ लोगों की बकरी उठा ले जाते हैं वह किसी से नहीं डरते। इसके एक खड्कं से डरकर भाग जाएगे। “अरे किसी की जान लेने का हम को थोड़ी हक है, जान तो वही ले सकता है जिसने पैदा किया है। निहाल ने कहा “शौकत ये अगर जान चल उठी, जो जानबूझ कर गलती करता है। उसको बहुत सजा मिलती है उसकी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे कटती है। दोनों दोस्त घर लौट जाते हैं”।


बहुत दिन बाद बीत गए, देशों के बंटवारे की बात चलने लगी। मुस्लिम हिंदुओं को नफरत की निगाह से देखने लगे। निहाल और शौकत के गांव में ऐसा कुछ था कि कोई किसी को नफरत करें। कोई मुसलमान नहीं चाहता था कि हिंदू जहां से चले जाएं और ना ही सिख जाना चाहते थे। उनकी मजबूरी थी जो आठ-दस सिक्खो के थे उन्होंने एक साथ मन बना लिया कि हम हिंदुस्तान के हिस्से में चले जाएंगे। उसी रोज निहाल अपने दोस्त से मिलने गया, हाल कहने लगा “दोस्त हम कल जा रहे हैं”। शौकत ने कहा “तुम सभी रुक जाओ, तुम्हें क्या खतरा है”। निहाल ने कहा “जब सभी जा रहे हैं तो हम कैसे रूक सकते हैं।

शौकत ने निहाल को ‘खुदा हाफिज’ कहा और विदाई दे दी साथ में यह कह दिया “दोस्त पूरी जिंदगी हम तुम्हें याद रखेंगे”।
दिन के 4:00 बज चुके थे…..

सभी सरदार बैल गाड़ियां के ऊपर थोड़ा सामान लेकर हिंदुस्तान की ओर चल दिए।
जब आठ दस मील आगे बढ़े तो शाम हो गई, सभी ने अपनी अपनी बैल गाड़ियां खड़ी कर दी। बुजुर्ग कहने लगे हम देखभाल करेंगे रात में बच्चें और स्त्रियों सो जाएंगी।

इतने में निहाल की चाची ने कहा “निहाल हमरे पशुओं के कमरे में एक कोने में 500 चांदी के सिक्के द्वबे हुए रह गए हैं, ज्यादा तू रख लेना आधे मेरे को दे देना, अपने आगे कहीं काम आएंगे”। निहाल की औरत ने निहाल को रोकना चाहा “चाची ये नहीं जाएगा”। चाची आगे से कहा “वहां कौन हमारा दुश्मन है, अभी तो हम ज्यादा दूर नहीं आए हैं, गांव में सभी तो निहाल सिंह को जानते हैं”।

यह बात सुनकर निहाल ने चाची की बात मान ली। अपने सभी साथियों को छोड़कर निहाल गांव वापस लौटा आया। ज्यादा अंधेरा नहीं था लेकिन दूर से पहचाना भी नहीं जा सकता था की कौन है ? निहाल नें वहाँ जाकर पैसे निकाल लिए, अब वह पैसे लेकर वापस आ रहा था। गांव में सन्नाटा था, अचानक एक औरत की आवाज आई सरदार ! सरदार ! गांव के कुछ लोग बाहर निकल आए। शौकत ने निशाना लगा कर गोली चला दी।



गोली निहाल के सीने में लगी और निहाल ज़मीन पर गिर गया। दो-तीन मिनट कोई भी उसके पास नहीं गया। थोड़ी देर बाद किसी ने हिम्मत करके पास जाने का साहस किया और पहचान कर बोलने लगे अरे यह तो निहाल है ! अब सभी निहाल के आजू-बाजू लोगो के होश उड़ गए। शौकत ने जाकर निहाल के शरीर को पकड़ लिया। शौकत रोता हुआ कहने लगा “दोस्त तूने मुझे पहले बता दिया होता कि मैं निहाल हूँ”।

अब निहाल की सांस साथ छोड़ चुकी थी। हर तरफ सन्नाटा छा चुका था, पूरा गांव रातभर सो ना सका सुबह हुई तो निहाल का संस्कार किया जाने लगा।
शौकत की जिंदगी मानो जिंदगी ना रह गई हो। वह उदास रहने लगा कभी निहाल के बच्चों के बारे में सोचता कभी सोचता के बिना बाप के बच्चे कैसे रह सकते हैं।

शौकत इस पश्चात पूरी जिंदगी नहीं भूल सका।
क्या धर्मों के झगड़े दोस्तों की जान लेने पर भी मजबूर कर सकते हैं ?
इंसान के पास इतनी सोच होने पर भी वह समझ नहीं सकता कि इसका नतीजा क्या होगा ?
पशुओं का कोई धर्म नहीं होता पर इन्सानो ने बना दिए हैं तो लड़े झगड़े ही क्यों ?

लेखक:
संदीप कुमार नर

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