हिंदी कहानी – एक झूठा ख्वाब

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दिनभर की थकी-हारी बेचारी कान्ता, ज्यों ही शाम खाट पर लेटी आँख लग गयी
कितना शांत होता है गांव का वातावरण, और रात तो बिल्कुल खामोश सी जान पड़ती है।

कहीं कुछ हलचल थी भी, तो सिर्फ हवाओं में
जो पेड़ों पर झूलते पत्तों से टकराकर शोर उत्पन्न कर रहे थे।

हाथों के कंगन, कानों की बाली, पैरों की पायल
जिनकी खनखनाहट कान्ता को यह अहसास दिलाती रहती थी
की वो एक दुल्हन है, अभी तो ब्याही गई है
आज खाट पर बदलती करवटों में भी, आभूषणों की खनक न थी
शायद उन्हें भी यह अहसास था कि कान्ता गहरी नींद में है।

अब तो चन्द्रमां भी अपनी आँखें बंद कर चुका
चाँदनी रात, काले अँधेरे से ढक गयी
खाट पर लेती कान्ता के चेहरे का भाव
उसके सोये मन में, उभरते हुए विचारों को प्रकट कर रहे थे।

कब कुड़माई हुई, कब ब्याह होया…पता ही न चला
भला जानूं भी तो कैसे
तीन बरस हो गए, मिलन तो हुआ नहीं
इक फौजी से ब्याह करण नू की फायदा
दलबीरे….
एक हल्की सी आवाज़ निकली…कब आवेगा।

शांत व ठहरे से वातावरण में
अचानक एक खलल सी जाग उठी
सुना है, कल रात सरहद पर कई फौजी मारे गये
हाँ सुना तो मैंने भी है।

इक काम कर, जरा दलबीरे का हाल लै-आ
पूछ तो कैसा है….
जा पूछ जरा…कैसे भी, मुझे बेचैनी सी हो रही है
प्रा…जी, खबर है, मारे गए जवान दलबीरे के साथी थे..पर !
दलबीरा नू कुछ पता नहीं चला।

हाय, मेरा तो दिल बैठा जा रहा है….
कुछ कर पुत्तर..!
खबर ले आ, मेरे दलबीरे नू।

घर के आँगन में शोर और
रोने की आवाज़ें आने लगीं
कान्ता की मांग का सिन्दूर
बदन की तपिश के साथ पिघलने लगा
लाल रंग के सिन्दूर की धार
गोरे गाल पे, खून के कतरों के समान जान पड़ती थी
मन की बेचैनी के साथ, कान्ता का गला सूखा जा रहा था।

तभी, बिजली सी फुर्ती लिए कान्ता
द्वार पर लगे किवाड़ से जा टकराई
खोला तो देखा…
बाहर सुगंधित हवा बह रही थी
चिड़ियों की चहक कान्ता के कानों में पड़ी।

वह गहरी नींद से जाग उठी
खुद को किवाड़ पर टेकते हुए
उसे यह ज्ञात हुआ
ख्वाब था शायद……एक झूठा ख्वाब
दलबीरे का वो अब भी इंतज़ार कर रही है।

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा

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