प्रयागराज पर्यटन स्थल – प्रमुख स्थान, क्या देखें कहाँ घूमें प्रयाग में

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देश में इन दिनों प्रयागराज की ही चर्चा हो रही है जिसका कारण है 2019 के जनवरी माह में आयोजित होने वाला अर्द्धकुंभ। कुंभ विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है जो केवल हिन्दू धर्म से जुड़ा है। अगर आपने कभी अर्द्धकुंभ या फिर कुंभ दर्शन नहीं किये तो 2019 अपने हाथ से न जानें दें। भारत की संस्कृति और हिन्दू धर्म की सभ्यता को करीब से जानने व पहचानने का इससे अच्छा अवसर नहीं प्राप्त हो सकता।

पखेरू पर आज का विषय अर्धकुंभ नहीं बल्कि प्रयाग के अन्य प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जिसके बारे में आपको जरूर जानना चाहिए। चलिए आज उन सभी tourist destinations की चर्चा एक एक कर करते हैं और बताते हैं कि Prayagraj मात्र कुंभ के लिए ही नहीं अपितु अपने अन्य खासियतों के लिए भी प्रसिद्ध है।

1 – Allahabad Fort इलाहबाद क़िला:

प्रयागराज क़िला इलाहबाद फोर्ट

अब आप इसे प्रयागराज क़िला भी कह सकते हैं। आपको बता दें की ये किला मुग़लिया सम्राट अकबर द्वारा बनाये गए 5 क़िलों में से एक है। इस Fort का निर्माण 16वीं शताब्दी में करवाया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार अमूमन तौर पे इस क़िले को आम पब्लिक के लिए हमेशा नहीं खोलती क्योंकि अब इस विशाल क़िले का अधिकांश हिस्सा सेना के हवाले कर दिया गया है। मगर माघ मेला, अर्द्धकुंभ और कुंभ के अवसर पर इस क़िले को आम जनता के लिए खोला जाता है। यह किला प्रयाग नगरी के संगम तट पर स्थित है, ऐसा कहा जाता है की सम्राट अकबर ने इस क़िले को संगम तट बनवाने की ही इच्छा जाहिर की थी। गंगा किनारे यह क़िला अब पहले जैसा खूबसूरत तो नहीं मगर अपने इतिहास का गवाह है। इस क़िले के अंदर एक ऐसा वृक्ष है जिसे ‘अक्षयवट’ के नाम से जानते हैं यहाँ आने वाले आगंतुकों के लिए अक्षयवट भी दर्शन का एक बड़ा केंद्र है। प्रयाग स्थित इस अक्षयवट को भारतवर्ष के चार पौराणिक पवित्र वटवृक्ष में से एक माना जाता है।

2 – Triveni Sangam संगम घाट:

संगम घाट नाव यात्रा प्रयागराज इलाहबाद

अब क़िले की बात हुयी है तो संगम की बात करना भी जरूरी है। तीन नदियों गंगा, जनुमा और सरस्वती के मिलाप को ही संगम कहा जाता है। तीन नदियों का यह अद्भुत मिलाप केवल प्रयाग में ही होता है जिस वजह से इस शहर की मान्यता और अधिक बढ़ जाती है। गंगा और जनुमा को आप अपनी आँखों से बहता हुआ देख सकते हैं जहां सफ़ेद और हरे रंग का पानी स्पष्ट दिखाई देता है, मगर सरस्वती के सन्दर्भ में यह मान्यता है की वो नदी अदृश्य है और अदृश्य रूप में गंगा जनुमा से मिलती है। तीन नदियों के इस सामूहिक मिलाप को ‘त्रिवेणी’ के नाम से पुकारा जाता है, यहाँ तक की प्रयागराज को भी त्रिवेणी कहा जाता है। अगर आप संगम के बीच घूमना चाहते हैं तो यहाँ घाट पर उपस्थित नाविक उसकी यात्रा करवाते हैं। संगम एक प्रवित्र स्थल है, मान्यतानुरूप यहाँ स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ मेले अथवा कुंभ मेले में यहाँ लाखों की तादात में साधुगण और आम जनता एकत्रित होती है।

3 – लेटे हनुमान जी का मंदिर:

लेटे हनुमान जी का मंदिर प्रयागराज

इलाहबाद क़िला, संगम तट की बात हो गयी तो अब हनुमान जी की भी बात कर लेते हैं। जी, क़िले के पास ही एक मंदिर है जिसमें हनुमान जी की प्रतिमा भूमि पर ही बनी है। भारत का यह पहला ऐसा मंदिर है जिसमें बजरंगबली ज़मीन पर लेटे हुए हैं। इस मंदिर को बड़े हनुमान जी का मंदिर भी कहते हैं, ऐसा माना जाता है कि लंका दहन करने के उपरांत हनुमान जी ने यहाँ लेटकर विश्राम किया था। हनुमान जी की विशाल प्रतिमा ज़मीन के ऊपरी सतह पर न होकर एक गड्ढे के अंदर है। इसे देखने और पूजन करने के लिए प्रतिदिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता है।

4 – स्वराज भवन (आनंद भवन):

आनंद भवन-स्वराज भवन प्रयागराज

कभी आनंद भवन के नाम से प्रचलित यह हवेली अब स्वराज भवन कहलाती यही। भले ही आज ये पर्यटकों का केंद्र है किन्तु पूर्व में यह देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पैतृक घर हुआ करता था। आपको बता दें कि पैतृक घर होने का मतलब यह नहीं कि नेहरू यहाँ जन्मे थे किन्तु यह उनकी पारिवारिक हवेली थी। जवाहरलाल नेहरू का जन्म प्रयागराज अर्थात इलाहबाद के मीरगंज में हुआ था। इस आलीशान हवेली की खूबसूरती देखते ही बनती है; जहां नेहरू के अतिरिक्त महात्मा गाँधी, इंदिरा गाँधी और अन्य कांग्रेसी नेताओं के अलावा चर्चित राजनायिक व्यक्तियों का आना जाना रहा। अब यह विशाल हवेली एक म्यूजियम में तब्दील हो चुकी है जहाँ गाँधी परिवार से जुड़े तमाम किस्से व कहानियां दर्शाये गए हैं। अगर आप प्रयाग जाने की योजना बना रहे हैं तो यहाँ जाकर भारत के राजनीतिक इतिहास में झांकना उत्तम होगा।

5 – खुसरो बाग:

खुसरो बाग़ प्रयागराज

खुसरो बाग एक चारदीवारी से घिरा हुआ बग़ीचा है जहां 17वीं शताब्दी में मुग़लों द्वारा बनाये गये 4 मकबरे हैं। खुसरो, जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र था; 4 मकबरों में से एक मकबरा राजकुमार खुसरो का है और एक अन्य खुसरो की माँ ‘शाह बेगम’ से सम्बंधित है। तीसरा मकबरा खुसरो की बहन ‘नेसा बेगम’ ने बनवाया था किन्तु वह खाली है। चौथा व आखिरी मकबरा छोटा है और उसे टैमरलान के मकबरे के रूप में जाना जाता है। यह छोटा मकबरा क्यों था ! किस लिए था ! इसका रहस्य कोई नहीं जानता। मकबरे पर बनी सुंदर मेहराब, गुंबद और छत्रियों की नकाशी देखने के लायक हैं जो कहीं न कहीं इतिहास में झाँकने को मजबूर कर देती हैं।

6 – ऑल सेंट कैथेड्रल:

इलाहबाद ऑल सेंट कैथेड्रल प्रयागराज

प्रयागराज के सिविल लाइन स्थित सरोजनी नायडू मार्ग पर बना यह चर्च आकर्षित लगता है। इसका आकर्षण से भरा डिज़ाइन ब्रिटिश वास्तुकार सर विलियम एमर्सन द्वारा सन 1870 में किया गया था। All Saints Cathedral नाम से प्रसिद्ध यह सुन्दर चर्च जिसे प्रयागराज के स्थानीय निवासी पत्थर गिरिजा घर के नाम से पुकारते हैं। संगमरमर की वेदी पर किया गया सघन कार्य, ग्लास पैनल और अन्य लुभावनी कलाकृतियां आपको सोचने पर विवश कर देंगी।

7 – Alfred Park अलफ्रेड पार्क:

इलाहबाद अलफ्रेड पार्क चंद्रशेखर आज़ाद उद्यान प्रयागराज

भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े सिपाही ‘चंद्रशेखर आजाद’ जी ही थे। अपने बेखौफ अंदाज से फिरंगियों के पसीने छुड़ा देने वाले इस वीर सेनानी नें अलफ्रेड पार्क में ही अपना दम तोड़ा था। चंद्रशेखर आजाद अंग्रेज़ों के हाथ नहीं लगना चाहते थे; अतः जब वे अंग्रेज़ों से लड़ते हुए घिर गए तो उन्होंने स्वयं को अलफ्रेड पार्क स्थित एक पेड़ के नीचे बैठकर गोली मार ली। आज़ाद जी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे वीर क्रान्तिकारियों के अगुआ रहे। आज इस पार्क को चंद्रशेखर आज़ाद पार्क कहकर पुकारा जाता है जहाँ एक पब्लिक लाइब्रेरी भी है। इस पर में जाने के लिए कोई शुल्क नहीं है, आम जनता अक्सर यहाँ आया जाय करती है। आज़ाद जी के स्मारक पर पहुंचकर कुछ देर के लिए आप सेनानियों की दुनियां में खो जायेंगे।

Travel और Tourism के लिहाज से Prayag एक उत्तम स्थान है। अगर आप इतिहास, धर्म जैसे विषयों पर रूचि लेते हैं तो यहाँ आकर आपको परम आनंद प्राप्त होगा। यह शहर भारत के प्राचीनतम शहरों में से एक है जिसका जिग्र वेदों पुराणों में भी देखने को मिलता है। ऊपर दर्शाये 7 पर्यटन स्थलों के अलावा प्रयाग में कई अन्य छोटे-छोटे tourist destinations हैं जहां आप घूम सकते हैं।

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा

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