म्यांमार रोहिंग्या मुसलमान-अत्याचार पर विश्व राजनीति और भारत की उलझनें

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इन दिनों म्यांमार के “रोहिंग्या मुस्लिम” लोगों का विवाद पूरे विश्व में छाया हुआ है। भारत हमेशा ही रोहिंग्या प्रवासियों से दूरी बनाता आया है पर देश में मौजूद रोहिंग्या समुदाय के लोगों नें सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल की है। रोहिंग्या लोगों के अलावा देश में मौजूद कुछ मुस्लिम संगठन और अन्य राजनीतिक दल भी रोहिंग्याओं के पूर्ण बहिष्कार से सहमत नहीं हैं। केंद्र सरकार नें रोहिंग्या प्रवासियों को लेकर अपना हलफनामा उच्चन्यायालय में दाखिल करते हुए ये तर्क दिया की “रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं अतः उन्हें भारत में रहने की इज़ाज़त न दी जाय“। सरकार नें यह भी कहा कि देश में पहले ही 40,000 से अधिक की तादात में रोहिंग्या मुसलमान हैं जिसमें से कई अवैध तरीके से रह रहे हैं। वहीं रोहिंग्याओं व उनका साथ देने वाले लोगों का कहना है की रोहिंग्या अभी म्यांमार में मुकदमें का सामना कर रहे हैं इस हालात में उन्हें वापस भेजना मानवाधिकार अथवा विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करने के समान है। केंद्र सरकार के द्वारा दाखिल किये गए हलफनामे का जवाब देते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नें कहा कि – ” हो सकता है कुछ रोहिंग्या मुसलमान आतंकवादी हों, कुछ अन्य आपराधिक गतिविधियों में सम्मिलित हों पर कुछ के आधार पर सबको एक कटघरे में डाल देना ठीक नहीं “। फिलहाल हालात ये हैं कि, केंद्र सरकार रोहिंग्याओं को वापस भेजने पर अडिग है और सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे पर चर्चा सुप्रीमकोर्ट नें 3 अक्टूबर तक टाल दी है।

एक नजर रोहिंग्याओं पर:

रोहिंग्या प्रवासियों की बात हाल फिलहाल की नहीं है, यह खुद में एक बड़ा इतिहास है जो मुख्यतः बर्मा और बांग्लादेश से जुड़ा हुआ मसला है। एक ओर रोहिंग्या स्वयं को म्यांमार के रखाइन राज्य का निवासी मानते हैं वहीँ बर्मा सरकार और वहां के इतिहासकारों का कथन है कि रोहिंग्या मूलतः बांग्लादेशी मुस्लिम हैं। बर्मा की सरकार व् इतिहासकार रोहिंग्या शब्द को पहचानने से साफ इंकार करते हुए यह दावा करते हैं की 1824-1948 के ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान और बाद में बंगाल से म्यांमार में स्थित रखाइन राज्य में रोहिंग्या मुस्लिम आकर बस गए। हालांकि, म्यांमार के बाहर अधिकांश विशेषज्ञों का मानना हैं कि 15वीं शताब्दी से या 15 वीं शताब्दी के पहले अथवा बाद से ही रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार के रखाइन राज्य में रह रहे हैं। बाहरी विशेषज्ञ रोहिंग्या को बांग्लादेश से आये हालिया अप्रवासी कहने की बात से असहमति जताते हैं। वर्तमान परिवेश की बात करें तो म्यांमार में 8 से 11 लाख की तादात में रोहिंग्या रह रहे हैं जिसमें से तकरीबन 80 प्रतिशत केवल रखाइन राज्य से आते हैं। रोहिंग्या मुख्य रूप से दो उत्तरी टाउनशिप में रहते हैं रखाइन राज्य – मोंग्डा और बथिदाँग बांग्लादेश की सीमा के साथ। पिछले कई वर्षो से लेकर अब तक रखाइन राज्य में रहने वाले बौद्ध समूह और रोहिंग्या समूह के बीच हिंसक घटनाएं एक नियमित दिनचर्या जान पड़ती है।

पहचानते हैं म्यांमार को (बर्मा):

म्यांमार जातीय रूप से विविध देश है ठीक भारत की तरह; 135 आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त जातीय समूह हैं और कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अज्ञात हैं जिनमें रोहिंग्यायी शामिल हैं। अधिकांश जातीय समूह ‘बर्मा’ है, जो जनसंख्या का 68% हिस्सा बनाते हैं (म्यांमार के सभी नागरिकों को संदर्भित “बर्मीज़” शब्द से जाना जाता है) । बर्मा समूह के लोग जो वहां के नागरिक हैं, मुख्य रूप से देश के केंद्रीय भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं। अन्य नस्लीय समूहों, जैसे काचिन, चिन, रखाइन, शान, और अन्य, मुख्य रूप से देश के बाहरी सीमा क्षेत्रों में रहते हैं, जिन्हें फ्रंटियर क्षेत्र भी कहा जाता है। इन अल्पसंख्यक जातीय समूहों में से कई पड़ोसी देशों के साथ म्यांमार की सीमा के दोनों किनारों पर रहते हैं।

संजाति विषयक:

बर्मन – 68% , शान – 9% , करेन – 7% , रखाइन – 4% , चाइनीज – 3% , इंडियन – 2% , मोन – 2% और अन्य – 5%

1885 में अंग्रेजों ने बर्मा का उपनिवेश किया और 1948 में स्वतंत्रता हासिल की । ​​1962 में एक तख्तापलट ने सरकार के नियंत्रण में सेना को रखा । हालिया सुधारों ने सेना के प्रभाव को कम कर दिया है, हालांकि,1962 के तख्तापलट के बाद से अब तक राजनीति में सेना नें एक प्रमुख भूमिका निभाई है। हाल ही में, सरकार ने लोकतांत्रिक और आर्थिक सुधारों को लागू किया है, जो दुनिया के बाकी हिस्सों से कुछ हद तक सुधार के संबंध में हैं ।

बुद्धिज़्म (बौद्ध धर्म):

आज, म्यांमार की जनसंख्या 89% बौद्ध है। लगभग सभी बर्मा बौद्ध हैं, जबकि अधिकांश गैर-बौद्ध अल्पसंख्यक जातीय समूह का हिस्सा हैं। बर्मा की राष्ट्रीय पहचान हमेशा बौद्ध धर्म के साथ घनिष्ठ रूप से मिलती-जुलती रही है। उपनिवेशवाद से पहले, बौद्ध राजाओं ने बर्मा पर बहुत अधिक शासन किया उपनिवेशवाद के तहत, ब्रिटिश ने कई बौद्ध संस्थानों को कम किया, खासकर स्कूलों को; इसके बाद सामाजिक और आर्थिक लाभ बंद हो गया। बर्मा में मौजूद बौद्ध खूब आनंद लेते थे, गैर बौद्धों के प्रति शत्रुता पैदा करके। सैन्य सरकार ने बौद्ध धर्म को अपने अधिकार और वैधता को मजबूत करने के लिए उपयोग किया, बौद्ध धर्म और बर्मा की राष्ट्रीय पहचान को एक साथ बांधना यह मामला तब बना। जो भी सरकार का विरोध करता है वह बौद्ध धर्म का भी विरोध करता है।

म्यांमार में सभी धर्मों का प्रतिशत:

बुद्धिस्ट – 89% , क्रिस्चियन – 4% , मुस्लिम – 4% , एनिमिस्ट – 1% और अन्य – 2%

रोहिंग्या का इतिहास:

बर्मी सरकार अपने स्वयं के लक्ष्य को फिट करने के लिए रोहिंग्या को अक्सर एक बलि का बकरा के रूप में एकजुट करने के लिए उपयोग करती है बर्मी आबादी के तहत वह रोहिंग्या का तिरस्कार करती है । रोहिंगिया की नागरिकता की कमी के कारण प्रतिनिधित्व, अधिकार और स्वतंत्रता की कमी हो गई है।

रोहिंग्या वर्तमान में इस प्रकार है:

  • शिविरों और घट्टों में रहने के लिए मजबूर
  • बुनियादी मानव सेवाओं जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने से रोक
  • सरकारी नौकरियों से प्रतिबंधित, कार्यालय चलाने के लिए, और मतदान
  • सरकार द्वारा कड़ी मेहनत करने में मजबूर
  • सरकारी अनुमतियों के बिना शादी करने में असमर्थ, जो शायद ही कभी दिया जाता है
  • उनके पास होने वाले बच्चों की संख्या सीमित है

इन कठिन परिस्थितियों से ज्यादा परेशान करने वाली यह बात है कि बर्मा सरकार ने रोहिंग्या के लिए सहायता करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने लगभग 25,000 रोहिंग्या की सेवा की है जो आधिकारिक संयुक्त राष्ट्र शिविरों में रहते हैं। लेकिन रोहिंग्या अनौपचारिक शिविरों या यहूदी बस्ती, जहां उन्हें कोई मदद नहीं मिलती, ऐसी जगहों पर बहुत संख्या में रहते हैं। रोहिंग्या की स्थिति नाजी जर्मनी या रंगभेद युग दक्षिण अफ्रीका में यहूदियों का उल्लेखनीय रूप से याद दिलाती है।

रोहिंग्या बहुत मुश्किल स्थिति में हैं। इसमें से किसी के पास कोई अधिकार नहीं है और वे कहीं जा भी नहीं सकते। 2012 में हिंसा के बाद से, 87,000 से अधिक रोहिंग्या दूसरे देश में भाग गए हैं। 800,000 से अधिक रोहिंग्या म्यांमार में कठोर परिस्थितियों में रहते हैं, जबकि बांग्लादेश में 300,000 से अधिक लोग रहते हैं यहाँ भी उनकी स्थिति बेहतर नहीं है। अन्य लोग थाईलैंड, मलेशिया या इंडोनेशिया में हैं जहां वे रहने और काम करने में महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करते हैं।

रोहिंग्या मुस्लिम को भारत में पनाह देने से केंद्र सरकार का इंकार क्यों ?

भारत में 40,000 से अधिक रोहिंग्या रह रहे हैं जिसमें ज़्यदातर जम्मू व् जम्मू के साम्बा और कठुआ इलाके में रहते हैं। यह दोनों ही इलाके बेहद संवेदनशील हैं जो बॉर्डर से ज्यादा दूर नहीं है; चूँकि ये सभी सीमा से सटे इलाकों में रह रहे हैं इससे देश की सीमा सुरक्षा को खतरा है। दूसरी बड़ी वजह है Arakan Rohingya Salvation Army जिसका सरगना अता उल्लाह है। अता उल्लाह का जन्म कराची पकिस्तान और परवरिश मक्का की है, रोहिंग्या मुसलमानों का इस खतरनाक आतंकी सरगना से जुड़े रहना भी बड़ी वजह है इनके बहिष्कार की। वे रोहिंग्या जो बांग्लादेश के शरणार्थी कैंप में रह रहे हैं, सूत्र बताते हैं कि उनको पाकिस्तानी आतंकी सगठन आतंकवाद में इस्तेमाल कर रहे हैं; दूजी ओर सऊदी अरब का वाहिद ग्रुप इनको आतंकवाद की ट्रेनिंग भी दे रहा है। भारत सरकार इन्हीं तथ्यों को देखकर इनको अपनाने से इंकार कर रही है।

क्या है म्यांमार की परेशानी:

म्यांमार की सियासत और वहां के राजनीतिक हालात हमेशा भिन्न रहे हैं। म्यांमार की स्टेट काउंसलर “आंग सान सू की” को इस बात कर डर है कि रोहिंग्यों को अपने देश में मंजूरी दे देने से कहीं वहां की सेना के साथ मतभेद न पैदा हो जाय। म्यांमार में सेना राजनीतिक हस्तक्षेप रखती है, ऐसे में म्यांमार जो कोई बहुत बड़ा देश नहीं है वहां सेना विद्रोह उत्पन्न कर सकती है।

एक कारण यहाँ और भी है सेना के गुस्से का – गुजरे 25 अगस्त को कुछ अज्ञात लोगों नें हथियारों के साथ पुलिस के 24 कैंप पर हमला बोल दिया, यह घटना म्यांमार के रखाइन राज्य में ही घटी थी। इस घटना में 71 लोगों की मृत्यु हो गई और 9 पुलिसवाले भी मारे गए; कहा जाता है की इस हमले को अंजाम Arakan Rohingya Salvation Army आतंकी संगठन नें ही दिया था। इस संगठन की विचारधारा Rohingya Nationalism को लेकर है।

क्या कहना है म्यामांर की स्टेट काउंसलर ‘आंग सान सू की’ का:

आंग सान सू की, 1990 की नोबेल प्राइस विजेता हैं और अभी म्यांमार की State Counsellor हैं। उनका कहना है की हमने रोहिंग्या मुसलमान को खदेड़ दिया, हमें इंटरनेशनल कम्युनिटी से निकाले जाने का डर नहीं है। सू की ने कहा – म्यांमार जटिल राष्ट्र है, दुनियां हमसे उम्मीद करती है कि हम सभी चुनौतियों को कम से कम वक्त में हल कर दें। हमें अंदरूनी टकराव के करीब 70 सालों के बाद शांति और स्थिरता मिली है । म्यांमार ह्यूमन राइट्स वॉयलेशन का विरोध करता है आगे हम अमन कानून के लिए प्रतिबद्ध हैं।

भारत की उलझने:

यूनाइटेड नेशन राजनीतिक तौर पर भारत को रोहिंग्या मसले में शामिल करना चाहता है जबकि इतिहास में रोहिंग्याओं का भारत से कोई लेना देना नहीं है। चूँकि रोहिंग्या म्यांमार और बांग्लादेश से ही ताल्लुकात रखते हैं, भारत चाहता है की यह उनकी ही समस्या बनकर रहे। अतीत में भारत ने आतंकी गतिविधियों का बहुत ही सामना किया है और कहीं न कहीं अब भी कर रहा है, ऐसे में रोहिंग्या जैसी एक और समस्या को क्यों जन्म दिया जाय। आंकड़े बताते हैं की भारत में रोहिंग्याओं की संख्या कुल 40,000 के करीब है। यह तो आंकड़ें हैं, पर हो सकता है की उनकी संख्या और अधिक हो। यह सच है कि भारत रोहिंग्या मुसलमान पर होने वाले अत्याचार का विरोध करता है मगर उनको देश में पनाह देना उचित नहीं। वर्तमान केंद्र सरकार पहले से मौजूद 40,000 रोहिंग्याओं को भी देश से बाहर करना चाहती है जिसके विरोध में रोहिंग्या मुसलमानों सुप्रीमकोर्ट में अर्जी दाखिल की है।

भारत में हर विषय पर राजनीति होती है तो भला रोहिंग्या पर ना हो ये संभव नहीं। कांग्रेस समेत अन्य कई राजनीतिक दल रोहिंग्या से सहानुभूति रखते हैं; पर उनको यह मानना होगा की देश सुरक्षा सर्वोपरी है। देश में रहने वाले अपने भारतीय मुसलमानों का रोहिंग्याओं के साथ नाता जोड़कर कुछ नेता अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं। पर भारतीय मुस्लिम समुदाय को अब गुमराह नहीं किया जा सकता; देश का मुस्लिम अब समझदार है वह सदैव देशहित में खड़ा है।

 

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा

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