बच्चों से दूर होते माँ बाप – मतभेद का दोषी कौन ?

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किसी वृद्ध पुरुष और वृद्ध महिला को देखकर हमारे मन में उनके प्रति एक मोह उमड़ आता है। यह मोह तब और गहरा हो जाता है जब आपको पता चले कि इनका बेटा इनको अकेला छोड़ कहीं दूर शहर या परदेस में रहता है। बिना हक़ीक़त और सच्चाई को जाने समाज के लोग उसके बेटे बहु के बारे में गलत सोचने लगते हैं, उनका ऐसा मानना होता है की बच्चों ने ही उनको अकेला छोड़ा होगा।

किसी परिवार में बुजुर्गों के प्रति समाज के बाहरी लोगों की सहानुभूति लाजमी तो है किन्तु सच्चाई से कोसों दूर है। वृद्धावस्था में अकेला व असहाय बनकर माँ बाप का रहना शायद आपको उनके बच्चों के प्रति नफरत पैदा कर दे पर क्या स्थिति वही होती है जो आप या समाज के अन्य लोग सोचते हैं ? सिक्के के 2 पहलु होते हैं, जब तक दोनों पहलु आपस में मिलेंगे नहीं तब तक सिक्का नहीं बन सकता। अगर सिक्के पर केवल एक ही पहलु छपा हो तो वह समाज में अस्वीकार कर दिया जाता है अर्थात उसका कोई मोल नहीं होता।

भारतीय पारिवारिक ढांचें की हम बात करें तो यहाँ रिश्तों के बीच प्रेम व मित्रता का भाव न होकर छोटे-बड़े और लेन-देन का भाव होता है। पारिवारिक सदस्य आपस में केवल छोटे और बड़े होते हैं, छोटे-बड़े का चलन उम्र के एक निश्चित पड़ाव तक तो निभाया जा सकता है मगर अवस्था बढ़ने के साथ-साथ यह चलन एक कमजोर ईमारत के समान भरभराकर गिर जाता है।

पारिवारिक रिश्तों में गिरावट, दूरी, ईर्ष्या, नफरत व कुंठा का भाव समय के साथ जन्म लेने लगता है जिसके प्रमुख कारण हैं –

  • किसी अन्य परिवार व बच्चों से तुलना
  • किसी खास व्यक्ति की बातों का अनुसरण
  • बच्चों की बात को सच्चा न मानकर दूसरे पर भरोसा
  • कमाऊ बच्चों से सदैव वस्तु प्राप्ति की इच्छा
  • बहु को घर की नौकरानी तक सीमित रखना
  • दूसरे कि परिस्थिति समझने की बजाय अपनी ज़िद करना
  • अपने कद का दुरूपयोग और छोटे-बड़े का पैमाना
  • बच्चों पर सदैव हावी रहने की प्रवृत्ति
  • बच्चों पर हुक्म ज़माने का गर्व

परिवारों का सामूहिक व एकत्रित चलन टूटकर एकल परिवार में तब्दील हो जाने पर भी पारिवारिक सामंजस्य स्थापित न हो सका जिस कारण आज वृद्ध अकेला है और उसका बेटा अकेला है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि घर का बुजुर्ग हमेशा अपने बच्चों पर हावी रहने की कोशिश करता है बजाय कि वह बच्चों का सहयोगी बने ? Dominant Nature का होने में माता पिता स्वयं को गर्वान्वित महसूस करते हैं और वो ऐसा किसी के सामने भी कर देते हैं। छोटी उम्र के बच्चों की बात शायद अलग हो सकती है पर बड़े बच्चों पर हर वक्त हुक्म जमाना गर्व का विषय नहीं बल्कि माँ बाप की अज्ञानता है।

कुछ पहलु ऐसे भी देखने को मिलते हैं जहाँ माता-पिता अपने बच्चे की परेशानी को भी नज़रअंदाज़ कर परिवार के किसी अन्य सदय की बात को सही ठहराते हैं। कमाते हुए बच्चे अक्सर इस प्रकार कि स्थिति का सामना करते पाय जाते हैं। दूर स्थिति बेटे की कमाई के बारे में भी कई भ्रांतियां उनके मन में होती हैं जैसे – इतना कमाता है करता क्या है ? जब मांगो तब कहता है पैसा नहीं है ? पैसा उड़ा रहा है ? हमने तो 5000 में ही सब कर लिया..जरूर बीवी के बहकावे आ गया है, इत्यादि बातें उनके मन में घर कर जाती हैं। इस स्थिति से निपटने का केवल एक मात्र तरीका यह है की माता पिता अपने कमाते हुए बेटे की स्थिति के बारे में चर्चा करें। किन्तु ऐसा नहीं होता, बेटे कि स्थिति और उसके खर्च को समझने की बजाय घरेलु अथवा दूर के किसी रिश्तेदार की बातों में आकर माँ बाप बच्चे से झगड़ने पर उतारू हो जाते हैं।

नौकरी में क्या बाधायें हैं, वर्तमान समय में खर्च की क्या स्थिति है, बाहर बड़े शहर का जीवन एक गांव के जीवन से कितना भिन्न है, किस प्रकार की कठिनाईयां है और बेटा कैसे गुजारा कर रहा है जैसी बातें माता पिता के लिए कोई मायने नहीं रखती उन्हें बस उसकी ‘तनख्वा’ ही दिखती है। बेटे द्वारा कमाया जाने वाला धन माँ-बाप को बहुत ज्यादा जान पड़ता है, उनकी नज़र में वो पैसा इतना अत्यधिक है जिसे खर्च किया ही नहीं जा सकता। सदैव वस्तु प्राप्ति की इच्छा रखने वाले माता पिता को जब बेटे बहु से उक्त वस्तु प्राप्त नहीं हो पाती तो वह कुंठित हो उनकी अनदेखी शुरू कर देते हैं। परिवारों में कुछ ऐसी महिलायें और कुछ ऐसे पुरुष होते हैं जो एक हँसते खेलते परिवार को देख नहीं पाते अतः उसे तोड़ने का कार्य करते हैं। माता पिता का यह वैचारिक आभाव आज उन्हें अपने बच्चे से दूर कर चुका है।

आईये समझते हैं,

मोहनलाल और गायत्री देवी सकुशल अपने बेटे कौशल के साथ रह रहे हैं। बेटा कौशल अपने नाम के अनुरूप बेहद गुणी और आज्ञाकारी स्वाभाव का है। शिक्षा कि तो बात ही क्या करनी बेहद पढ़ा लिखा है और हालिया उसे मुंबई में नौकरी भी प्राप्त हो गयी है। घर में बेटे की नौकरी प्राप्ति को लेकर ख़ुशी का माहौल है।

कौशल की मुँहबोली दूर कि बुआ जिनका नाम कमला है, गायत्री देवी से कहते हुए अब तो बेटा नौकरी भी पा गया, ब्याह करने की तैयारी कर !

गायत्री देवी उत्तर देते हुए – हाँ दीदी सही कहती हो।

बेटा कौशल पीछे से बोला- क्या माँ
अभी तो मुझे 2 साल ठीक से नौकरी करने दे शादी बाद में करूँगा।

शादी ब्याह की बात पर अक्सर चार-पांच लोग बोलने वाले हो ही जाते हैं।
अरे सुन रहे हो मोहनलाल ?? फूफा जी आवाज़ लगते बोले –
तुम्हारा बेटा तो नौकरी पाते ही बदल गया !
कह रहा है कि अभी हम शादी नहीं करेंगे।

पिता मोहनलाल उत्तर देते हुए बोले –
उसकी क्या मजाल, हम बड़े हैं कि वो बड़ा है।

कौशल की बातों में कुछ गलत नहीं था मगर फिर भी छोटे और बड़े की पहली स्थिति उसे बता दी गयी। कौशल की मुंबई रवानगी को अभी साल भी न बीते थे, पिता मोहनलाल ने उसका का विवाह तय कर दिया। कौशल ने अपने पिता से कुछ साल का समय माँगा था पर उन्होंने उसकी एक न सुनी। बुआ कमला के अतिरिक्त परिवार की कुछ अन्य महिलायें विवाह को लेकर कौशल की माँ गायत्री देवी से निरंतर मिलने लगीं।

बुआ कमला कहते हुए –
सुन गायत्री, कौशल बेटा को बोल पैसा बचाकर लायेगा। पता है मेरे पड़ोस के दुबे जी का लड़का तो अपनी शादी का सारा खर्च खुद ही उठा लिया। अब होनहार बेटे ऐसे ही तो होते हैं, अपना कौशल भी तो बड़ा समझदार है।

कमला की बात सुनकर अगले दिन गायत्री देवी बेटे को फ़ोन पर कहती हैं – 1 साल हो गया तूने घर में 1 पैसा भी न भेजा, अच्छा सुन शादी की तैयारी हो रही है कुछ पैसे हों तो भेज और कुछ बचाकर भी लाना।

माँ की बातें सुनकर कौशल कहता है –
माँ मुझे नौकरी को 1 साल अभी होने वाला है, ऊपर से मैं गांव में थोड़ी हूँ जो मेरे खर्चे कम होंगे। नई नौकरी है बहुत ज्यादा पैसा थोड़ी मिलता है, कहां है इतना पैसा मेरे पास, मैं तो कह रहा था कि 2 साल कम से कम रुक जाओ।
फैसला घर के बड़े करते हैं छोटे नहीं…इतना कह गायत्री देवी ने बात बंद कर दी।

खैर, विवाह जैसे-तैसे संपन्न हुआ।
मोहनलाल और गायत्री देवी नव वधु को पाकर खासे उत्साहित थे। उधर कौशल को भी इतनी संतुष्टि थी कि चलो कम से कम लड़की पढ़ी लिखी तो है। विवाह की छुटियाँ पूरी कर कौशल पुनः अपने कार्यक्षेत्र मुंबई लौट गया किन्तु पत्नी, माता-पिता के साथ ही थी। नव वधु को देखने परिवार के अन्य सदस्य आते जाते रहे, इस प्रकार यह सिलसिला अगले कुछ महीनों तक चलता ही रहा। उधर कौशल पत्नी से फ़ोन पर बात कर लिया करता और घर जल्द आने की सांत्वना देता।

बुआ कमला एक दिन फिर आयी –

कमला को आया देख गायत्री देवी ने उनको मीठा और पानी पीने को दिया। मीठा हाथ से उठाते हुए कमला बोल पड़ी, बहु नहीं है क्या ?
गायत्री ने उत्तर देते हुए कहा – है तो यहीं दूसरे कमरे में।
अरे…जब बहु है तो मीठा पानी तू क्यों लायी ? उसे ही लाने को बोलती।

कमला, गायत्री से कहते हुए –
बहु के होते तू काम करेगी क्या ?
अभी से सिर पर मत चढ़ा। राधेश्याम की बहु को देखा है कभी ?
कोई चला जाय घर तो तुरंत उसके पैर छुयेगी, चाय-पानी देगी..अरे मैं तो उससे अपने शरीर की मालिश भी करा आती हूँ।
बात चल ही रही थी, तब तक बहु अवंतिका आयी और कमला के पैर छूते हुए बोली कैसी हैं बुआ जी..!
इतने में बुआ कमला, बात को टालते हुए बोल पड़ी – गायत्री तो तेरी ही बड़ाई कर रही थी बिटिया।

कमला जैसे अन्य परिवार के लोग और चंद बाहरी लोग अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन प्रतिदिन गायत्री देवी और मोहनलाल के सामने करते। उन तमाम लोगों की मनगढंत बातें सुनकर दोनों को यह लगता कि हमारे बेटे-बहु दुनिया के सबसे ख़राब बेटे-बहु हैं। बेटा कौशल जो बेहद सरल स्वाभाव का इंसान था वह अपने माता-पिता की मानसिकता में हुए इस परिवर्तन को भांप नहीं पा रहा था। बुआ कमला और फूफा जैसे लोग मोहनलाल-गायत्री देवी के ज्यादा करीब होते चले गए और उनकी बातों को सच मानकर अपने ही बेटे-बहु से बैर मोल लेते गये।

बुआ कमला ने, कौशल उसकी पत्नी अवंतिका और माँ पिता के बीच एक निश्चित दूरी बना दी।
समय का पहिया मानसिक टकरावों के साथ घूमता रहा और एक दिन कौशल अपने माता-पिता से लड़ पड़ा। कौशल के इस रूप को देखकर समाज के लगों ने माता-पिता की दुहाई देते हुए कहा- कि देखो कैसा लड़का निकला।
माँ बाप ने पढ़ा लिखा कर बड़ा कर दिया और ये आज उनसे लड़ झगड़कर अलग रहने जा रहा है। मोहनलाल और गायत्री देवी चूँकि माता-पिता थे अतः उनसे हर कोई हमदर्दी रखता मगर कौशल सबकी नज़र में खटक रहा था।

बुआ कमला – बार बार कौशल की कमाई कि चर्चा गायत्री से करती और फिर एक मनगढंत कहानी बनाते हुए कह देती कि देख गायत्री, मेरे घर के पीछे पांडेय जी का बेटा भी मुंबई में रहता है मगर घर कभी खाली हाथ नहीं आया। पिछले साल तो उसने अपनी माँ को दस हज़ार रुपये और सोने की चैन भी दी। साड़ी तो वो हमेशा ही लेकर आता है, तू कौशल को टोका कर कहां रखता है सारी कमाई।

बुआ कमला की यह बातें गायत्री देवी जैसी अतार्किक महिला को भ्रम में डाल देते और वह अपने बेटे की स्थिति अथवा कमाई को जाने बगैर उससे अनचाहे वस्तुओं की मांग करने लगती। बेटा कौशल जब अपने पिता मोहनलाल से बात करता तो वह भी उसके ऊपर दोषारोपण शुरू कर देते। माँ पिता की यह हरकत देख धीरे-धीरे कौशल एक मानसिक बेचैनी में रहने लगा।
कभी उसका मन करता कि वह नौकरी छोड़ गांव ही चला जाय तो कभी सोचता कि माँ बाप से ही सदा के लिए दूर हो जाय। मोहनलाल-गायत्री अपने बेटे बहु को त्याग कर दूसरों को अपना हितैषी मान बैठे थे, वे अपने बेटे की एक न सुनते और किसी अन्य व्यक्ति का हर कहना मानते।

कौशल को अपने घर से दूर अकेला रहते पूरे 5 साल गुजर चुके हैं।
पत्नी अवंतिका और अपने बेटे के साथ बैठा कौशल अभी भी यह सोच रहा है कि वो अपने माता-पिता को समझाये कैसे।

एक तरफ माँ गायत्री का यह सोचना कि उसका बेटा बहुत कमाता है, वह अन्य बेटों की तरह मुझे ढेरों तौफे नहीं देता।
दूजी ओर पिता मोहनलाल कि हर बात पर अपनी ज़िद्द करना बिना ये जाने कि इसका कौशल के जीवन पर क्या असर होगा या फिर कौशल की क्या इच्छा है। घर में कमला सरीखी अन्य महिलाओं का आना-जाना तेज़ हो चुका था जो मोहनलाल-गायत्री की मानसिकता ख़राब होने के पीछे सबसे बड़ा कारण था। किन्तु मोहनलाल-गायत्री अपनों को दुत्कार कर इनको ही सच्चा मान बैठे।

कौशल अब असल माजरे को जान चुका था, वह यह जानता था कि इस रामायण की असल मंथरा कौन है ! किन्तु वह रिश्तों के बड़े कद के तले दबा हुआ था, किसे कहे ? किसे बोले ?…समय और स्थिति देख उसने दूर रहना ही उचित समझा और सबकुछ भवष्य पर छोड़ दिया।

इधर घर पे बुआ कमला –
अरे गायत्री पता है, लल्लन प्रसाद के लड़के का तनख्वा 60 हज़ार हो गया है।
कल उसकी माँ ने मुझे बुलाया…सुना है 2 कठ्टे ज़मीन भी लिया है।
बड़ा ख्याल रखता है अपनी माँ का…

बुआ कमला…ने एक पूरा परिवार बर्बाद कर दिया।

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा

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