तुमसे पहले मेरी मैं हूं

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सहेलियों आज का मेरा यह लेख बेहद नारीप्रधान है। मेरी लिखी एक छोटी सी कविता मुझ जैसी सभी नारियों को समर्पित है। मुझे विश्वास है कि मेरी काव्य रचना प्रत्येक स्त्री को उसके अस्तित्व की याद जरूर दिलाएगी।

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शीर्षक – तुमसे पहले मेरी मैं हूं ..

तुमसे पहले मेरी मैं हूं, अब खुद पर बलिहारी हूं
हारी हूं मैं जग से अभी, पर खुद से नहीं मैं हारी हूं ।

मैं विशिष्ट हूं, मैं सूंदर हूं, अविरल मेरी मुस्कान है
रूप को मेरे देखो मत तुम, मेरा मन मेरी पहचान है ।

फूलों की खुशबू सी मैं, खुश रंगों की मैं जान हूं
संगीत के सारे स्वर भी मैं, मधुर मुरली का मैं गान हूं ।

रात्रि के चंद्रमा सी मैं, दिन का स्वर्णिम उजियारा हूं
बुझता हुआ दिप नहीं मैं, चमकता एक सितारा हूं ।

जल की शीतलता सी मैं, अग्नि का मैं ज्वार हूं
तरुवर की छाया हूं मैं, प्रकृति सा मैं प्यार हूं ।

मैं जननी हूं ममतामयी मैं, जीवन का आधार हूं
निश्छल मन और प्रेममयी मैं, जीवन का श्रृंगार हूं ।

जीवन के सभी चरणों मे, सदैव ही तैयार हूं
जो हूं मैं, जिस रूप में हूं, अब मुझको मैं स्वीकार हूं ।

मैं सहज हूं, मैं शक्ति हूं, मैं दृणसंकल्प विचारी हूं
एक सम्पूर्ण अस्तित्व हूं मैं, हाँ मैं स्वाभिमानी नारी हूं ।

तुमसे पहले मेरी मैं हूं, अब खुद पर बलिहारी हूं
हारी हूं मैं जग से अभी, पर खुद से नहीं मैं हारी हूं ।

आज मैं इस कविता के माध्यम से अपनी बात करना चाहूंगी । आज मैं प्रत्येक स्त्री की बात करना चाहूंगी। लड़की, स्त्री, महिला या नारी किसी भी नाम से पुकारा जाए हम विशेष हैं “हम स्त्री रूप नहीं हम स्त्री मन है” । हमे अपने स्त्री मन के अस्तित्व से जुड़े रहना होगा । हमें हमारे रूप में रहना ही हमे श्रेष्ठ बनाता है । जब हम जन्म लेते हैं तब से ही हमारी परवरिश इस प्रकार से की जाती है कि हमे सभी कार्यो में व सभी रूपों में Perfect होना है । एक अच्छी बेटी, एक अच्छी पत्नी ,एक अच्छी बहु और एक अच्छी माँ बनना या कहलाना ही हमारी सर्वोच्चतम जिम्मेदारी होती है ।

कुछ कमतर होना दोष कहला जाता है । परंतु सर्वोच्च Perfect होने की परिभाषा कौन निर्धारित करें ? या सभी रूपों में सबसे बेहतर होने का मापदंड क्या कहीं निर्धारित किया गया है ? और क्या किया जा सकता है ? जी नहीं !! नहीं किया जा सकता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने गुण व दोषों के साथ पूर्ण होता है और स्त्रियां भी। मैं हर उस स्त्री से यह कहना चाहती हूं जो स्वयं को एक सामान्य स्त्री समझती हैं की आप जिस रूप में हैं उस रूप में आप विशेष हैं, सफल हैं ।

हमारा सभी कार्यों में सबसे बेहतर बनना ही हमें सफल बनाएगा यह धारणा हमें कहीं ना कहीं कमजोर बनाती है । क्योंकि यहां हमारी तुलना अन्य से होती है कि कौन किससे बेहतर है । एक स्त्री की एक स्त्री से तुलना होती है, प्रतिस्पर्धा सर्वप्रथम हमारा हमसे ही होना चाहिए । स्त्री जीवन की सबसे पहली प्राथमिकता उसकी गृहस्थी होती है। जीवन मे बढ़ती जिम्मेदारियां, हमारे रिश्ते, हमारे बच्चे, हमारा परिवार हम स्त्रियों की दुनियां होते हैं पर अक्सर यह पाया जाता है हमारी इस दुनियां में हम स्वयं का अस्तित्व खोने लगती है।

सबसे बेहतर बनने की होड़ में सदैव ही हम खुद की तुलना अन्य स्त्रियों से करते हैं और हमारा आत्मविश्वास खोने लगता है । धीरे धीरे हम स्वयं ही अपने को महत्व देना भूल जाते हैं । हम अपनी क्षमताओं को भूल जाते है, हम स्वयं को अन्य में तलाशने लगते हैं । यही हमारी सबसे बड़ी गलती होती है हम अन्य में नहीं हम स्वयम में हैं। यहां हमे रुकने की जरूरत है, स्वयं को याद दिलाने की जरूरत है कि हम कौन हैं हमारा ‘स्त्री मन’ क्या है हमारी विशिष्टताएं क्या हैं।

यंहा जरूरी है हम खुद से जुड़े, कैसे ?

खुद को खंगालिये, अपनी ख़ूबियों को समझिये, अपनी रूचियों को अपने दैनिक जीवन में समय दीजिये । अपने लिए निर्णय लीजिये व उस निर्णय को महत्व दीजिये अपनी इच्छाओं का महत्व सबसे पहले आपके लिए महत्वपूर्ण होना चाहिए तब ही वह अन्य के लिए महत्वपूर्ण बनेगा । यह आपकी अपने प्रति जिम्मेदारी भी है। यदि आप कामकाजी ऑफिस महिला हैं तो भी अपने आप में विशेष हैं । यदि आप घर ग्रहस्थी संभालती हैं तो भी स्वयं में विशेष हैं। स्वयं को जब हम स्वीकार करेंगे तब ही अपनी कमियों को अपनी ख़ूबियों में बदल पाएंगे। जब आप स्वयं से जुड़ेंगे तभी जीवन से जुड़ पायेंगे, जब आप जीवन से जुड़ेंगे तो और अधिक सहज शांत व खुश रह पाएंगे। स्वयं से प्रेम करेंगे तब आप सदैव सकारात्मक रहेंगे और तब आप अपने सबसे सर्वश्रेष्टम स्तर पर होंगे।

अंत मे, एक ही बात कहना चाहूंगी कि हमारी बेटियों को, लड़कियों को एक ऐसी परवरिश की जरूरत है कि जिसमे हम उन्हें अन्य सभी रूपों में श्रेष्ठ होने से पहले यह सिखाएं की वह स्वयं जिस रूप में हैं उसी रूप में सर्वश्रेष्ठ हैं। वह हर कार्य में सक्षम हैं उनमे यह आत्मविश्वास जगाने की जरूरत है । उनकी स्पर्धा सबसे पहले स्वयं से है। अपनी खूबियों को, अपनी क्षमताओं को पहचान कर उनको श्रेष्ट नहीं सर्वश्रेष्ठ बनायें, तब वह स्वतः ही जीवन के सभी रूपों में खुद को श्रेष्ठ्तम स्थान पर पायेंगी।

लेखिका:
रचना शर्मा


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