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शायरी- तुम्हारी महफ़िल में और भी इंतज़ाम है

शायरी: तुम्हारी महफ़िल में और भी इंतज़ाम है तुम्हारी महफ़िल में और भी इंतज़ाम हैया फिर वही शाकी, वही मैकदा, वही जाम है शायर बिकने लगे हैं अपने ही नज़्मों की तरफपुराने शेरों को जामा पहना कर कहते नया कलाम हैं आप शरीफ न बन के रहें इन महफिलों मेंवरना शराफत बेचने का धंधा

जिसे जन्नत कहते हैं, वो हिन्दुस्तान हर घड़ी दिखाएँगे

कविता शीर्षक : जिसे जन्नत कहते हैं, वो हिन्दुस्तान हर घड़ी दिखाएँगे कुछ इस तरह अपने कलम की जादूगरी दिखाएँगेकिसी की ज़ुल्फ़ों में लहलहाते खेत हरी-भरी दिखाएँगे छोड़ो उस आसमाँ के चाँद को, मगरूर बहुत हैरातों को अपनी गली में हम चाँद बड़ी-बड़ी दिखाएँगे किस्सों में जो अब तक तुम सुनते आए सदियों सेमेरा

इस दिल में आते जाते रहिए

ग़ज़ल – इस दिल में आते जाते रहिए इश्क़ का भ्रम यूँ बनाते रहिएइस दिल में आते जाते रहिए आप ही मेरी नज़्मों की ‘जां’ थीये चर्चा भी सरे आम सुनते रहिए सिलिये ज़ुबान तकल्लुफ सेलेकिन निगाहें मिलाते रहिए आप मेरी हैं भी और नहीं भीये जादूगरी खूब दिखाते रहिए आप बुझ जाइए शाम

अगली पीढ़ी का बोझ कौन उठाएगा

कविता शीर्षक: अगली पीढ़ी का बोझ कौन उठाएगा आग लगाने वाले आग लगा चुकेपर इल्ज़ाम हवाओं पे ही आएगा रोशनी भी अब मकाँ देखे आती हैये शगूफा सूरज को कौन बताएगा बाज़ाए में कई”कॉस्मेटिक”चाँद घूम रहेअब आसमाँ के चाँद को आईना कौन दिखाएगा नदी,नाले,पोखर,झरने सभी खुद ही प्यासेतड़पती मछलियों की प्यास भला कौन बुझाएगा

तुम महफ़िल में कुछ कहते नहीं – हिंदी कविता

तुम महफ़िल में कुछ कहते नहीं और सुनते भी नहीं पर ऐसा नहीं है कि हमारे इशारों को समझते भी नहीं ये काले-काले मटमैले बादल उमड़ते हैं, बरसते नहीं जरा इनकी बेशर्मी तो देखो, अब तो ये गरजते भी नहीं बच्चों के हाथों में आ गईं जब से बाप की आस्तीन ये बच्चे इज़्ज़त

अनाम भीड़ के खतरे – हिंदी कविता

ये भीड़ कहाँ से आती है ये भीड़ कहाँ को जाती है जिसका कोई नाम नहीं है जिसकी कोई शक्ल नहीं है जिसको छूट मिली हुई है समाज, कानून के नियमों से जिसकी शिराओं में खून की जगह द्वेष की अग्नि बहती है। जिसके मस्तिष्क में भवानों के बजाय क्रोध भड़कती रहती है जिनकी