आरक्षण के ‘व्हीलचेयर’ पर बैठा देश का युवा

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दिन शनिवार, दिनांक 29 दिसंबर 2018 के दिन देश के प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर पहुंचे जहाँ उन्होंने हमेशा की तरह जनसभा को संबोधित किया। संबोधन के उपरांत जब पुलिस कर्मी अपने खेमे के साथ वापस लौट रहे थे तो उनपर कुछ अराजक तत्वों ने पथराव करना शुरू कर दिया। पथराव इतना तेज़ था की पुलिस को स्वयं अपनी जान बचाने के लिए यहाँ वहाँ भागना पड़ा।

पथराव की चपेट में आने से पुलिस कांस्टेबल “सुरेश वत्स” के सिर पर पत्थर लग जाने की वजह से उनकी मृत्यु भी हो गयी। यह पथराव ग़ाज़ीपुर के ननोहारा क्षेत्र में हुआ, मृतक सुरेश वत्स ग़ाज़ीपुर के करीमुद्दीनपुर थाने में तैनात थे। कांस्टेबल सुरेश, प्रतापगढ़ के लक्षीपुर-रानीपुर के रहने वाले थे।

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  • हमेशा की तरह भारतीय मीडिया अपने बौनेपन को दर्शाते हुए फिर से उत्तर प्रदेश की सरकार और मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को दोषी ठहरा रही है बजाय की पथराव करने वालों पर कुछ कटाक्ष करे।
  • प्रदेश में निषाद पार्टी के कार्यकर्ता हाईवे जाम कर अपने आरक्षण की मांग कर रहे थे। पुलिस बल उनको वहां से हटाने की कोशिश कर रहा था जिससे लोगों का आवागमन बाधित न हो और किसी प्रकार की बड़ी घटना न घट सके।
  • उसी बीच वहां उपस्थित आरक्षण की मांग करने वाले लोग और उनके समर्थन में एकत्रित लोगों ने पत्थर फेकना शुरू कर दिया। जो देखते ही देखते एक भारी पथराव में तब्दील हो गया और एक साधारण कांस्टेबल की मृत्यु हो गयी।

1- सवाल ये उठता है कि क्या आरक्षण पुलिस देगी उनको ? जवाब है नहीं !! अगर पुलिस आरक्षण देने की अधिकारी ही नहीं तो फिर उनपर पथराव क्यों ?
2- क्या होता अगर पुलिस जवाबी कार्यवाही कर किसी को मारती ? या फिर गोली चलाती।
3- क्या होता अगर पुलिस की जवाबी कार्यवाही में कोई कार्यकर्ता या आम नागरिक मर जाता।

क्या आरक्षण की मांग एक राजनीतिक कारण है ?

हां सच में आरक्षण की मांग यहाँ उठना एक राजनीतिक हथकंडा ही है। विगत चार साल से सरकार कार्य कर रही है। अगले वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं जिसके मद्देनज़र सभी छोटी बड़ी पार्टी अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने की तैयारी में है। निषाद समाज का, प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान आरक्षण माँगना और अव्यवस्था फैलाना उसी बिसात की पहली कड़ी है। निषाद समाज की अगुवाई करने वाले नेतागण यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं की वे अपने समाज के लिए कितना सोचते हैं। बात सिर्फ निषाद समाज की ही क्यों, भारत में हर समाज ने अपना-अपना दल बना लिया है और वे अनजाने रूप से अपने दल के मुखिया के ग़ुलाम बन बैठे हैं। सफ़ेद कुर्ता पहने विशेष समाज का मुखिया हर चुनाव से पहले अपने लोगों को इकठ्ठा करता है उनको ऊपर उठाने के वादे करता है और दूसरी ओर बड़े दलों से मिलकर अपने समाज का वोट एवं विश्वास उसे बेच देता है। मुखिया द्वारा इस कारनामे को देखकर भी उसका समाज उससे कोई प्रश्न नहीं करता वह सोचता है की नेता जी जो करें वही सही है।

राजनीति और समाज:

असल बात ये है की भारत में अब सामाजिक व्यवस्था और समाज है ही नहीं। समाज अब पूरी तरह से खंडित हो चुका है, छोटी से लेकर बड़ी पार्टी के रूप में। सबको अपनी अपनी पार्टी को जीताना है बिना यह सोचे की उनके समाज का प्रदेश या देश में कितना प्रतिशत है। लोगो द्वारा इसी अल्पज्ञान का फायदा उठाने वाले उन्हीं के समाज के लोग होते हैं। जिसके पास कुछ धन संपदा है वो अपने समाज का मुखिया बन केंद्र सरकार व राज्य सरकार से मेज के नीचे समझौता कर लेते हैं। बदले में उस मुखिया को बड़ी कीमत मिल जाती है और वह अगले 4 साल तक चुप्पी मार के बैठ जाता है।

हक़ीक़त तो यह है की आप अपनी तरक्की व उन्नति या फिर देशहित में वोट कर ही नहीं रहे हैं। आप केवल अपने-अपने मुखिया की ग़ुलामी करने के साथ साथ मात्र उस मुखिया के हित में वोट कर रहे हैं। आपको ऐसा क्यों लगता है की आपका भला केवल आपके समाज का नेता ही करेगा ? और यदि ऐसा लगता है तो क्या आपका भला हुआ ? अगर नहीं हुआ तो आप विगत कई सालों से क्यों अपनी जाति के नेता को वोट कर रहे हो ? सच तो ये है कि आप केवल अपनी कुंठा में वोट कर रहे हैं बस अपने मन की शांति के लिए, यह सोचते हुए की साला हम तो अपने ही नेता को वोट करेंगे चाहे जो हो जाय। अगर बात यही है कि चाहे जो हो जाय हम केवल अपने ही समाज तक रहेंगे तो फिर ये पथराव किस बात का ?

आरक्षण पर एक नज़र:

आरक्षण कुछ हद तक और कुछ नीचले तबके के लोगों तक ठीक भी है। समाज में उनका ऊपर आना जरूरी है जैसे SC/ST जिनके लिए आरक्षण प्रणाली 1954 से ही लागू है। अब ऊपर उठने की बात है तो कुछ मेहनत तो इस समाज के लोगों को करनी ही होगी। लाभ लेने के लिए लाभ लेने लायक कैसे बने यह तो उनको ही तय करना है। मगर 1954 से लेकर आज 2019 के आने तक स्वयं को पिछड़ा दिखाने की होड़ में ही ये समाज लगा रहा। बजाय की उठे जागे और आरक्षण का लाभ लेने लायक अपने बच्चों को बनाये। परन्तु इस समाज ने भी स्वयं को “दलित और हरिजन” जैसे शब्दों से ऊपर उठाया ही नहीं। यहाँ तक कि इस समाज को सरकारी सेवाओं में पदोन्नति का भी लाभ दिया गया मगर वहां भी ये विफल रहे। बात जब यहाँ भी नहीं चली तो अब यह मांग भी उठ रही है की इनको प्राइवेट सेवाओं में भी आरक्षण मुहैया करायी जाय। देश की संसद तो पहले ही बड़े कदम उठा चुकि है इस समाज के लिए, यहाँ तक की संविधान ने भी इन्हें सुरक्षा दे रखी है। पर फिर भी स्वयं को ये व्हीलचेयर पर क्यों बैठा के रखना चाहते हैं।

जंगल में हिरण को प्रकृति ने किसी प्रकार का आरक्षण नहीं दिया मगर फिर भी वह ये जानता है कि उसे जंगल के अन्य ताकतवर जीवों के साथ कैसे अपने जीवन की रक्षा करनी है। फिर हम और आप तो इंसान हैं, हम क्यों केवल आरक्षण की मांग तक सीमित हैं। सर्वप्रथम जातिगत वोट से ऊपर उठें और देशहित में अपना मतदान कर भारत को मजबूत बनायें फिर उस मजबूत भारत का हिस्सा आप स्वयं बन जायेंगे बजाय किसी राजनीतिक दल का चारा।

कोई व्यक्ति छोटा तब तक ही होता है जब तक वह ‘धन’ से कमजोर होता है। कम से कम आज के हिसाब से तो यही कहा जायेगा और इसमें किसी भी जाति धर्म का व्यक्ति शामिल है। जैसा कि हम देख रहे हैं की महानगरों में किसी प्राइवेट कंपनी का दरबान एक ब्राम्हण भी है, किसी का ड्राइवर एक राजपूत भी है, किसी के घर में बावर्ची बना एक बनिया भी है, किसी की दुकान में हेल्पर एक लाला भी है। यहाँ पर छोटे-बड़े का पैमाना केवल उसकी आमदनी है उसकी जाति नहीं।

बात OBC जातियों की करें तो यहाँ आरक्षण कोई खासा असर नहीं छोड़ सकता जिसकी वजह है ओबीसी में 26000 से अधिक जातियों का आना। विभिन्न जातियों की यह विशाल संख्या 27 प्रतिशत के बड़े आरक्षण को भी बेअसर कर देती है। जब केवल 26000 ओबीसी जातियां हैं तो उसमें आने वाले लोगों की संख्या कितनी अधिक होगी इसका आंकलन करने में आप सक्षम हैं। ऐसे में OBC स्वयं OBC से ही प्रतिस्पर्धा कर रहा है, इसमें जनल कास्ट के लोगों को दोषी ठहराया जाना गलत है। हर सरकारी परीक्षा में OBC और General समूह एक समान बनकर रह जाता है। फिर वही आगे निकलता है जो योग्य होता है अर्थात योग्यता ही एक प्रमुख पैमाना है स्वयं को ऊपर उठाने का। अतः कम से कम OBC जातियां तो आरक्षण के व्हीलचेयर पर न बैठें।

कैसे कोई समाज आगे बढ़ेगा ?

जिस प्रकार देश की थल सेना कई प्रकार की टुकड़ियों, बटालियनों और रेजमेंट में बंटी रहती है लगभग उसी प्रकार भारतीय समाज स्वयं को भिन्न राजनीतिक टुकड़ियों में बाँट चुका है। हम दलित , हम यादव , हम कुर्मी , हम बढ़ई , हम निषाद , हम जाट…इत्यादि ! पर हम भारतीय कहने वाला कोई नहीं। लिहाजा देश की केंद्र सरकारें केवल जातिगत दलों को साधने में देशहित का कार्य भूल जातीं हैं। हमारा वोट देश को न जाकर जाति दल के विशेष मुखिया को चला जाता है और इससे मिलता क्या है पता नहीं !!

दलित समाज की अगर हम बात करें तो जिन लोगों ने यहाँ आरक्षण का लाभ लेने लायक खुद को बनाया और सरकारी से लेकर अन्य प्राइवेट संस्थानों में ऊँचे पदों पर बैठे वे आज अपने समाज को फूटी आंख देखना भी पसंद नहीं करते। धन संपदा के आते ही यह लोग स्वयं अपनी जाति से किनारा करने लगे। स्वयं को छुपाने के लिए कहीं ये – चौहान , गौतम , सिंह इत्यादि सरनेम के नीचे बैठ गये। मेरी बात यहाँ थोड़ी कड़वी है मगर ये सच्ची भी है। अगर आप काबिल बनें हैं और अपनी जाति को ऊपर उठाने में सक्षम हैं तो फिर अपने लोगों से दूरी क्यों ?

या फिर हो सकता है सवर्ण समाज के द्वारा की गयी लगातार उपेक्षा उसे ऐसा करने के लिए बाध्य करती हो। कुछ वैचारिक बदलाव तो सवर्ण समाज के लोगों को भी अपने अंदर लाना ही होगा, यह कहना गलत नहीं है कि भारतीय समाज की यह विसंगति करने वाला कोई और नहीं बल्कि सवर्ण ही हैं। किसी व्यक्ति को उसकी जाति से पहचाना जाय ये पूरी तरह गलत है, परन्तु सवर्णो ने अपने अतीत में यही कारनामा किया है। समाज में जातिगत भेद के जिम्मेदार तो सवर्ण ही हैं इसमें उन्हें बा-इज्जत बरी नहीं किया जा सकता।

कितना अच्छा हो कि एक सक्षम दलित परिवार अपने अन्य भाई बंधुओं की सेवा को आगे आये। वह ये देखे की मेरे गांव , मोहल्ले में यह लड़का या लड़की योग्य है और किसी कार्य में सक्षम है तो इसकी आर्थिक सहायता कर इसे भी ऊपर उठने का अवसर प्रदान किया जाय। देश के हर समाज में सक्षम लोग हैं मगर उनका अपने समाज के प्रति उदासीन रहना उनके समाज के पिछड़ेपन का कारण बन बैठता है। मैंने पहले ही कहा कि देश में सामाजिक सेवाभाव तो रहा नहीं। ऐसे में प्रति समाज को दिया गया आरक्षण तो आपके लिए नगण्य साबित होगा और पूरे आरक्षण का महत्त्व भी समाप्त हो जायेगा। जब आरक्षण का महत्त्व ही नहीं रहेगा तो फिर आपकी स्थिति यथा स्थान ही रह जाएगी। जरूरत है कि सक्षम व्यक्ति असक्षम व्यक्ति को ऊपर उठाये और उसका मार्गदर्शन करे।

  • कक्षा में बैठे युवा ये नहीं सोचते की मेरा शिक्षक किस जाति का है, यहाँ सबका आशय ज्ञान प्राप्ति का ही होता है
  • अस्पताल में इलाज को गया व्यक्ति ये नहीं सोचता कि मेरा डॉक्टर किस जाति का है, यहाँ आशय रोगमुक्त होने का रहता है
  • थाली में परोसा भोजन ये सोचकर नहीं ग्रहण किया जाता कि उसे किसने पकाया है, यहाँ आशय भूख शांत करने का होता है
  • तन पर वस्त्र यह सोचकर नहीं पहना जाता कि उसे किसने बुना है, यहाँ आशय शरीर को ढकने का होता है

जब हम अन्य कार्य जाति को मानक मानकर नहीं करते तो फिर चुनाव में मतदान जाति देखकर क्यों ?? जब आपने जाति विशेष वोट कर दिया तो फिर अपने हालात को सुधारने की मांग उसी से कीजिये जो आपकी जाति का मुखिया है बजाय की पुलिस, आर्मी पर पत्थर मारने के।

क्या हम आरक्षण के व्हीलचेयर पर ही बैठे रहेंगे ?

पिछली केंद्र सरकार और वर्तमान केंद्र सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की। अगर हम वर्तमान सरकार की ही बात करें तो ऐसी कई योजनाएं हैं जो हर जाति समुदाय के लिए लाभदायक हैं – जिसमें Skill India , Startup India और Mudra Loan बेहद उपयोगी है।

काम करने के लिए स्वयं को किसी हुनर के लायक बनाना होगा जिसमें स्किल इंडिया आपके लिए लाभदायक है। कोई अपना निजी उद्योग भी डालना चाहते हैं तो स्टार्टअप इंडिया लाभदायक है और यदि पैसे की कमी आड़े आ रही है तो मुद्रा ऋण लाभदायक है। क्या युवा होने के नाते आपने इनको जाना समझा ? या मात्र पत्थर फेकना ही आपकी योग्यता है।

  • 50,000 से लेकर 2 लाख तक का मुद्रा ऋण केंद्र सरकार मात्र 8.75 प्रतिशत के ब्याज पर दे रही है
  • 2 लाख से लेकर 5 लाख तक का ऋण 10 प्रतिशत के आसपास है
  • 5 लाख से 10 लाख तक का ऋण प्रतिशत कुछ ज्यादा है परन्तु आपके वर्तमान व्यापार को बढ़ाने में सहायक है
  • स्किल इंडिया के तहत तकनीकि कार्यों में निपुण होने का गुण सिखाया जा रहा है

क्या आपको नहीं लगता की केंद्र सरकार की योजना का लाभ लेकर जीवन में कुछ करना चाहिए। या फिर आरक्षण प्राप्ति ही जीवन का एक मात्र लक्ष्य बन गया है। हमें यह जानना होगा की क्या सच में हम आरक्षण के आभाव में ही ऊपर नहीं उठ पा रहे या फिर कमी हमारे अंदर ही है। आखिर आरक्षण प्राप्ति का उद्देश्य क्या है, क्या सिर्फ अपनी ज़िद को मनवा लेना या उसका लाभ उठाना ? मुझे नहीं लगता की कोई लाभ उठाने के लिए आरक्षण की मांग करता हो यह तो सिर्फ एक ज़िद मात्र है। जिस समाज में आरक्षण है उसमें सफल व्यक्तियों का प्रतिशत निकालकर देखा जा सकता है कि आखिर आरक्षण उनके कहाँ तक काम आया।

क्या करे देश का युवा:

आरक्षण का अर्थ ये नहीं की अयोग्य व्यक्ति आगे आये। आरक्षण का अर्थ केवल इतना है कि पीछे छूट चुके समाज में से योग्य व्यक्ति बाहर निकले और अपने समाज का कल्याण करे। योग्यता का होना अनारक्षित और आरक्षित दोनों ही तरह के समाज के लिए अनिवार्यतम विषय है।

पत्थर चलाने वाले , आग लगाने वाले युवाओं में अधिकतर वे लोग होते हैं जो 12वीं पास भी नहीं होते। कोई कक्षा 8, कोई 10 तो कोई 11, ऐसे में जरा ये सोचें तो, कि आरक्षण का करेंगे क्या ? ये तो स्वयं योग्य नहीं है!! आरक्षण मिलने जाने पर भी मात्र 10वीं पास युवा करेगा क्या ?

अजीब है ये देश,

IIT पास छात्र – स्टार्टअप डालने की बात सोचता है
IIM पास छात्र – खुद की कंपनी चलाने की बात सोचता है
10-12 पास छात्र – पत्थर और आग लगाने की बात सोचता है

भारत स्टार्टअप की दुनियां में पिछले 4 सालों में बहुत आगे बढ़ा है और हैरानी ये है की कई अच्छे स्टार्टअप ने युवाओं को लाखों रोजगार मुहैया कराये हैं जैसे – पे-टी.एम, ओला, फ्रीचार्ज, क्रेड, ज़ोमैटो, स्विग्गी, नियर-बाय, पॉलिसी बाजार, गूमो, डेलिवेरी…इत्यादि सफलतम स्टार्टअप हैं।

यूँ पत्थर , आग , तोड़फोड़ से सरकार जा सकती है जो फिर कभी चुनकर वापस आ जाएगी मगर आपका क्या होगा ? आपके बच्चों का क्या होगा ? कौन सा भारत उनको देकर जायेंगे आप। बेहतर होगा देश के हर वर्ग का युवा आरक्षण के व्हीलचेयर से नीचे उतरकर अपने लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग करे। अगर इंफ्रास्ट्रक्चर होंगे तो नौकरियों का सृजन होगा और उसका लाभार्थी हर तबका होगा।

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा


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