मेरी गौरैया 20th March World Sparrow Day – एक घरेलू चिड़िया जो हमारे बीच रहती और हमसे बातें किया करती थी

पृथ्वी एक ऐसा ग्रह जहाँ जीवन है और सभी को जीने की पूर्ण आज़ादी भी है। कुदरत नें पृथ्वी नाम का एक ऐसा घर बनाया जहाँ हर कोई रह सके, पर किसे पता था कि ये खूबसूरत दिखने वाली पृथ्वी सिर्फ इंसानों की होकर रह जायेगी। तरक्की एवं उन्नति के जोश में इंसान नें सब कुछ खत्म कर दिया। यह ख़ूबसूरत धरा केवल इंसानों के अधीन हो गयी है यहाँ किसी और का रहना शायद इंसानों को मंजूर नहीं। धरा पर मौजूद भिन्न प्रकार के जीव जन्तु , वनस्पति पौधे , वृक्ष , नदी और सम्पूर्ण वायुमण्डल जिसे मानवरूपी जीव नें अपने हाथों से नष्ट कर दिया। हालात ये हैं कि मनुष्य अब उस हर खूबसूरत वास्तु को पाना चाहता है जिसे उसनें स्वयं अपने हाथ से नष्ट किया पर ये कहाँ मुमकिन है कि नष्ट हुई चीज वापस मिल जाये। वो कहावत है ना “अब पछताये होत का जब चिड़िया चुग गई खेत” यह कहावत अब बिलकुल सटीक बैठती है। प्रकृति का विनाश कर उसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता।




गौरैया एक ऐसा पंछी जिसे इंसानो से लगाव था ; गौरैया जो हमेशा अपने घोसले इंसानों के घर में बनाती थी, पर मासूम चिड़िया को क्या खबर थी कि जिस इंसान को वह अपना परम मित्र मानकर बैठी है वही एक दिन उसकी दुनिया उजाड़ देगा। आज गौरैया की आबादी न के बराबर है ; चाहे शहर हो या गांव गौरैया कि कुल संख्या में पचास प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आयी है। अब ये प्यारी चिड़िया यदाकदा ही कहीं दिखती है , आने वाले कुछ दिनों में ये चिड़िया सिर्फ तस्वीरों में ही देखने को मिलेगी और हम अपने बच्चों से कहेंगे देखो बच्चों यही वो चिड़िया है जो हमारे घर में बिन बुलाये मेहमान कि तरह रहती थी जिसे हमने सदा के लिये भगा दिया।

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प्रतिवर्ष 20th March को World Sparrow Day मनाया जाता है। एक चिड़िया को मारकर उसके नाम पर एक दिन बना दिया गया ये दर्शाने के लिए कि हम इंसान गौरैया से कितना प्यार करते हैं। काश ये प्रेम हमने पहले दिखाया होता तो आज वो चुलबुली चंचल चिड़िया हमारे बीच होती। वो दिन चले गए जब गौरैया की ची ची सुनकर हम सभी अपने बिस्तर से उठते थे , ची ची की मधुर आवाज़ निकाल वह हमें जगाने का कार्य करती और कभी कभी तो ऐसा लगता था कि वो हमसे कुछ मांग रही है। याद है मुझे वो दिन जब मैं उसके घोसले के पास चावल , रोटी या फिर कोई अनाज का दाना रख देती थी और गौरैया धीरे धीरे उस भोजन को अपने बच्चों के साथ खाती थी। हम तो अक्सर उससे खेलने का भी कार्य करते थे, उसे अपनें हाथों में लेकर उसके पंखों को लाल रंग से रंग दिया करते थे। गौरैया वो चुलबुली चिड़िया भी हमारे साथ खेलती थी ; ये पारिवारिक चिड़िया सच में हमारे परिवार का एक खास सदस्य थी।

विलुप्त होती गौरैया की प्रजाति जिसके जिम्मेदार केवल हम इंसान हैं। आधुनिकता को अपनानें के जोश में हमने कुदरत के हर वरदान को नष्ट कर दिया। उन तमाम पशु पंछियों कि प्रजाति जो कभी हमारे बीच मौजूद थी उनको हमनें नष्ट कर दिया। कहा जाता है गौरैया इसलिए विलुप्त हो रही है क्योंकि वह इंसान की आधुनिकता का शिकार हो रही है। हवा में घुलते जहरीले पदार्थ, खेतों में डाले जाने वाले कीट नाशक पदार्थ, नदियों का गन्दा एवं विषैला पानी, बढ़ते हुए रिहाईशी इलाके, वन एवं वनस्पति कि लगातार होती कमी, घरों के आसपास लगे मोबाईल टॉवर इत्यादि प्रमुख कारण है गौरैया के विलुप्त होनें के।

भोगवादी संस्कृति नें हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर किया है ; विज्ञान व आधुनिक विकास हमारे लिए वरदान कम अभिशाप अधिक साबित हुआ है क्योंकि पशु पक्षियों के अंत के साथ – साथ मानव भी अनेक प्रकार कि पीड़ादायी बिमारियों का शिकार होता जा रहा है। प्रकृति एवं मानव का तालमेल बिगड़ने का अर्थ है विनाश। गौरैया को बचाने का प्रयास किया जा रहा है पर मैं समझती हूँ कि अब बहुत देर हो चुकी है क्योंकि मानवीय आधुनिकता अपने चरम पर है और दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है ऐसे में भला हम गौरैया कि क्या रक्षा करेंगे। इस मासूम चिड़िया कि कुल 6 प्रजातियाँ थी और सभी विलुप्ति के कगार पर आ खड़ीं हैं , अब इन्हें पुनः जीवित करना और संरछण देना मानव के लिये असंभव कार्य है।

प्रत्येक वर्ष 20 मार्च के दिन गौरैया सिर्फ हमारी यादों में जीवित रहेगी वो भी केवल तब तक जब तक हमारी पीढ़ी जिन्दा है जिसने इस नटखट चिड़िया के साथ वक्त बिताये, खेल खेले और ढेरसारी बातें की। भविष्य की आने वाली पीढियां केवल किताबों के माध्यम से गौरैया जो जान पायेंगी पर उन्हें वो अहसास नहीं होगा कि ये प्यारा पंछी इंसान से कितना लगाव रखता था।