Rising Educational Fee in India – Worry Moment for Middle Class Families

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शिक्षा का अधिकार , शिक्षा मानव का अधिकार और शिक्षा का मौलिक अधिकार ये तीनों ही बातें हमारे शिक्षा अधिकार कि ओर इशारा करतीं हैं जो की अब कानूनी तरीके से भी लागू हो चुका है। खैर यह लेख शिक्षा अधिकार के ऊपर नहीं है बल्कि शिक्षा के बाज़ारीकरण की ओर इशारा करता है। शिक्षा का व्यवसाय या शिक्षा का बाज़ारीकरण मूल रूप से एक ही बात को दर्शाते हैं जो है बढ़ती हुई ” फीस “। हमारी सरकार शिक्षा को मानव अधिकार का कानूनी रूप तो दे चुकी है परंतु संसद में बैठे मंत्रियों ने ये सोचा कि सिर्फ ” Right to Education Act ” बना देने से हमारे बच्चे शिक्षित हो जायेंगे। इस कानून के तहत बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा बिलकुल मुफ्त है पर बात ये है कि उस मुफ्त शिक्षा का वास्तविक स्तर क्या होना चाहिए, मुफ्त के साथ – साथ उसकी गुड़वत्ता भी उचित होनी चाहिये या नहीं।

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देश में बढ़ते हुये modern public school और उनकी महंगी फीस सरकार के दोहरे चरित्र को दिखाती है। जरा बताइये कौन सा पब्लिक स्कूल है जो प्राथमिक शिक्षा मुफ्त में देने को तैयार होगा ? दरअसल बात ये है कि पैसा नहीं है तो मुफ्त के नाम पर अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में फेक दो जहां पढ़ने – पढ़ाने से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि कक्षा आठवीं तक तो फेल न करने का प्रावधान हमनें पहले ही बना रखा है ; ऐसे में बच्चा पढ़े या ना पढ़े वो आठवीं तक तो पास हो ही जायेगा – तो हो गया ना मौलिक और प्राथमिक शिक्षा का अधिकार पूरा; इसे कहते हैं कि साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे

English Medium, Convent School की बयार ऐसे चली है कि Hindi Medium School में बच्चों का पढ़ना अब गुनाह हो गया है। कहीं न कहीं ये व्यवस्था हिंदी की कम होती लोकप्रियता के लिये भी जिम्मेदार है। खैर लौटते हैं अपने मूल विषय पे ; modern public school की आड़ में शिक्षा माफिया पैसे बनाने में लगे हैं जिनको हमारी चुनी हुई सरकार भी समर्थन दे रही है आखिर दें भी क्यों न , ये सभी मोर्डेन पब्लिक स्कूल किसी न किसी माध्यम से नेताओं से ही तो जुड़े हैं। वर्तमान हालात यह है कि बच्चे के elementary education को पूरा करने के लिये अभिभावकों को मोटी रकम खर्चनी पड़ रही है।

केवल नर्सरी से आठवीं तक कि शिक्षा के लिये 2 से 3 लाख रुपये तक की रकम खर्चनी पड़ जा रही है जो की देश के मध्यम वर्गीय परिवारों के ऊपर बोझ डालती जा रही है जिसकी वजह से वह काफी तनाव में जी रहा है। भारत में lower middle class और middle class के लोग सर्वाधिक हैं जिनकी सालाना आय 2 से 3 और 3 से 6 लाख है जिनके लिये ये महंगी स्कूल फीस एक मानसिक परेशानी का सबब है। ये तो हाल सिर्फ प्राथमिक शिक्षा का है , परंतु अगर हम बात करें उच्च शिक्षा का तो उसके हालात और भी बत्तर हैं। उच्च शिक्षा तो केवल upper middle class और rich class वालों के बस की बात रह गयी है।

Lower middle class अपने बच्चे को जैसे तैसे बारहवीं तक पढ़ा लेता है फिर ये चाहता है की उसका बेटा अब आगे कहीं काम पकड़ ले क्योंकि उच्च शिक्षा आज उसके पहुँच के बाहर हो गयी है ; अगर बेटे की जगह बेटी है तो वो उसकी शादी कर देना ही बेहतर समझता है। सरकार की नीतियों में किस कदर खामियां हैं ये हम सब देख सकते हैं। आज भी हमारे देश में सर्वाधिक अनपढ़ महिलाएं ही हैं क्योंकि वो जिन परिवारों से आती हैं वह मूलभूत सुविधाओं को जुटा पाना ही मुश्किल है ऐसे में उनका शिक्षित होना तो दूर की बात है। महंगी शिक्षा समाज में अशिक्षा भी पैदा कर रही है जिसमें पुरषों के मुकाबले महिलाएं अग्रणी हैं।

Modern public school के बाद engineering collage और management collage का ही बोल बाला है ; 12th के बाद अधिकांश बच्चे इंजीनियरिंग कॉलेज की ओर ही रुख कर रहे हैं और फिर वहां से मैनेजमेंट कॉलेज की तरफ जा रहे हैं। वर्ष सन 2000 के बाद से इन कॉलेज में काफी इजाफा हुआ और ये धड़ल्ले से एक के बाद एक खुलते चले गये। सबका अपना अपना fee structure है जिसपे सरकार का कोई कण्ट्रोल नहीं है , हर कॉलेज अपने मन मुताबिक फीस लेता है। B.tech , M.tech , BBA , MBA आज के दौर में सबसे प्रचलित हैं जिसमें युवाओं का भी रुझान सबसे ज्यादा है। इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने वाले कॉलेज अभिभावकों से काफी मोटी रकम वसूल रहे हैं। किसी ठीक ठाक कॉलेज से केवल बी.टेक करने के लिये 5 से 8 लाख तक की रकम लगानी पड़ती है ; ठीक यही हाल M.B.A का भी है। ये रकम सिर्फ साधारण collage की है बाकी जो थोड़े famous हो चुके हैं उनकी फीस तो सातवें आसमान पर है जो कि 10 से 15 लाख रुपये तक है।

शिक्षा के नाम पर हो रही कालाबाज़ारी जो रुकने के बजाय और बढ़ती जा रही है जिसके आगे सरकारें भी घुटने टेके हुये हैं। समझ नहीं आता की उच्च पदों पर बैठे तमाम मंत्रियों , अफसरानों को क्या हो गया है आखिर वो ये हो रही कालाबाज़ारी से जुड़े लोगों को रोकने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे जो लगातार लोगों का खून चूस रहें हैं। मौलिक शिक्षा का अधिकार महज एक छलावा है जो आपको सिमित करता है केवल प्राथमिक शिक्षा तक पर यदि आप आगे पढ़ना चाहते हैं तो आपको कर्ज में डूबना ही पड़ेगा वरना कौन Educational Loan की तरफ आगे जायेगा। हमारी ही चुनी हुई सरकारों नें हमें हर तरह से बाध्य कर दिया है , विवशता का आलम यह है की हम उनके आगे नतमस्तक होने को मजबूर हैं।


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