स्कूलों में बढ़ता अपराध और समाज की भागीदारी

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हालिया कुछ दिनों में ऐसी घटनायें घटीं हैं जो समाज में हो रहे वैचारिक पतन को दर्शाता है। मेरा इशारा गुरुरगाम व् दिल्ली के स्कूल में हुयी ताज़ा घटना जिसमें एक 7 साल के बच्चे की निर्मम हत्या और एक 5 साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार की तरफ है। यह घटना कोई पहली बार नहीं घटी! हमें अक्सर ऐसी घटनाओं से रूबरू होना पड़ता है। इस प्रकार की घटनाएं समाज के असल चेहरे को दिखाती हैं, साथ ही यह भी मालूम पड़ता है कि अब कोई भी सुरक्षित नहीं है फिर वो चाहे बड़ा हो , बुजुर्ग हो , स्त्री हो या फिर मासूम बच्चे। कभी बड़े वयस्कों तक सिमित रहने वाली ये घटनाएं आखिर बच्चों तक कैसे पहुंची ? अगर आगे सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो फिर स्कूलों का अस्तित्व क्या है ? दोनों ही घटनाएं चूँकि विद्यालय परिसर में घटी हैं तो हम उन विद्यालयों पर उसका ठीकरा फोड़ सकते हैं; पर उन घटनाओं का क्या जो विद्यालय परिसर के बाहर रोज हो रही हैं ??



एक ऐसा भी दौर हुआ करता था कि हम अक्सर बच्चों की किडनैपिंग और फिरौती मांगने वाली घटनाओं को भी सुना करते थे; पर अब न फिरौती न किडनैपिंग !! अब सीधा बलात्कार और मर्डर ! गुड़गांव के “रेयान इंटरनेशनल स्कूल” में 7 साल के बच्चे की हत्या का विरोध उन तमाम अभिभावकों ने किया जिनके बच्चे वहां पढ़ते हैं; पर यही अभिभावक जब स्कूल के बहार ये घटनाएं घटती हैं तो चुप रहते हैं ! क्योंकि बाहर बच्चों के साथ घटने वाली बलात्कार और मर्डर की घटनाओं से उनका सीधा संबंध नहीं होता। एक जगह मौन रहना एक जगह विरोध करना समाज के दोहरे चरित्र को दर्शाता है क्योंकि बाहर हो रहे बच्चों से सम्बंधित अपराध में ज्यादातर ग़रीब बच्चे पाये जाते हैं। ये वही गुरुग्राम है जहाँ विगत कुछ महीने पहले ऑटो में बैठी एक महिला के बच्चे को उठाकर सड़क पर फेक दिया गया और बच्चा तत्काल मर गया। पर क्या कोई विरोध करने आया ? कोई आया सड़क पर धरना देने ?

सभी को केवल अपने दुःखों की परवाह है ! समाज शब्द केवल एक व्यक्ति से मिलकर नहीं बना अतः समाज में हर पीड़ित व्यक्ति के लिए आवाज़ उठाना समाज के हर व्यक्ति का कर्तव्य है। जब हम किसी दूसरे के लिए आवाज़ नहीं उठाते तो कोई हमारे लिए भी आवाज़ नहीं उठाता और इस प्रकार जुर्म करने वालों के हौसले बुलंद होते चले जाते हैं।

स्कूल, विद्यालय, कॉलेज, यूनिवर्सिटी इत्यादि को अमेरिका के पेंटागन जैसी सुरक्षा नहीं दी जा सकती। हम कभी भी स्कूल को संसद भवन, राष्ट्रपति भवन जितना सुरक्षित नहीं बना सकते क्योंकि वह विद्यालय है वहां आम लोग आते जाते रहेंगे। पर वहां होने वाली इन घटनाओं को सामान्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि विद्यालय ज्ञान का मंदिर होता है और ऐसा माना जाता है की वहां पर रहने वाला हर एक व्यक्ति सुचरित्र का होगा। लेकिन क्या हालिया हुई घटनाएं ये प्रमाणित करती हैं कि स्कूलों में रहने वाले लोग चरित्रवान हैं ? बात केवल वहां मौजूद गार्ड , ड्राइवर, सफाई कर्मचारी की ही नहीं अपितु वहां कार्य करने वाले अनेक शिक्षक व् शिक्षिकाओं की भी है – क्या वे सभी चरित्रवान हैं ? हमने ऐसे कई घटनाओं को भी सुना जहाँ शिक्षक ही भक्षक निकला, हमने यह भी सुना कि शिक्षक-शिक्षिकायें विद्यालय परिसर में प्रेमालाप करते पाये गए। सम्पूर्ण स्कूल का माहौल ही पूरी तरह दूषित होता जा रहा है ऐसे में बुरे कृत्य के लिए सिर्फ छोटा स्टाफ जिम्मेदार नहीं।




सरकार की व्यवस्था अथवा पुलिसिया सिस्टम पर सवाल दागने से क्या होगा ! यह प्रशन तो स्वयं से करना चाहिए की आखिर हम कर क्या रहे हैं। यह सवाल उन अभिभावकों को भी स्वयं से करना चाहिए की वे कैसे भव्य और मॉडर्न दिखने वाले स्कूलों का निरंतर पोषण करते चले जा रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम की आड़ में कैसे इन मॉडर्न स्कूलों नें भारतीय संस्कृति और उसकी सदाचारता व् शिष्टता को ताक पर रख दिया है। गुरु-शिष्य के बीच रहने वाले शिष्ट संबंधों की खिल्लियां उड़ाने वाले ये मॉडर्न स्कूल देश के बच्चों को कैसा भविष्य देना चाहते हैं ?

वर्तमान में वुमन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट मिनिस्टर मेनका गाँधी नें एक सुझाव दिया है – ” ड्राइवर्स, कंडक्टर्स के अलावा बाकी नॉन टीचिंग स्टाफ में अगर केवल महिलाओं को ही रखा जाय तो चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज के मामलों को रोका जा सकता है। ” मेनका जी द्वारा कही गयी बात से मैं भी सहमत हूँ। यह बिल्कुल ठीक होगा कि फीमेल स्टाफ की स्कूलों में ज्यादा भागीदारी हो। स्कूलों में मेल स्टाफ को केवल बाहरी कामों के लिए रखा जाये तो बेहतर।

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में हुई बच्चे की हत्या सच में दुःखद है, फिलहाल पुलिस आगे की छानबीन में लगी है। यह देखने लायक होगा की क्या बस कंडक्टर के अलावा भी कोई इस कू-कृत्य में शामिल है ? अगर है तो यह कहना ठीक है कि मॉडर्न स्कूल जो मोटी फीस लेकर भी बच्चों को सुरक्षा दे पाने में विफल हैं सरकार द्वारा उनकी मान्यता निरस्त की जाय।

इस हत्या के बाद दूसरे राजनीतिक दल अपनी राजनीति करनें में लीन हो गए हैं जो कि आज भारतीय राजनीति चरित्र हो गया। भारतीय राजनीति में मुद्दों की राजनीति होती है मुद्दों का समाधान नहीं होता। मीडिया अपना कैमरा लेकर तब पहुँचती है जब आग लग चुकी होती है पर यही मीडिया समय रहते सच को नहीं दिखाती। हिंदुस्तान में राजनीति सर्वप्रथम है जनहित दूसरे नंबर पर आता है !! यह व्यवस्था तब तक चलेगी जब तक समाज का व्यक्ति केवल अपने अपने दुःखों को ही तरहीज देता रहेगा। जिसदिन हम सभी दूसरे के दुःख को भी अपना दुःख मानकर विरोध शुरू करेंगे उसदिन भारतीय समाज एकजुट कहलायेगा।

7 वर्षीय छात्र प्रद्युम्न ठाकुर की रेयान इंटरनेशनल स्कूल में हुई हत्या, हम सभी को एकजुट होकर न्याय की मांग करने को प्रेरित करती है। निःसंदेह ये केवल उसके माता पिता का दुःख नहीं है यह सारे समाज का दुःख है। हम सभी को एकत्रित होकर प्रद्युम्न ठाकुर व् उसके माता पिता को न्याय दिलाने के लिए अपनी भागीदारी करनी होगी।




 

लेखक:
प्रेम कुमार यादव


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