गांव का पंडित और सत्यनारायण कथा

‘प्रभाकर तिवारी’ गांव के जाने माने पंडित के पुत्र हैं, अपनी युवास्था में ही वे पूजा पाठ के कार्यों में लग गए…ऊ का है कि, उनके दादा और पिता भी बड़े पंडितों की गिनती में आते थे । खैर दादा ‘राजाराम तिवारी’ तो दुनियां में रहे नहीं परन्तु पिता ‘परशुराम तिवारी’ अभी जीवित हैं पर उम्र अब वैसी ना रही की घर-घर जाके कथा वाचन कर सकें। पंडिताई की विरासत ढोते-ढोते परशुराम तिवारी वृद्ध हो गए .. पर चतुराई ई किये की प्रभाकर तिवारी (अपने बेटवा) को आपन खानदानी पंडिताई का पेशा सिखा दिए। अब अंदर का बात अइसा है, कि प्रभाकर तिवारी पढ़ाई-लिखाई में काला अक्षर भैंस बराबर रह गए, परशुराम जी त खूबे प्रयास किये की लडक़ावा कुछ पढ़-लिख ले ढंग से त ओकर नौकरी लागि जायेगी काहेसे कि …. ई पंडिताई का दुकान कब बंद हो जाय कुछ कहा नहीं जा सकता। पर प्रभाकर कहाँ के छात्र …. उनका और किताब का वही रिश्ता रहा जैसे धोबी आउर गदहा का।

प्रभाकर बबुआ अपने पिताजी परशुराम तिवारी के एगही लड़का थे ; एहीसे बापू परशुराम उनका भविष्य के खातिर चिंतित रहते थे। पर अब करें का , जब ज्ञात हो गया की छगना उर्फ़ प्रभाकर तिवारी पढ़े से त रहा … ए लेहाज से ई ससुरा के पंडिताई लाइन में घुसना ही सही रहेगा। प्रभाकर को गांव के लोग ‘छगना’ नाम मजाक में दे चुके थे जो उसके वास्तविक नाम प्रभाकर से ज्यादा प्रसिद्द था।

प्रभाकर उर्फ़ छगना का पंडिताई लाइन में परशुराम तिवारी अइसे शुरुआत किये की अपने साथ प्रभाकर को लेकर चल पड़ते थे कथा वाचन, शादी बियाह प्रयोजन और कर्मकांड इत्यादि पर। देखते देखते 10 -12 जगह पर छगना अपने बापू के साथ जाकर थोड़ा बहुत पंडिताई बांचने का ज्ञान अर्जित कर चुका था परन्तु उ केतना माहिर हुआ है आज ओकर असल परीक्षा था। बतायें काहे ? ….त बात यह है कि भोला लोहार के यहाँ आज कथा है मगर परशुराम तिवारी अस्वस्थ हैं।

परशुराम तिवारी ….. आ रे छगन .. छगना .. छगनवा ?? काहे चीला रहे हैं ! आ सोने नहीं देंगे बबुआ को , काल रातभर बारात करके आया है। परशुराम जी के मेहरारू यानि की बड़की पंडिताईन डांट कर बोली …. सुते दिहिं लइका के। अब मेहरी के गर्जन सुन परशुराम थोड़ा देर पटा गए !! अभी आधा घंटा भी नहीं बीता की फिर बोल पड़े छगना आज कथा है भोला लोहार के इहां। सुबह का छे बज गया और तू सो रहा है रे , जागेगा तब जायेगा न कथवा कहने ! 9 बजे का समय दिया है लोहरा सब। पिताजी का जोर जोर से चिल्लाना आखिरकार सफल हुआ छगना जाग गया। का बाबूजी आप भी छगना कहेंगे हमको ? त का कहे बता …. नालायक कुछ पढ़ा लिखा होता तब न तोका कलेक्टर कहते; तू छगन कहलाने के लायक ही है। जा इहाँ से नहा धोके तैयार हो जा , आज तोर असल परीक्षा है पंडिताई के। हमार तबीयत ठीक नहीं लग रहा है तू अकेले जायेगा भोला लोहार के यहाँ; समझा ? आ सुन एक अउर बात पूजा के समय बीच बीच में 50 – 100 का नोट चढ़वाते रहना ताकि यहाँ कुछ लेकर आये , ई ना की केला और अंगूर ले आये।

परशुराम के इतना समझाने के बाद प्रभाकर पूरी तरह तैयार होकर भोला के यहाँ जाने लगा। 9 बजे का समय था और प्रभाकर पहुंचा 9:45 पर, भोला की मेहरारू बोली – का ए पंडीजी आवत – आवत 10 बजा देनी हंs…आ बड़का पंडी जी ना अयिनी हंs.. का ? ना उनकर तबीयत ठीक ना रहे (प्रभाकर बोला)। पूजा की व्यवस्था घर के आंगन में की गयी थी। घर के समस्त हीत नात के साथ-साथ, गांव मोहल्ला के बुजुर्ग पुरुष व् महिलाएं भी पधार चुकीं थीं। कुछ नौ जवान भी मौजूद थे जो प्रभाकर को व्यक्तिगत रूप से जानते थे। एकाएक पीछे से आवाज आई का हो छगन … कथा पढ़े लगला का ? प्रभाकर पीछे देखा तो स्कूल मास्टर जी सुधाकर दुबे थे। नजदीक आकर बोले ठीके बा जब तरहा से पढ़ाई ना भईल त इहे करs..।

घर का आँगन पूजा के दृष्कोण से गाय के गोबर द्वारा लीप दिया गया था। छगन पंडित (प्रभाकर) अपनी धोती सँभालते विराजमान हो गए पूजन कार्य आरंभ करने हेतु। उनके पास बैठी भोला की बीवी और उसके साथ भोला लोहार। वहीँ आसपास घर के नात रिश्तेदार व् गांव मोहल्ले के अन्य पुरुष , महिलाएं भी बैठ गयीं।

छगन पंडित बोले – सत्यनारायण कौन भगवान हउवें ? काहे कईल जला इंकर पूजा ? ! अभी इतना छगन के मुँह से निकला था ही कि सबलोग अचंभित हुए , व्याकुल हुए और कुछ तो इस सोच में पड़ गए की आखिर यह सब बात कोई दूसरा पंडित काहे नहीं बताया। पंडित प्रभाकर उर्फ़ छगन दहाड़ के बोले “जो सत्य है वही नारायण है” और नारायण ही एकमात्र सत्य है। तो सब लोग हाथ जोड़कर बोलिये सत्यनारायण भगवान की जय। कथा आरंभ हुई पहली बार प्रभाकर पंडित अकेले कथा वाचन करने कहीं गए थे। उनके मन में थोड़ा भय था , ह्रदय में डर था की कुछ ऐसा घटित ना हो जाये कि मेरा उपहास हो। मन में ये गुत्थी चल रही थी वहीँ पर वे कथा का गुणगान भी कर रहे थे। त बोला लो …. सत्यनारायण भगवान की जय। वहां मौजूद कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस कथा को पिछले कई बार सुन चुके थे; तभी संभुनाथ के मेहरारू टोक कर बोली..का ऐ पंडित जी कुल गलत पढतानी का ? राउर बाबू जी त पिछला बेर एह तरे ना कहले रहनी हवीं। भोला की बीवी बोली – ह हो ? काजी पंडित जी ; हम कथा कहावत बानी घर में सुख शांति और लक्षमी खातिर आ आप बानीं की मये उल्टा के पल्टी पढतानी। अब छगन पंडित के पसीना छूटे लागल ; देखीं अइसे त..कथा ना होई , पंडित हम हईं की संभुनाथ बो हई ? इतना कहते हुए आगे बढे … ॐ ओम ओम.. की जय नारियल के पास 100 रूपया चढ़ाइये। अपने अपने हाथ में अछत ले लीजिये ; बोलिये सत्यनारायण महाराज की जय.. अछत आगे चढ़ा दीजिये और साथ में दोनों पति-पतनी (भोला की बीवी और भोला) सौ सौ रूपए कलश के पास चढ़ाइये। भोला बो – हर बेरी सई रुपिया ? बड़ा चलहांक बानी ; साई रूपिया ना हाई लीं 21 रुपिया चढ़ा देनी।

जैसे तैसे कथा पाठ हुआ , अब वक़्त हो चला था स्वाहा स्वाहा का यानि अग्निकुंड में धूप और घी गिराने का। अरे … हेने हेने बैठालो , घूम जालो…हे तरी हो तरी … अरे बाबा कपरा पे गिरा देबू का ! बोलो स्वाहा , बोलो स्वाहा ; कम कम डाललो … अउरी डाला स्वाहा , स्वाहा !!! बाबा चाचा .. हूँ बस बस ! नजारा कुछ ऐसा था की स्वाहा स्वाहा करने के लिए सभी आंगतुक आतुर और व्याकुल थे। सब यह भूल बैठे की प्रभाकर पंडित भी वहां मौजूद हैं ; भीड़ का आलम ऐसा हुआ की तेज आग की लपटों नें छगन पंडित की धोती को लपट लिया – अरे अरे … मुन्ना , ददन , हे मनोज पानी डालो पानी डालो ! धोती धोती पंडित महाराज की धोती खींचो खींचो ! पानी डालो ; हो गया स्वाहा – स्वाहा !! क्रोध से छगन लाल ; हमार धोती खोल दिया सब , हमके नहवा दिया सब… का पूजा करेंगे कइसे घरे जायेंगे ? काहो भोला लोहार बोला !!

यह सत्यनारायण की कथा न होकर भंडारे में खीर और पूरी खाने की छीन झपट जैसा नजारा हो चला था ! छगन पंडित अपना झोला लिए और जली हुयी धोती पहने घर को आ पहुंचे। उनकी दशा देख पंडित परशुराम नें वो डांट फटकार लगायी – तू त हमार पंडिताई का इतिहास ही मिटा के आ गया ! छगना का करेगा तू ? पढ़ा लिखा तो गया नहीं तोरा से अब पंडिताई में तू WWE जैसा युद्ध लड़के आया है ; कैसे चलेगा घर का धरम करम ?

प्रभाकर उर्फ़ छगन का हालत देख आज परशुराम पंडित समझ गए थे कि जनम से पंडित होने का कोई अर्थ नहीं है ; पंडित तो केवल कर्म के माध्यम से ही बना जा सकता है। उनको यह समझ आ गया था, कि अब उनका प्रभाकर घर घर जा कर पूजा पाठ करने के लायक भी नहीं है, अतः कर्म ही प्रधान है जन्म तो केवल एक मार्ग है इस संसार में आने का।