हिन्दी सिनेमा Bollywood Old Movies Villains – यादें पुरानें खलनायक और उनके किरदारों की

खलनायक ये वाक्य सुनते ही हमारे मन मस्तिष्क में एक छवि उभरती है जिसे जाना जाता है अपनी क्रूरता के लिये। हमारी हिंदी फिल्में जहाँ अनेक किरदार हैं , सबके अपने अंदाज़ हैं जिसके माध्यम से उन्होंने हमारा मनोरंजन किया बल्कि समाज में व्याप्त अच्छाई बुराई दोनों को अच्छे से प्रस्तुत किया। वैसे तो अनगिनत किरदार होते हैं Hindi Movies में जैसे – हँसी मजाकिया किरदार, प्रमुख नायक हीरो, प्रमुख नाईका हीरोईन, घर का नौकर, सिपाही चोर, माँ बाप … इत्यादि ; परन्तु एक खास किरदार जो हमारी हिंदी फिल्मों की शान रहा उसका नाम है खलनायक जिसे अंग्रेजी में Villain भी कहते हैं।

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Villain एक ऐसा नाम जिसका काम था समाज में व्याप्त बुराई को प्रस्तुत करना जिसे उसनें बखूबी किया भी। खलनायक पूरी फिल्म में एक ऐसा चरित्र था जिसने अपनी क्रूरता, गद्दारी, धोखेबाजी, बेईमानी, लालची, दुष्टता, धूर्तता, चालाकी और असभ्यता से फिल्म के असल नायक को खड़ा किया। कहते हैं कि अच्छाई के साथ बुराई भी मौजूद होती है ऐसे में हीरो का होना काफी नहीं था ; ये जरूरी था की खलनायक के माध्यम से हीरो का किरदार मजबूत बनाया जाये। हिंदी सिनेमा में नायक और खलनायक की प्रथा ऐसी चली की लोगों को ये खूब रोमांचकारी लगा साथ ही साथ कुछ ऐसे दमदार खलनायक के किरदार उभर कर आये जिन्हें हम आज भी याद करते हैं।

हिंदी फिल्मों के कुछ प्रसिद्ध खलनायकों के नाम :

1 : कन्हैया लाल का प्रसिद्ध किरदार ‘लाल शुखीलाल’
2 : अमरीश पुरी का प्रसिद्ध किरदार ‘मुगैम्‍बो’
3 : प्राण का प्रसिद्ध किरदार ‘शेर खां’
4 : अजीत का प्रसिद्ध संवाद ‘मोना डार्लिंग’
5 : प्रेम चोपड़ा प्रसिद्ध संवाद ‘प्रेम नाम है मेरा प्रेम’
6 : अमजद खान प्रसिद्ध किरदार ‘गब्‍बर सिंह’
7 : अनुपम खेर प्रसिद्ध किरदार ‘डॉ दांग’
8 : डैनी डेंजोंग्पा प्रसिद्ध किरदार ‘कात्‍या’
9 : रंजीत प्रसिद्ध किरदार ‘बैड बॉय’
10 : शक्ति कपूर प्रसिद्ध संवाद ‘आऊ’
11 : गुलशन ग्रोवर प्रसिद्ध संवाद ‘बैडमैन’
12 : कुलभूषण खरविंदा प्रसिद्ध किरदार ‘शाकाल’
13 : जीवन प्रसिद्ध संवाद ‘आज तो इन्साफ होगा या मामला साफ होगा’

कहते हैं कि चाहे फिल्म हो या वास्तविक ज़िन्दगी हमारे आस पास अलग अलग तरह के किरदार होते हैं और इन भिन्न किरदारों के साथ ही जीवन रंगीन हो जाता है। पहली पुरानी फिल्में भी ऐसी ही थीं उसमें हर पात्र काफी असरदार होता था जिसे हम फिल्म ख़तम होने के बाद भी याद किया करते थे। जिन खलनायकों का मैंने जिग्र किया वो ऐसे किरदार हैं जिन्हें आज भी याद किया जाता है। कुछ खलनायक किरदार तो ऐसे निकले जो मुख्य नायक के ऊपर ही भारी पड़े आज दुनिया उन फिल्मो के मुख नायक यानि की हीरो को याद नहीं करती बल्कि उस फिल्म के खलनायक को याद करती है।

गुजरे दौर से अगर हम आज कि फिल्मों की तुलना करायें तो कहीं ना कहीं आज बनानें वाली फिल्में अधूरी लगती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज फिल्मों में असरदार पात्रों की कमी है जैसे- रामू काका जो घर का एक पुराना नौकर हुआ करता था , छोटी बहन जो राखी बांधती थी, भाई जो बहन की रक्षा करता था, दादाजी जो बच्चों को ज्ञान बांटा करते थे और एक फैमिली डॉक्टर। ये सारे किरदार जाने कहाँ गायब से हो गये ; अब पूरे 3 घंटे की फिल्म सिर्फ हीरो और हीरोइन तक ही रह गयी है।

खैर यहाँ तो हम खलनायक की ही बात करेंगे ; आज के फ़िल्मी खलनायक को देखकर भय कि अनुभूति नहीं होती , जरा भी नहीं लगता कि ये कुछ ऐसा करेगा की नायक मुश्किल में पड़ेगा। आज के खलनायक भी बहुत शरीफ लगते हैं जिस वजह से नायक और खलनायक का टकराव काफी कमजोर लगता है। जबकि इसके उलट पुरानी पिक्चरों में खलनायक का कद और वजन ऐसा हुआ करता था की नायक उसके आगे शंघर्ष करते हुए दिखाई देता था। नायक और खलनायक के बीच के संवाद भी घूंजने वाले होते थे जो दोनों के बीच के टकराव को अत्यधिक जोरदार बनाते थे।

हालांकि वो जमाना अब गुजर चुका है शायद आज की युवा पीढ़ी ऐसे कमजोर खलनायकों को पसंद करती हो। पर फिर भी पुरानी फिल्मों के प्रति रुझान कम नहीं हुआ है। हर दौर अगल होता है और अपने युग को ही जीता है ; मगर ये कहना भी कुछ गलत नहीं होगा की खलनायकी की बारी जब भी आयेगी हमेशा पुराना खलनायक ही याद किया जायेगा और मिशाल भी उसी की दी जायेगी।