हिंदी कविता – अतीत

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हिंदी कविता शीर्षक – ‘अतीत

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छोड़ गई ‘मुझे’ अभी मरा न था,
वेताब थी ‘शायद’ किसी और के इंतजार में,
शिकवा उस पर नही, शिकवा खुद पर नही,
ऐसा ही बनाया, शायद परवर्दिगार ने उसे ।

ख्याल उठते है, बादलों की तरह,
साथ देता है दोस्त, सहारे की तरह,
उस का आना, बहारों की तरह,
कोई है, शिखर ले जाता है,
सितारों की तरह ।

जब कायनात, मेरी आपनी होगी,
तब पास समुद्र, खड़ा होगा,
मैंफिर जान तक, दे डालूगा,
गर कोई डूबता, हाथ माँगेगा ।

उस साधु ने जो मुझे सिखाया,
उसकी ताकत ही इतनी थी,
मैं खुद न समझ पाया,
अजनबी हूँ मैं, आज भी अजनबी ।

एक आदमी, एक ही होता है,
गौर से देख, दूसरों से अलग होता है,
न चेहरा एक जैसा, न तकदीर एक जैसी,
कोई संत जैसा होता, कोई चोर जैसा होता है,
हर एक उसका बंदा, एक साधु कहता है ।

मै कहता हूँ , मैं मन से लिखता हूँ,
वो कहते है थे, तू किसी और का लिखता है,
मैं वो हूँ जो, आपबीती लिखने का दम रखता हूँ,
मै अन्दर से ऐसा नही, जो बाहर से दिखता हूँ,
मै ऐसा भी नही, ‘जो’ हर जगह बिकता हूँ,
कोई विश्वास करे न करे, मैं सच्च कहता हूँ ।

कोई पढ़े न पढ़ें, लिखना मेरी आदत है,
कोई सुने न सुने, कहना मेरी आदत है,
कोई सुनकर भी बहरा है, 
कोई पढ़ने में  गहरा है ।

इतनी कोमल इतनी सादगम,
मक्कखी की तरह लड़ी थी वो,
सोचा ना था, समझा न था,
मेरे साथ, बस में चड़ी थी,
वो उसके मुख को देखने के,
रोज बहाने करता था,
नीचे था मैं, उच्ची थी,
वो कैसे उसको छू पाता ।

फर्श से अर्श तक जाने के लिए,
महबूब को जिन्दगी में लाने के लिए,
जिन्दगी मे सिर उठाने के लिए,
सहजाद का कफज सजाने के लिए,
इस मुकाम से, उस मुकाम तक, जाने के लिए,
सर देना पड़ता है, यार को पास बुलाने के लिए ।

एक राज है तुझमे,
मैं हू एक आदमजात, तूँ है एक परी,
जिन्दगी की इन रहों में, तुने कैसी आहट भरी,
तेरे बिना मुझे, एक भी पल लगता है अजनबी,
फंस जाएगी मेरे मोहब्बत के इन्दरजाल में,
ओ जानेमन, आज नही तो फिर कभी ।

अगर तू किसी और की है तो क्या,
अगर हम तुझे नही पा सके तो क्या,
अगर तेरे बिन मर जाऊ तो क्या,
अगर मैं कहूँ उसको छोड़ दे तो क्या,
अगर मैं तुझे भूल न पाऊ तो क्या,
अगर अत : मैं कहूँ ये प्रशन तेरे है न मेरे है,
इनके उत्तर तो ज्वालामुखी में बसेंरे है ।

आपने आरमानो को लेकर, मै एकलव्य,
जब दिल से गुरू बनाता हूँ,
बदले की भावना भरा, मेरा गुरू द्रोण जैसा,
मेरे दाये हाथ का आगूठा, गुरु दक्षिणा में ले जाता है,
तब मेरा जीवन महत्वहीन हो जाता है ।

भूल कर भी हम से वास्ता न बनाना,
तुझे पता नही हम किसके है,
जान डालता है, मुरदो में देखते ही,
बहुत पहले से हम उसके है,
वो, वो नही रहते, उस से मिलकर,
ऐसे सुनने में उसके किस्से है,
बड जाती है कीमत, उस की,
इस वक्त जो सस्ते बिकते है ।

ख्याब आते है बादलों की तरह,
उड़ा देता हूँ मै, सिगरेट के धुएँ की तरह,
हकीकत क्या है, ख्याबो में नही आती,
जिन्दगी क्या है, खुद बनाई नही जाती,
वो संत है,  जो बदल देते है, तकदीरे,
मुँख पर हँसी, चिलम में आग,
पूर्ण साधु देखा नही कभी निराश ।

उनका शहर खुद रोशन हो जाता है,
जो अन्धेरो से नाता रखते है,
हवा खुद व खुद बंद हो जाती है,
जब चराग उनके नाम का हो ।

लेखक:
संदीप कुमार नर


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