हिंदी कविता – बेटी की दुनियां

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“बेटी की दुनियां” बेटी की नजर से

Beti-Ki-Duniyan-Hindi-Kavita-Poem

मम्मी की गोदी, चाँद का हिंडोला
पापा के कंधे, मेरा आकाश वाला झूला।

वो बचपन की दुनियां, हाँथी एक गुड़िया
बहुत सारे ही थे मेरे खेल और खिलौने
एक था बन्दर जो डफली बजाता था
वो प्लास्टिक का था, पर मुझे खूब भाता था।

था मेले में पापा ने गुब्बारा दिलाया
जो छूट गया हाथ से तो गोला खिलाया
करती थी झगड़ा घर आती थी रो कर
उठा लेते थे गोद में जब लगती थी ठोकर
थी पापा की साईकिल जो थी मेरी मोटर
जो रूठूँ तो लाते थे मुझको बाजार घुमाकर।

वो मम्मी के आगे तो गुस्सा दिखाना
पर पापा के आते ही पढ़ने बैठ जाना
मम्मी से संवरना और बाल बंधवाना
पापा से चीजें और कपड़े मंगवाना
थक कर जो आना तो पैर दबवाना
सिर है दुखता मेरा, मम्मी थोड़ा तेल लगाना।

मम्मी रातों को जगती जब बुखार था आता
फिर पूरी रात वो माथे पर हाथ फिराना
आता जो इतवार पापा संग बैठकी लगाना
वो लूडो की गोटी, और कैरम सजाना
मैं ना खाऊँगी, लौकी को देख कद्दू सा मुँह बनाना
और मम्मी का झटपट फिर आलू बनाना।

मम्मी से झगड़ कर, फिर खुद को मनवाना
और जब बातें करूँ तो सहेली बन जाना
मम्मी संग हाथो में मेहंदी लगाना
साड़ी पहन उनकी, उन सा बन जाना
मम्मी की सीख से उलझनें सुलझाना
पापा की डांट सुनना और फिर भी मुस्कुराना।

फिर समय का पहिया घूमा और मेरा विदा हो जाना
बहुत याद आता हैं मुझे मेरा जमाना
नयी थी ये जिंदगी नये थे सब लोग
कुछ अपना नही था,और सफर था अनजाना
ना शिकायतें थी, ना कोई जिद थी अब मेरी
मुझे था यहाँ खुद को अब सयाना बनाना।

ये दुनियां हैं मेरी, पर लगती जुदा है
मेरा जो घर था, वो अब भी वहाँ है
मेरी बदमाशियों का शोर,आज भी गूँजता जंहा है
अब भी हूं जाती तो लगता, सबकुछ मेरा है
आंखों को मेरी पढ़कर अक्सर मम्मी हैं पूछती
क्या कोई परेशानी वंहा है ?
‘ना’ में सिर हिलाकर थोड़ा सा मुस्कुराकर
मेरा बस इतना कह पाना, मम्मी सबकुछ वँहा है
नहीं कह पाती बस इतना ही, नहीं है वँहा

मेरी मम्मी की गोदी, चाँद का हिंडोला
पापा के कंधे, मेरा आकाश वाला झूला।

लेखिका:
रचना शर्मा


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  1. Krishna Kumar Singh

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