चिता – एक हिंदी कविता

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कविता शीर्षक – चिता

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क्यों अपने तड़फ़ते हैं ,
बातें दिल पर मेरे लगाते हैं।

वक्त क्यों, मेरा जटिल बनाते हैं ,
घूम कर देखी न अभी दुनिया मैंनें ,
घर में ही मेरी कब्र सजाते हैं।

रिश्तेदार पूछते हैं जब मुझे, तू काम क्या करेगा ,
तो मैं कह देता ‘मेरी उदासी में ख़ुशी कौन भरेगा’ ,
मुकाबले की भावना ले , इल्ज़ाम जैसे लगाते हैं ,
मुझे मेरे ही सवाल बड़े तड़फाते हैं।

मिल जाता शायद मुझे कोई उत्तर देने वाला ,
बाग़ीेचे ‘महकते’ जब फूल थे नज़र आते हैं।

धन, दौलत, सब व्यार्थ चीजें ,
अच्छे लोग अपने ईश्वरीय इश्क वाला दर्द सुनाते हैं,
पूछ कर देख लेना कभी उन को ,
वह तो कहेंगे, हमारे से ऊँचा कौन बड़ा महल , कौन बनाते हैं ,
क्यों भूल जाते ने ईश्वर को वह, ‘सन्दीप’,
ईश्वर तो साधारण रह, फंसे बेड़े पार लगाते हैं।

सफ़ेद वेशभूषा डाल कोई ईश्वर नहीं बनता ,
बात वह सुनने का क्या फ़ायदा ,
जो बाद में अलज़बरे सुलझाते हैं।

सुन लेना मेरी बात तू भी गौर के साथ ,
अच्छे भले मनुष्य को, झूठे कुछ लोग, बेईमान बनाते हैं।

मुक्ति संसार में से मिलती तब, जब सामाजिक भलाई के काम कर ,
लोग ईश्वर के बंदे कहलवाते हैं ,
ऊँचा रख जब बंदे को ‘चिता’ में अपने आग लगाते हैं ,
फ़ैसले की इस घड़ी को, शिव जज बन सुनाते हैं ,
हड्डियाँ भी पवित्र हो जातीं हैं ,
जब लाश के अस्त कुदरती पानी में बहाते हैं ,
संत अंत रूह को अपने राहे-राह ले जाते हैं ।

लेखक:
संदीप कुमार नर बलाचौर


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