हिंदी कविता – डाका

हिंदी कविता – डाका

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता।

भीतर प्रवेश करते लोग डर कर, हमें कोई कहीं, मार न जाता,
सदर से बस्ते शाहर में, बुरी नजरों से कोई देख जाता।
नंगे पैर, भूख से बीते दुपहिरियाँ, यहाँ हाल न पूछता, कोई गरीब का,
भाषण देता, खड़कर नेता, जैसे रब्ब ही, बन जाएँ, उनके नसीब का।

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता ।

भूखे मर गए पशु, कुत्ते भी तरसते हैं लंगर, ऐसी रब्ब, कई युगों से खेल खिलाता,
पक्षी दूर-दूर तक उड़ाता, बंदा पक्षीयों के बच्चों तरह, सहम कर अंदर घुस जाता।
तहकीक करके दुनिया की, चिकनाई वाली मिट्टी भी, धूल की तरह उड़ाता।
मर्जी तेरी चले ‘मेरे रब्बा, तरबूज सा, समझ के वंदा, वंदे को बीच में से है फाड़ता,
बोई जैसे फसल ‘करोना, बंजरों में जैसे उगता, पहाड़ी बाजरा बार-बार।

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता ।

दिन को डाके मारते, जब चोर किसी, पिछे लग हैं जाते,
किसी लिखने वाले के दर्द को बेच-बेच फिर कई पेट हैं भरते।
अपनी कोई तरकीब ढूँढ लो, मौत तो हाथ रब्बा के, तू कैसे दे कोई वंदा मार,
क्यों औरों के, अरमानों की लिखतो को बदल-बदल, सुकून के दिन है ढूँढते।

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता।

कतल करें, किसी की कला का, जैसे जिंदा इंसान को, आग से हो साड़ते।
संदीप का कार्य आईना दिखाना, रब्ब आप ही जब सब भविष्य वाणी कर दें,
मुफ्त नहीं मिलती किसी को साँस, लाख दुआ करें फिर मिलते हैं राह।

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता।

रब्ब, भूला यहां दुनिया को, गब्बर यैसै, डाकू भी चल दिए अपने राह,
माना की किसी को मन में गुरु मान लिया, गुरु यह नहीं चाहता।
मेरा शिष्य को कोई गलत ​​रास्ते जाए पा।

नर, का मानना ​​है, इस दुनिया में मंजिल तक पहुंचने के लिए।
भगवान का सहारा लेना कोई नहीं है, गुनाह।
कोई किसी के सामान नहीं बन सकता, भले ही कोई नया गुण सीखे, भ्रम में डालकर,
भाई बनकर, कोशिशें करें, अब वह गिर न जाएँ, पड़ जाएँ सीधे राह।

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता।

आई कई बार महांमारीयाँ, किसी के अंत ऊपर क्या लिखना,
अंदाजा सा लगाकर देख लेना, उसका कभी।
यहाँ जिसका-जिसका वस चले, वहीं बिना बात के जाता है गिरा,
रब्बा तेरी मर्जी के खिलाफ, तो पत्ता भी हिलता, अगर तू चाहे तो तभी कुछ हो सकता है।

तेरे शहर में रब्बा विरान सा पड़ जाता,
आता कोई डाकू लूट कर ले जाता।

कहें संत…!

“अरे,” मैं पूरे दिन कमाता हूं, रात को कोई आता है,
‘मेरी सारी की सारी, कमाई ले जाता,
वो तो पहुंच गया ऊपर, हम तो बीच में ही लटके रह गए,
अरे बच्चा, किसका है, बच्चा तो हमारा ही है ”।
छाती तना कर कह जाते हैं, जिनमें दम होता है….!
“हम साधु हैं, जो भी हमारे पास आता है, हम से कुछ न कुछ ले जाता है”।

आखिरकार मेरे मौला ने सच कहा है….!

किसी सच्चे संत की परीक्षा नहीं लेते।

लेखक:
संदीप कुमार नर