ग़ज़ल – दो कदम साथ चलिए मेरे

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दो कदम साथ चलिए मेरे
फिर हालात बदलिए मेरे

तन ही सारा छिल जाएगा
जो ज़ख्मों से गुजरिए मेरे

जान जाते दर्द की गहराई
साथ ही डूबिए, उभरिए मेरे

ज़िन्दगी कोई हादसा लगेगी
बिखरे ख़्वाबों में चलिए मेरे

लेखक:
सलिल सरोज
मुख़र्जी नगर, नई दिल्ली