हिंदी कविता – हठधर्मिता

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हिंदी कविता – हठधर्मिता

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“हठधर्मिता” एक नारी प्रधान कविता

तुमने अभी हठधर्मिता देखी ही कहाँ है,
अंतर्मन को शून्य करने का व्याकरण मुझे भी आता है,
अल्पविराम, अर्धविराम, पूर्णविराम की राजनीति मैं भी जानती हूँ ।

यूँ भावनाशून्य आँकलन के सिक्के अब और नहीं चलेंगे,
स्त्रियों का बाजारवाद अब समझदार हो चुका है,
खुदरे बाजार से लेकर शेयर मार्किट तक में इनको अपनी कीमत पता है ।

तुम्हारी इच्छाओं का बहिष्कार कोई पाप नहीं,
सीता, सावित्री, दमयंती का अब कोई शाप नहीं,
हमें काठ का बना के रखोगे तो जलती हुई राख ही मिलेगी,
प्रताड़नाओं, पीड़ाओं से झुलसी अहसासों की साख मिलेगी ।

वक़्त को पिघलकर हम हथियार बना लें,
इससे पहले अपनी पुरूषप्रधानता की जाँच कराओ,
और हमें बराबर होने का सही अहसास दिलाओ ।

लेखक:
सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन


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