हिंदी दिवस पर एक कविता

कृपया अपने मित्रों को भी Share करें

आज कल कविताओं के नाम पर चुटकुले सुनाये जाए रहे हैं और कहा जा रहा है कि ये जरुरत है जनता भी अब इसी में खुश है लेकिन ये शुरुआत किसी नें तो की होगी। आज हिंदी दिवस पर उसी पर एक कविता मेरी तरफ से।

सोचता हूँ कवि मै बन जाऊ
क्यों बैठा हूँ खाली,
पर आज की कविताओं में है
चुटकुले और गाली !

ये दोष नहीं है कवियों का,
क्योंकि इन्हें सुनकर ही जनता बजती है ताली !!

बस ये सोच कर कलम रुक जाती है,
हिंदी किसी कोने में धाराशाही नज़र आती है !
निकलना तो चाहती है वो लेकिन ठहाकों के,
भंवर में कहीं डूब जाती है !!

सोचता हूँ उस तिनके का सहारा मैं बन जाऊ,
मातृ भाषा कहते हैं जिसे उसको माँ का ओहदा दिलाऊं,
बस इसलिए सोचता हूँ मैं कवि बन जाऊं !!

क्यों बैठा हूँ खाली,
सोच लेना एक बार इसे पढ़के तुम,
बेशक न बजाना ताली !!

 

अगर आप भी कविता प्रेमी हैं तो जुड़े रहिये पखेरू से और अपनी भाषा अपनी बोली हिंदी से। मैं विभु राय आप सभी को हिंदी दिवस की बधाई देता हूँ।

 

लेखक:
विभु राय


कृपया अपने मित्रों को भी Share करें
कृपया नीचे अपना Comment जरूर दें :