हर स्त्री एक माँ है – मातृ दिवस हिंदी कविता

मातृ दिवस हिंदी कविता

हर स्त्री एक माँ है

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हर एक स्त्री माँ है, माँ जिसका व्याख्यान शब्दों में किया नहीं जा सकता, माँ जो अपने एक रूप में अनेक भावों को समेटे हुए परिपूर्ण है।

हर स्त्रीं एक ‘माँ’ है
फिर चाहे वह किसी भी रूप में हो
हर स्त्री इक जननी है
चाहे उसने अपनी गोद से जना ‘ना’ हो
उसकी बगिया में फूल कोई भी खिला ना हो ।
हर क्षण में वह सजीव जीवन है
वह है तब ही तो जीवन है ।

सुनकर बालक का रुदन, उसका हृदय भर आता है
कष्ट में हो सन्तान उसका मन अस्थिर हो जाता है ।
सदैव रक्षक है वह अपने अंश की
वह शक्तिशालिनी बलशाली है
वह धैर्य की मूरत है, वृक्ष सी तरुणाई है
उसकी छाया सर्वदा अति शीतलदायी है ।

अपने बालक के समक्ष वह, कभी अश्रु बहाती नहीं
मुस्कुराती है सदा ही वह, अपना दुःख कभी जताती नहीं
एक बिटिया की वह प्रथम सहेली है
उसकी चोटी सी, गुथति-सुलझती एक पहेली है
उसका राजदुलारा, उसकी आँखों का तारा है
उसके लिए वह एक ही है, वह तारा जान से प्यारा है ।

पहला कदम, पहला शब्द
पहला ज्ञान, पहली मुस्कान माँ से ही तो हम पाते हैं
उंगली पकड़ कर माँ की ही चलते चलते
एक दिन जीवन में दौड़ लगाते हैं
फिर माँ का आँचल छोड़
माँ से दूर हम अपनी दुनियां बसाते हैं
सब कुछ हमें मिल जाता है हमको
इस दुनियां के बाजार में
बस नही मिलती माँ हमे दुबारा ढूंढे इस संसार में ।

जब जब ठोकर लगती है
हृदय से एक आह ‘माँ’ ही निकल कर आती है
जब जब दिल टूटता, जब हम बिखर से जाते हैं
और नयन आँसु भर आते हैं
तब तब माँ के लिए बहुत ही अकुलाते हैं ।

लेखिका:
रचना शर्मा