नन्हीं बच्ची – हिंदी कविता

भारत जैसे देश में जहाँ नारी को पवित्र स्थान प्राप्त है वहां नन्हीं सुकुमारियों के प्रति बढ़ते जघन्य अपराध न सिर्फ देश की संस्कृति को धूमिल कर रहे हैं बल्कि यह भी दर्शा रहे हैं कि आज का आधुनिक मानव वैचारिक रूप से कितना घृणित हो चुका है। न्यायालयों में बैठे, काले कोट धारण किये न्यायाधीश सवाल जवाबों और तर्क वितर्क के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते। जिसके फलस्वरूप ऐसे घृणित अपराध समाज में रुकने के बयाज बढ़ते ही जा रहे हैं। कुछ एक बातें समाज के लोगों, आमजन पर भी लागू होतीं हैं जो अपराधियों को धर्म, मज़हब, जाति के नाम पर संरक्षित करने का काम कर रहे हैं। अंकिता राजपुरोहित द्वारा लिखित यह कविता ट्विंकल जैसी अनेकों सुकुमारियों के लिए प्रेम व् श्रद्धांजलि है।

#justicefortwinklesharma

आज फिर इस भीड़ ने ,
एक और नन्हीं को अपनाया !
त्यौहारों में लगने वाली मंदिर या मस्जिद से बड़ी वह भीड़ ,
जिस भीड़ को उस बच्ची की कहराती चीखों ने सहमाया !
महसूस कर जिन्हें किसी मां का कलेजा भर आया !!

देख यह दृश्य मां रो पड़ी हिम्मत बांधू ,
ताकत मानूं या रो पडूं ?
जब जीवित थी , थी आस उसे तब
किसी में ये अपनापन क्यों नहीं नज़र आया ?
थी तब वह खून पराया !!

लड़ी खूब वह, संग लड़ी उसकी
कहराती चीखें , बिलखती इंसानियत
जो हार हैवानियत से ,
खड़े कर गयी बिन पूछे वह सवाल हज़ार !!

मरने के बाद मुझसे पहले क्या सच में
किसी परी को इंसाफ मिल पाया ?
कौन सा न्याय कितनी मां को उनकी
परी को वापस लौटा पाया ?

मरने के बाद अफ़सोस जताते हो ,
मरने के पहले क्या आप में से कोई एक
भी मदद को आ पाते हो ?

#justicefortwinklesharma

लेखिका:
अंकिता राजपुरोहित