हिंदी कविता – “नशीली आँखें”

हिंदी कविता – नशीली आँखें

नशीली आँखें, दिल रूक जाए उनकी नशीली आँखें देखते ही


दिल रूक जाए, उनकी नशीली आँखें देखते ही
जमीन पाँव से निकल जाए, उनकी नशीली आँखें देखते ही !

मेरे होश उड़ जाए, उनकी नशीली आँखें देखते ही
निगाहें घूम जाए, उनकी नशीली आँखें देखते ही !

आगे दिखाई कुछ न दे, उनकी नशीली आँखें देखते ही
क्यों शरमा जाऊँ, उनकी नशीली आँखें देखते ही !

विचारों में घिर जाऊँ, उनकी नशीली आँखें देखते ही
सकून क्यों न आए, उनकी नशीली आँखें देखते ही !

क्यों उड़ने लगूँ , उनकी नशीली आँखें देखते ही
तुफानों में घिर जाऊँ, उनकी नशीली आँखें देखते ही !

क्यों शारबी हम होते हैं, उनकी नशीली आँखें देखते ही
महफिलें लगा लेते हैं, उनकी नशीली आँखें देखते ही !

गीत का सुर बना लेते हैं, उनकी नशीली आँखें देखते ही
ईलाही राग गा लेते हैं , उनकी नशीली आँखें देखते ही !

ख्वाबों में तस्वीर बना लेते है, उनकी नशीली आँखें देखते ही
क्यों उन्हें सामने बिठा लेते हैं , उनकी नशीली आँखें देखते ही !

अपनी आँखो के आँसू छुपा लेते हैं, उनकी नशीली आँखें देखते ही
दिल के जख्म भर लेते हैं , उनकी नशीली आँखें देखते ही !

क्यों गहरें समुद्र में चलें जाते हैं , उनकी नशीली आँखें देखते ही
कशती भँवर में फंसा लेते हैं , उनकी नशीली आँखें देखते ही !

जेब में रखें आईने को देखने लगते हैं, उनकी नशीली आँखें देखते ही
कशा! वो भी समझ जाए, ‘मुझे’ नशीली आँखें से देखते ही !

उनकी नशीली आँखों में एक चिराग सा जलता है
रौशन वो है रौशन हम भी हैं
फर्क बस जमीन आसमान का लगता है !!

लेखक:
संदीप कुमार नर