करुण कविता – नेक मुर्गा

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करुण कविता – ‘नेक मुर्गा’

हिन्दी कविता नेक मुर्गा Nek-Murga-Hindi-Kavita-Poem

अपने मालिक की भूख से बेहाली
देख मुर्गे की आंखों में आया पानी
सोचा इसी घर में खाया चुग-चुग कर दाना
आज मालिक के काम है आना

भूख से दिन बीते हैं चार
मालिक मेरा हुआ बीमार
मालिक को मुझे बचाना है
नमक का कर्ज चुकाना है

सोच गया कसाई की दुकान
बोला कर दो मेरा काम तमाम
टुकड़े – टुकड़े मेरे कर डालो
और मालिक को मेरे दे डालो

खाकर उसका पेट भरेगा
कुछ तो ताकत उसे मिलेगा
सुनकर मुर्गे की करुण कहानी
कसाई की आंखों में आया पानी

बोला ‘नेक मुर्गा’ तू बड़ा महान
ना कर अपनी जान कुर्बान
तेरे मालिक की मदद करूंगा
भूख से ना उसे मरने दूंगा

रीना कुमारी
तुपुदाना, रांची झारखंड


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