हिंदी कविता – पार

कविता शीर्षक – पार

Paar Hindi Kavita

जाऊंगा मैं मल्लाह बनकर,
सात समुद्रों को पार कर कर।
महकते सुबह की झलक बनकर,
खड़ जाऊंगा मैं, पैरों पर, छाती तनकर।
जाऊंगा मै, उसको मिलने की, आस कर कर,
हुआ है मेरा, यारो ‘चाँद’ विदेशी।
जाऊंगा मैं मल्लाह बनकर,
सात समुद्रों को पार कर कर।

रुलती ज़िंदगी के पन्ने तलाशता हूँ,
ज़िंदगी में उसके बारे में बहुत सोचता हूँ।
पर शायद….
हो गई होगी मंगणी, हो गए होंगे फिरे,
ख़ामोश मेरी ज़िंदगी के रास्ते बहूत से।
धूड़ उड़ती, मैला कर जाती,
आगे समुद्र, पीछे खाई।
बंधी न नाव मेरी,
किसी ‘किनारे’ के साथ भी भाई।
माँ – बाप भी झूठे जैसे इल्ज़ाम जाते लगाई,
करा मैं पूजा किस की, ऐ मेरी खुदाई।

चाँद पर तो दाग़ आ यारो,
सूरज की तरह मैं पवित्र।
ग़मों वाली चक्की में,
मैं अकेला ‘तारा’ यार विचित्र।
न किसी पर मुझे शिक्वा,
न किसी पर मुझे शिकायत।
उलझन मेरी बीच ‘भँवर’,
ऐसा क्यों जनाब,’
ऐसा क्यों, मेरे भाई।
बातें हो बीच तरंगों, खुशर-फुसर होई तभी भाई,
समय आ गया ऐसा, यंत्री छुरे क्यों जाए लगाई,

क्या लेना, क्या देना, उनको,
यह तो मेरा ईश्वर ही जानता,
यह दुनिया कहाँ से, कहाँ चलकर आई।
मुझे तो ईश्वर ने बेफ़रक वाली भागीदारी सिखाई,
माँगू मैं सब्र रब्ब के पास से, तू क्यों जाता घबराई।

घड़ मूर्ति अपने आप ऐसी दुलह्न बनाएगा,
चलेंगे वह भी उस दिन मेरे साथ,
जो कहते हैं, ‘नर’ अकेला ही रह जाएगा।
भूल कर भी भुलाऊ न मै, जो बीत गए इतने बुरे दिन,
नहरों के बैठ किनारे, अकेले ने जो काटा वक्त, दोस्तों बिन।
नाव कैसे मेरी, खुदा ने डूबने से कई, बार बचाई,
समझा लेता था, अपने आप को,
सन्दीप यह सब गरीबी कहर लाई।
तूफ़ान नज़र आया, मुझे हर तरफ़,
करा मैं काम जो भी, उसने भी जल्दी वाली,
करामात दिखाई।

फंस गया, ‘मय’ में ‘तू’,
फिर क्यों जाता, उदास सा मुँह बनाई।
यह खेल मेरे मुकदरों का, फट्टे कपड़े भी,
मैं जाऊ सजाई।
बे – बस तमाशा, मैं वह दुनिया का,
जो बिना पैसों से,
दुनिया, मुझे देखने, दूर से चलकर आई।
सपना हकीकती देख, जब मुझे जाग आई,
वह चेतना आ गई थी, मुझे बचपन में,
यहाँ तुम्हारे लिए, सब कुछ है।
कर्मों में रब्ब ने मेरे, उजाड़ और उदासी पल्ले पाई।

मौसम हुआ सुहाना, कहीं – नाचते मोर,
पत्थर भी बड़े होते हैं, मरथूल में भी वसेरे, वाह ! कितने रंग तेरे,
ऊँची पहाड़ी से लोग दिखाऊंगा, जो बसते हैं रब्ब जी के आँगन।
कर लिया किसी बंदो ने धोखा मेरे साथ, बच वह कहाँ जाऐगा,
पार कहा था, उसको पहुंचने को।

बीच – बीचकार में झूठे बहाने लगाऐ ‘तू’,
याद रखना ‘ज़ीरो’ का भी कोई मूल्य होता है।
एक फ़ाल्तू लग जाऐ, फिर पड़ जाएँ फसाद,
हीरो बन – बन देखा अगर मैं,
किसी पूरे बंदे ‘में’, फिर भी कितने होंगे,
अवगुण सारे।

मुरशिद मेरा अपने आप नाव ‘पार’ लगाएगा,
मैंने जला लिया दीया लगा कर, हार सिंगार,
सोच – सोच कर सन्दीप, तू धीरे – धीरे चप्पू मार।
तेज रफ़्तार के साथ, मौत ही आज तक आई,
कोई टक्कर मार कर, सड़क पर, बेजुबान जानवर गया मार।
रोतें होंगे बच्चे, माँ उडीकीण, ऊँची- ऊँची चीकें मार,
देखे मैं कुदरत के साथ खीलवाड़ होते कई – कई बार।

कहते संत डर अच्छा होता,
अगर अच्छे काम में हो अगर, भलाई बार – बार।
अगर तू राधे – राधे करे बंदे, उसके विचारों पर गौर कर, यार,
परछाई से क्या डरना, फूकारा डराए भाई,
कहते बजूर्ग चूहा अपनी बिल पर शेर होता,
अगर ताकत दी ईश्वर ने, फिर जाए बंदा, अपने आप कर्म कमाई,
माना कि सो दिन होते चोर के,
एक दिन आता साध का, यह है सच्चाई।

तिलक गया, वह गिर पड़ा,
होसलें तो क्या देना था, तोहमत जाते लगाई।
न आए रोना, न आए हँसी, किस को कहूँ शोदाई।
झूठ के पैर नहीं होते, चाहे बोल कर, देख के लिए भाई,
करूँ अगर मैं सत्य की बात, कहें बजुर्ग सच कोड़वा होता।
सत्य भी यहाँ कुछ बंदों को ऐसे डंसता,
जैसे किसी आदम युग के महाराजा ने,
अपने बचाव के लिए, विष कन्या आप बनाई।

क्या तोड़ना किसी ने, किसी के शरीक को, अपने आप पैगंबर जोड़ दें,
रहमत हो अगर उसकी, प्रत्येक के परिवार पर भाई।
अनमोल नज़ारा हो गया, रात चन्दआनी, जब पानी में, होगी लशकाई,
मारे चमका ज़िंदगी भी ऐसे, जैसे तारों में खेल रही, परी छुपा छपाई।
बिकाए घर बंदों, तू किसी के,
ज़बरदस्ती से हिस्से करवाए, तू किसी के,

कभी घास की कुटिया नही, देखी होगी तूने,
समेत समान आग, दें लगा , जब अपनी मौज पर जाए आ,
पार खड़कर देख किसे निकलता, सच्चे संतों के घर, धुने का ता,
फूल बरसाता आसमान से, ढोल ऊँची बजाता, जब कहीं भी खुशियाँ लेता पा।
कभी भी, भुल्ल न रब्ब को, तुझे क्या पता फ़कीरी, बिकती किस भाव।
रंग काला भी वहाँ सफ़ेद हो जाता, ईश्वर जहाँ बंदा को, आप ले मना,
आखिर पहुँचने तक लालटेन, न बुझने दे, जहाँ तक उसकी, मर्ज़ी जाए आ।

लेखक:
संदीप कुमार नर