हिंदी कविता – पिंजरा

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हिंदी कविता – पिंजरा

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संदीप कुमार नर की कविता ‘पिंजरा’

हालत मेरी, ऐसी बन गई,
जैसे ग़ुलाम परिंदे को, कोई दे पिंजरे में से छुड़ा,
उड़ नहीं होता, अब मेरे से, रब्बा कोई तो रास्ता बना ।

गुज़रा मेरा बचपन, बहानों में,
कैसे किया उन्होंने गुमराह,
ऊँचे ख्वाबों के सपने दिखा कर,
लूट लिया मेरे घर का आँगन ।

चढ़ी जवानी आँख लड़ गई,
मेरे हलातों ने लिया दबा,
थोड़ा सा मेरी उदासी का दुख,
रब्बा तू साथ आ के बँटा ।

और लड़की की ओर मेरा दिल,
कभी जमेगा नहीं, बता कैसे जाऊँ,
यह अपना अकेला दर्द छुपा ।

तुझे वस्ता, मैं डालता रब्बा,
अम्बरों से मेरे मैहरम को
जल्दी मोड़ लिया ।
कौन मथनी मथते, कौन देगा, साग बना,
कौन देगा मक्की की रोटी,
कौन देगा, मक्खनी मेरे लिए लगा ।

कौन देगा रांझे की तरह,
देसी घी की चूरी खिला ।
देखते हैं अपने मेरे कहते,
कौन सी लाता है ‘हीर’ विवाह ।

मैं तो अपने मरहम को,
अंग-अंग दूँ भून के खिला ।
इजराईल के डेड उस समुद्र की तरह,
जा फिर लेह लद्दाख पहाड़ी की तरह
वस मेरा चले तो वक्त दूँ उल्टा मैं चला ।

होश-हवाश मैं अब खो रहा हूँ,
शायद मैं उस दुनिया में,
जहाँ जीते न, न ही मरते हैं,
फिर भी पर्थना तुम्हारे आगे करते हैं ।

ये ख्याल है बे-ख्याल है,
मुझे इस तरह पल लगते हैं,
जैसे मेरा परवर्दिगार, मेरे ऊपर दियाल है ।
लगता है मुझे हल करना पड़ेगा एक दिन,
जो मेरे ऊपर खड़ा सवाल है ।

मैं गुलाम भी हूँ, मैं आजाद भी हूँ,
तू चलती हूई एक तलवार भी है,
तो एक टुटे हुए शायर का मान भी है ।
‘नर’ देखने में एक सवाल भी है,
अगर हल हो जाए तो कमाल भी है ।

मैं न ईधर हूँ, न उधर हूँ,
तू करके देख ले मेरे ऊपर गुना,
क्यों रब्बा तु ने, इस जहान पर ‘मुझे’,
अलग सा दिया बना ।

दो रास्ते हैं मेरे ज़िंदगी के,
एक जाता उसको तलाशता,
सितारों के राह ।
दूसरा ख़त्म हो जाता,
मेरे अपनों पर आ,
इज्जत होगी, जा मान बढ़ेगा,
जा ख़त्म हो जाएँ, बेरोज़गारी पर आ ।

फ़र्क पड़े न अब मुझे,
कुँआरा चला जाऊँगा,
उस दुनिया के राह,
सोचता हूँ हर समय पर,
अपनी इश्क कहानी दूँ,
जहान को सारी खोल सुना ।

फिर डर लगता रब्बा तुम्हारे से,
उस गुलशन जैसी लड़की को,
क्यों दिया अपने,
हवालातों की मुज़रम बना ।
यह कसूर है,
बे-रहिम चाहत का,
मन बिना बताए लग जाता है ,
इश्क के राह ।

महक आती फूल से,
काँटे चुभते महंगे भाव,
इज्जत है मेरी दिल में,
उस लड़की के लिए,
उसने आपने सपनों की,
उड़ारी ली लगा ।

अगर हिज़र का दुख देना ही था,
संदीप को रब्बा,
पहला देता तू उसको,
अपनों से तो बचा ।

मेरा भी कोई कसूर नहीं,
बता इश्क है, कौन सा गुनाह,
तंग हूँ मैं उन बेगैरत लोगों से
जरा मेरी बात सुनकर तो जा ।

क्यों मैं किसी से दब कर रहूँ,
निशाने दूँ, चुन-चुन कर लगा,
अति गरीबी सी देख कर,
रिशतेदार भी कहते हैं वाह,
रलते न रलाते ‘अहंकारी,
अंदर से कहें यहाँ से जा ।

आज कल के कुछ लोगों से,
बच-ओ-बन्दे,
देख कर, दूसरे की थाली में से,
छीन-रोटी लेते खा ।
कभी फ़िक्र सतायें उनका,
जवानी मेरे पंजाब की चल पड़ी,
कौन से राह।

बेहरहिमों ने भेज दिया, नशा मेरी सरजमीं पर,
खाली हो गया मेरा पंजाब दोस्तो,
कुछ गभरू बिक गए, चवानियों के भाव,
शांट-शांट कर गोरे ले गए दिमाग यहाँ,
वक्त के मारे जा फिर कुछ, उड़ारी गए लगा ।

चाहे हो क्यों न दोस्त मेरे,
वह भी डालते हैं,
तोतों जैसे शौर ।
कहते क्यों नहीं,
इसकी पीठ लगती,
सभी पकड़कर लें इसको गिरा ।

जीता है यह ख्याबों में,
बात करने पर क्यों निकलते हैं,
इसकी साँसें,
मेरे रास्तो के में मिलने वाले,
कहते, बंदा है तू,
बड़ा लापरवाह ।

हर घड़ी सन्दीप को,
तो उस लड़की का,
इंतज़ार रहता,
कभी तो तू वापस मुड़ आ ।

सुन सन्दीप की ‘तू’ रब्बा,
कोई ऐसी युक्त बना,
भेजते, इसको को भी,
उस उड़न-खटोले के राह ।

लेखक:
संदीप कुमार नर


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