हिंदी कविता – राहत

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राहत – कविता

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हाँ,
मैं सारी ज़िंदगी,
भटकता रहूँगा,
लेकर ज़िंदगी के अरमानों को,
लटकता रहूँगा ।

तुझे पाने की इच्छा नहीं बुझेगी कभी,
कमलीए हर समय पर तुम्हारा भ्रम खाता रहूँगा ।

लोग कहते पड़ गई जुदाई नार की,
यही दिया ताना, भोगना पड़ता है प्यार का ।

कोई कहता यह तो छल्ला हो गया,
सच्च है ‘सन्दीप’ अभी भी नहीं,
अपनी दुनिया में से अकेला हो गया ।

तू भ्रम में न रहना मेहरबां,
परन्तु रब्बा मेरा, मेरे साथ ही है,
तुझे यही कह देता हूँ ।

मैं जानता हूँ,
यह वक्त की सारी चाल ही है,
तरस रहा हूँ तुझे पाने के लिए,
कभी तो वक्त दे देते मुझे,
तुम्हारा प्यार आज़माने के लिए ।

सोचा था,
तेरे साथ जा कर वहाँ, ज़िंदगी गुज़ारा,
जहाँ लगाते है परिंदे, आज़ाद उडारें,
कलम बन गई है, तुझे बताने सहारा,
खो जाता हुँ, मैं अपने खयालों में,
लेता हूँ बहारें ।

फिर से आऊँगा ज़रूर, हार न समझना मेरी,
मैं चाहे अब रुक जाऊँ,
रोटी मिल रही है आराम से मुझे क्या जरूरत हैं,
इतना लिख-लिख कर दिखाऊं ।
एक तुम्हारे प्यार ने मत मार दी,
तभी सदरों के बजार सजाऊं ।

तू अकेला नहीं रोगी यहाँ, मदहोश हजारा,
छोड़ तू दर्द की बात रे, खुदा दुख बाँटा देता सारा,

आए जब मौज में संत जी, जवाब सा दे गए,
आज तक वह किया, जो किसी ने किया न,
ये रहसमायी चीजें को तो मैं फ़िल्म बनाकर उड़ा दूँ ।
यह तो ताकत है उस ईश्वर की, जो अंधविशवास नहीं,
सच्च सुनूँ दूँ जहान को, मैं क्यों झूठ बताऊँ ।

आते रहते हैं ज़िंदगी में उतार चढ़ाव,
मैं क्यों दिल पर लगाऊँ, गुज़र जाएगा ये दर्द भी,
जो दिया ईश्वर का, उस में शुकरिया मनाऊँ,
लेकर नाम शिव शंकर भोले का, ज़िंदगी को असली रास्ते ले जाऊँ।

लेखक:
संदीप कुमार नर


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