हिंदी कविता “सफर” – जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका

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हिंदी कविता “सफर”

जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका


जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका
मगरमच्छ ने नोचना तो चहा, मैं न रूका !!

समुद्र की गहराई नाप ली दूर से खड़कर,
किनारा मैं ना पा सका,
भंवर आते जाते गए, मैं न फंसा !

जाल हमने भी डाला मछलीयों को,
एक न एक दिन फंस जाएंगी, गहरे पानी की मछली
काँटा तो हमने भी न फेंका !

जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका,
मगरमच्छ ने नोचना तो चहा, मैं न रूका !!

अभी रास्ता बड़ा लंबा है, धीरज हमने भी न छोड़ा
अजनबी सी लहरें आती गई, हवाएँ जोर लगाती गई
पश्चिम ने जोर लगाया तहनाई का, उसे हमने भी न रोका
सिना पकड़ लिया उसकी यादों का
इतनी जल्दी मैं भी न बिका !

जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका
मगरमच्छ ने नोचना तो चहा, मैं न रूका !!

उतर गया समुद की गहराई में, जिन्दगी की कश्ती को हमने भी न छोड़ा
दर्द आते गए हम मरहम लगातें गए, साहस तो हमने भी न छोड़ा
शायद कोई भी मिला था डूबता हुआ, लगता है उसमें दम था थोड़ा
गम के गीत गातें गए, गला तो हमारा भी न रूका !

जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका
मगरमच्छ ने नोचना तो चहा, मैं न रूका !!

हिरा तो मैं भी तलाश रहा था
फिर किसी की संत की कहीं बातें याद आ गई
ऐ बंद क्या है तेरा इस दुनिया में
सब छोड़ चला जाएंगा, एक एक दिन
नेकी कर, फिर मैं न रूका !

जिन्दगी की कश्ती में सफर करता मैं न थका
मगरमच्छ ने नोचना तो चहा, मैं न रूका !!

लेखक:
संदीप कुमार नर


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