हिंदी कविता – समझ

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कविता शीर्षक – ‘समझ’

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छोड़ यार मुझे समझाता,
ख़ुद सोचो में डूब जाऐगा।
तू सारा कुछ छोड़ कर,
मेरी दुनिया में चला जाऐगा।

मैं हूँ एक पहेली सी,
तू मुझे सुलझता आप उलझ जाऐगा।
दुशमनी करके क्या फ़ायदा मेरे साथ, तू,
हमारा दोस्त सदा के लिए बन जाऐगा।

देखता देखते इस जग को,
हमेशा के लिए हमारे राह पर चलने लग जाऐगा।
अगर हम ने कर दी मुँह पर तुम्हारे कोई बात, तू,
हमेशा के लिए सोचने लग जाऐगा।

मेरी तरह अकेला बैठ ग़म लिखने लग जाऐगा।
मैं हूँ इकवीं सदी का वह अलग सा बंदा,
जो विज्ञान को भी चलैंज कर चला जाऐगा।

मेरी तरह हर बंदे की सीरत जान जाऐगा,
अंचल में न कुछ रखेगा, सारा कुछ दुनिया को खोल सुनूँ चला जाऐगा।
तू जीत ले बाज़ी कोई बात नहीं, मैं हारों में भी एक ही सा रह जाऐगा,
तूने सीधे की क्या बात की, आप तू टेढ़ा मेड़ा बन कर ही रह जाऐगा।

अहंकार करने से बंदे तू निचा ही हो जाऐगा,
अंत क्यों भूल जाता एक दिन धरती ‘में’ ही मिल जाऐगा।
क्या कहते हो संत जी, मेरे जैसे पुछने लग जाऐगा,
तू समझ के क्या करेगा, हम तो फंसे है तू भी फंस के रह जाऐगा।

लेखक:
संदीप कुमार नर


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