तड़फ – हिंदी कविता

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Tadap-Hindi-Kavita
तड़फ, हिंदी कविता

ऐसी जन्नत की भरी, उसने
उड़ान वह ,
आस-पास सुन्न-मुसाना डाल गई,
विचारी वह,

सहक गई वक्त की,
मारी वह।
डाल गई माथे पर तिऊड़ी,
कुँआरी वह,

गुलाब की कली की अपेक्षा से अधिक,
थी जो प्यारी वह।
‘याद’ रंग रूप जैसे सुंदर,
सुनाअरीं वह,

लाजवंती के साथ तुलना करूँ, मैं उसकी,
दिखाती थी ऐसी, उसकी समझदारी वह,
साथ छोड़ गई मेरा, बाबूल की छाया में बैठ,
जो मौज सहारी वह।

शायद, मेरे कर्मों ‘में’ थी, बंजर जमीन वाली धरती की,
हिस्सेदारी वह।
जैसे सामने टाँगी हो, चिड़िया की तस्वीर वाली,
फूलकारी वो, जा बात करूँ, खाना लेकर आती पंजाबन की,
खो गई, आज चित्रकारी वह।

मेरे पंजाब के रिती रिवाज की रंग – बरंगी पुरानी है,
कलाकारी वह।
महंगे भाव में ‘बिकती है पर्दो की, आज-कल दुकानदारीं वो।

पैसे से बिना पूछता न कोई, कहते डाल, हमारे साथ,
साझेदारीं वह।
असली नकली सब बिकते है, देखो – देख चमक,
बाज़ारी वह।

किसी का ईमान न बेचना तू , रब देखता,
तू लखारीं वह।
लिख लिए किसी ने गीत, स्तरों तेरीयों से,
जब सरसरी नज़र, मारी वह।

भला हो उन्होंने लोगों का, जो वक्त रहते खींच गए,
तैयारी वह।
करता न यहाँ कोई किसी का, सब बड़े से बड़े,
शिकारी वह।

बेईमान बंदे भी बढ़ते देखे जो बन गए,
बड़े से बड़े व्यापारी वह।
बचा जाएँ, अगर ईश्वर बंदे को ‘ताईंयो ‘बनती,
जिन्दगी न्यारी वह।

कई तुम्हारी तरह भटक ‘ते’ फिरते’ आशा रखते,
रब पर बारी – बारी वह।
बुजुर्ग कहते है अंधेरे नहीं उसके घर, आएगी रौशनी की
एक दिन बारी वह।

भूखे को तुझे कोई पूछता ना था, ऐसी ज़िंदगी सन्दीप तूनें
बाग़ों में गुज़ारी वह।
संत नहीं किसी को भूखे मरने देते, यह खेल खेलता है,
वक्त है जुआरीं वह।

आहसान भेज कर, जो मारे, ताने कटाक्ष, है वो अहंकारी वह,
बैठ जा एक का दर पकड़ कर, अगर कोई सिख लेनी बात न्यारी वह।

वक्त का मारा बंदा, किस्मत में लेख -लिखा लेता है,
कहते, बैठा भखारी वह।
देश को लूट कर खा जातें है, गरीबी और बड़ा जाते है,
भूखे अफ़सर सरकारी वह।

शामलाटों को भी बेच कर खा जाएँ, ऐसी खेल, खेल लेते है, पटवारी वह।
कह – कह कर ज़मीनें भी बिका दे, वो कैसी , आज – कल की रिश्तेदारी वो,
मेहनती बंदे को भूख मरवा जाती हैं , आज – कल की ऐसी है,
बुरी बेरोजगारी वो।

क्यों लेता तू ज़रूरत से अधिक कर्ज़े, ज़िंदगी बन जाती, ऐसी लाचारी वह।
आधी खा ले, सब्र को बात लगा ले, सच्ची बात अगर कहूँ, काम आती,
सलाहकारी वह।

भूल कर न तू ‘वह’ कदम उठाना, ज़िंदगी न मिलती बारी – बारी वह।
सामना कर ले डट कर, तेरी किसी के साथ, कोई है अगर, देनदारी वह।
हक लौटा देना गरीब का, वास्तव में ‘काम आती,
सदा इमानदारी वह।

उनके कहने पर अरे कुछ न होगा, आती न अरे चलाकों के काम
बहुती, होशियारी वह।
कई बर्ष से जिनको को, पूछता ना था, अच्छी किताबें पड़ ले,
अगर कुछ बनना तू भी खोल ले,
अलमारी वह।

निशन पर मछली की आँख देख ले, बनेंगी कलम तेरी एक दिन बड़ी,
ज़िम्मेदारी वह।
तू कौन सा किसी के साथ कोई वैर है कमाना, न किसी के साथ कभी धोखा करना,
संत एक के लड़ लगा हुआ, सीख जाऐगी, बाकी रहती, अच्छी,
दुनियादारी वह।

लेखक:
संदीप कुमार नर


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