हिंदी कविता – तन्हाई

हिंदी कविता – तन्हाई

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अक्सर मेरी तन्हाई ,
हम साथ – साथ रहते है,
रात को सोते वक्त, सोचता हूँ,
ये जिन्दगी की, बंदिशें।

सब्र का घुट भरते ही,
यादें मेरा गला, दवा जाती है।
मेरे आपने ही, जब किसी की, बातों में आ जाते है,
क्या कहूँ, उन्हें, कैसे समझाऊँ इन्हें।

मेरी मंजिल तो, कहीं और , बहुत ऊपर,
आसमान से भी ऊँची, मेरी ये खवाईशें।
मैं भी वह ‘वक्त, देखना चाहूँ,
इतनी भीड़ – भाड़ के आगे, कैसे जीते है, वो लोग।

जो मैं ‘अब, किसी का दर्द नही, देख सकता,
क्या उस समय भी मेरे, आगे पड़ा होगा।
कोई भूख से तड़फता,
लाखों नजाईज खर्च, होता देखा मैनें, अवाम में।

बस वो फाईलों में ही दवा रहता है, सरकारी दुकान में,
जब मैं गुजर जाऊँ।
किसी चिताऔं से सड़ते, किसी शाहर सें।

आँखे भर आएँ मेरी,
बैठा क्यों भिखारी, आपने कपड़े, फाड़ कर,
मजदूर, किसान, क्यों नारें लगातें, बीच बैठ के बजार में।
क्यों नहीं, तर्स आता उनको, जो बैठे है, रिशवत डकार कर।

हाँ, ‘मैं, बन बैठा, आज कुछ,
मगर कभी, ‘सीधी बात ‘तो, कहनें ना आई।
मगर लिख बैठा, कागज़ की ‘उस, डायरी में।
रात भर लिखता रहा, सुबह हूई, तो ढुंढने लग गया ,
कहाँ है, ‘तन्हाई, के कागज।

फिर ‘लार, अंदर निगलतें, ही, ‘गला, स घुटने लगता है, मेरा।
मेरी इस अकेले उज्जाड़ में,
जब दम सा घुटना लगता है, मेरा ।

फिर सोचू मैं, उस बड़े शहरों के लोग, कैसे जीते होगे,
रोनक भरी जिन्दगी में शायद वो,
‘दर्द’ सहने के काबिल, ‘होते’ होगे।

मिड़ल क्लास की भी, ‘क्या जिन्दगी,
जब कोई बोल दे, आपने ‘नीचे’ वालो को देख।
हाँ मैं, समझता हूँ, दर्द उनका भी,
जब कोई बच्चा चील गाड़ी, देखकर खुश हो जाएँ।

मुझे फर्क न पड़े, ‘अरे, उस जमाने की, बात करते हो,
शायद दोस्त थे, वो मेरे।
कुछ जानी, अनजानी बातें, मेरे पास से गुजर जाएँ,
मगर ‘तन्हाई, छोड़ जाएँ।

अगर कोई कहें,
मुझे बेटे की शादी में नही, ‘बुलाया, उसने।
मेरा बचपन का दोस्त था वो,
मगर आज बिमार है, हाल – चाल ही पूछ, आऊँ।

फिर भी, मगर वो ‘कहें, ये ‘शायद,
लालच के इरादे से ‘पहुँचा है, ये बहुत ‘गरीब’ है।
मगर मैं उसकी नब्ज ‘न, ‘पढ़, पाता,
आगर, आज मेरा, ‘तन्हाई, साथ न, होती।

फिर भी, मगर, मै ‘कहूँ, वो मेरा दोस्त है,
पोरस, जैसा, सब कुछ वार जाऊँ, उस ‘सिकन्दर, की तरह।

लेखक:
संदीप कुमार नर
बलाचौर