तुम आओगे ऐतबार था हमें

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इंतज़ार करना कितना असहनशील कार्य है। सामान्य संबंधों में इंतज़ार करना मन में खीज पैदा कर देता है उस व्यक्ति के लिए; परन्तु इंसान विवश है “इंतज़ार” शब्द के आगे, क्योंकि बिना इंतज़ार उसे कुछ नहीं मिल सकता। कहीं जन्म के लिए इंतज़ार, कहीं मृत्यु के लिए इंतज़ार, कहीं इंतज़ार ख्वाबों के पूरा होने का तो कहीं पैसे और शौहरत का। जीवन की हर क्रिया में यह ‘इंतज़ार’ विद्द्मान है; पर एक इंतज़ार ऐसा भी है जिसमें खीज नहीं मोहब्बत है और वो है अपने मेहबूब का इंतज़ार। मेरे द्वारा लिखीं कुछ पंकियाँ हैं जिसमें जुदाई, ऐतेबार, इंतज़ार, मोहब्बत, दर्द और मिलन की आस है।

 

तुम आओगे ऐतबार था हमें, अपनी मोहब्बत का इंतज़ार था हमें !

तेरे तस्सवुर में जो बितायी घड़ियां;
तेरी यादों से सजाईं मैंने जो कड़ियां;
गुजरे उन हर लम्हात से बहुत प्यार था हमें !
तुम आओगे ऐतबार था हमें !!

वो बेकस रातें और उनकी चुभन;
वो तन्हाई जिसमें खोया मेरा मन;
हुस्न-ए दीदार का तलबगार था हमें !
तुम आओगे ऐतबार था हमें !!

मेरी सांसें जो रुक रुक के चलती रहीं;
भीगी पलकें नदी बन के बहती रहीं;
ख्वाब मेरे सच होंगे यह एहसास था हमें !
तुम आओगे ऐतबार था हमें !!

गुजर गए बरस कितने इश्क-ए जुम्बिश अभी बाकी है;
चाहत है तुझे पाने की अभी दिल-ए इकरार बाकी है;
आ जाओ अब बसर नहीं होतीं रातें जुदाई की हमें !
तुम आओगे ऐतबार था हमें !!

तुम आओगे ऐतबार था हमें, अपनी मोहब्बत का इंतज़ार था हमें !

 

 

 


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