तुम कम से कम उसे देख तो पाते हो ना?

हिंदी कविता - तुम कम से कम उसे देख तो पाते हो ना

तुम कम से कम उसे देख तो पाते हो ना
उसे देख कर जी तो पाते हो ना
तुम कम से कम उसे देखकर, महसूस कर तो पाते हो ना
तुम कम से कम उसकी आंखों को पढ़ तो पाते हो ना
तुम कम से कम उन आंखों को पढ़कर, दिल को संभाल तो पाते हो ना
तुम कम से कम उस की खुशबू से महकती फिज़ाओं, को बदलता हुआ देख तो पाते हो ना
तुम कम से कम उसके कदमों की आहट, से बनती हुई तरन्नुम को सुनते पाते हो ना !!



शायद सब वैसा ना हो जैसा होना चाहिए था, या यूं कहें कि जैसा हुआ करता था
शायद अब उसके दिल नें, तुम्हें जरूरी समझना खत्म कर दिया है
शायद तुम्हारी मौजूदगी उसके लिए मायने नहीं रखती
शायद अब उसकी दुनियां तुम्हारे बिना ही हंसती है
शायद अब उसकी आदतें तुम्हारे बिना ही बदलती हैं
शायद अब हालातों ने उसे बदल दिया है
शायद अब अल्फाजों ने अपना जादू कम कर दिया है
शायद अब इश्क का नूर कहीं ढल गया है
शायद अब उसका दिल बहुत संभल गया है !!



तो क्या हुआ गर वह तुम्हें नहीं बताता, कि कल रात किस ख्वाब ने उसे बेहिसाब डराया था
उस पार उसे किस एहसास ने अपना बनाया था
तो क्या हुआ गर वह उंगलियों के पोरों से छूटी हुयी गिनतियाँ भूल जाता है
तो क्या हुआ गर वो सीढ़ियों पर उतरती हुयी पट्टियां झूल जाता है
तो क्या हुआ गर वह तो है यार तुम्हारे से इश्क सा, अब तुम्हें एक टक नहीं देखता
तो क्या हुआ गर वह तुम्हारे अफसाने सुनने नज़दीकी से नहीं बैठता
तो क्या हुआ गर आहिस्ते से तुम्हारे कंधे पर हाथ रखता हुआ तुम्हें जरूरी नहीं मानता
तो क्या हुआ गर वह तुम्हारे नजर आ जाने का इंतजार नहीं करता
तो क्या हुआ गर अब वो तुम्हारे सा तुम्हें प्यार नहीं करता
तो क्या हुआ गर उसकी धड़कनें अब किसी और के दीदार से रूकती हैं
तो क्या हुआ गर उसकी वो सख्त दाढ़ी किसी और को चुभती है
तो क्या हुआ गर अब वो किसी और की आँखें उसी अंदाज में पढ़ लेता है
तो क्या हुआ गर अब उन शामों को किसी और से लड लेता है
तो क्या हुआ गर अब भी तुम्हारी आज़ादी उसकी बाहों में कैद है
तो क्या हुआ गर अब उसकी बेबाकी उसके अल्फाजों में ज़ैद है !!




गर शुक्र किसी बात का है, तो है वह बस इतना कि तुम कम से कम उसे देख तो पाते हो ना ! अपनी आंखों से देखकर उसे महसूस तो कर पाते हो ना ! और उसे महसूस कर कर तमाम उम्र अपने पास मौजूद पा ही सकते हो ना ! और उस मौजूदगी को अपनी एहसासों में तब्दील कर पाते हो ना ! उन एहसासों को अपना जहान बनाकर जी तो पाते हो ना !!

महज़ यहीं ज़िंदगी है, इसके अलावा जो गर कुछ है तो वह ज़िंदगी जैसा गहरा वहम है ।

लेखिका:
वैदेही शर्मा