तुम महफ़िल में कुछ कहते नहीं – हिंदी कविता

Tum-Mehfil-Mein-Kuchh-Kahte-Nahi-Hindi-Ghazal-Kavita तुम महफ़िल में कुछ कहते नहीं

तुम महफ़िल में कुछ कहते नहीं और सुनते भी नहीं
पर ऐसा नहीं है कि हमारे इशारों को समझते भी नहीं

ये काले-काले मटमैले बादल उमड़ते हैं, बरसते नहीं
जरा इनकी बेशर्मी तो देखो, अब तो ये गरजते भी नहीं

बच्चों के हाथों में आ गईं जब से बाप की आस्तीन
ये बच्चे इज़्ज़त नहीं करते और खुदा से डरते भी नहीं

सरकारी फाइलों में कुछ यूँ दफ़्न हो जाते हैं मुद्दे
कि किसी को दिखते नहीं, तो बदतमीज़ गुज़रते भी नहीं

अपनी छत से उनकी छत तक इश्क़ की पतंगें थी बेतरतीब
अब तो नैनों के पेंच उलझते ही नहीं और सुलझते भी नहीं

हम आज़िज़ हो गए हैं इस ज़ुल्मपरस्ती की
अपना भी गर घर जले अब तो हम सुलगते नहीं



लेखक:
सलिल सरोज