हिंदी कविता – “वक़्त से कदम मिला के बढ़ती हुई ज़िन्दगी”

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कहते हैं “ज़िन्दगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते” हाँ यह बात बिलकुल सत्य है बीता वक़्त वापस नहीं आता। उम्र के पड़ावों को हम जैसे जैसे पार करते चलते हैं वैसे वैसे बीते हुए वो सभी पड़ाव हमारा अतीत बन जाते हैं। जीवन की मशगुलियत से जुदा होकर जब कभी हम एक पल को ठहरते हैं तो वह बीते हुए अनगिनत पड़ाव चाहे ग़म के हों या ख़ुशी के अनायास ही उमड़कर आने लगते हैं। अतीत , वर्तमान और भविष्य इन तीन अलग कालों में हम सब की ज़िन्दगी विभाजित है।

वक़्त से कदम मिला के बढ़ती हुई ज़िन्दगी !
कहीं गिर के फिर संभलती हुई ज़िन्दगी !!

पल जो छूट गया पीछे वो मेरा था ;
जिसमें एक सपना सुनहरा था ;
रात कि पहरी और सन्नाटों को तोड़ कर ;
सूरज कि किरणों सी निकलती हुई ज़िन्दगी !!

हैं ख्वाहिशों का ढेर और हसरतें बहुत ;
हो हर आशा पूरी की मन्नतें बहुत ;
उम्मीदों के गुलशन में एक कली बनकर ;
फूलों कि खुशबू सी बिखरती हुई ज़िन्दगी !!

हौसला खूब है ऊंचाइयों तक जाने का ;
बेशक झेलना पड़े हर दर्द ज़माने का ;
चल रहा हूँ रास्तों पर ठोकरें खा खा कर ;
हर मोड़ पर एक नया मोड़ लेती हुई ज़िन्दगी !!

वक़्त से कदम मिला के बढ़ती हुई ज़िन्दगी !
कहीं गिर के फिर संभलती हुई ज़िन्दगी !!

 

जीवन में ठहराव नहीं आता वो तो प्रगतिशील है, ठहराव जीवन का अंत है इसलिए मित्रों यूँ ही वक़्त से कदम मिलकर आगे बढ़ते रहिये।


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