हिंदी कविता – जिंदगी एक किताब

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जिंदगी में चलते-चलते जब भी हम कहीं ठहरते हैं तब जिंदगी के किताब के पिछले पन्नों को जरूर पलटते हैं। जरूरी भी है, तभी हम स्वयं को समझ पाते हैं आगे हमे क्या लिखना है अर्थात किस दिशा में जीवन जीना है, यह जान पाते हैं।

Zindagi-Ek-Kitab-Hindi-Kavita-Poem

जिंदगी ‘एक किताब’

जिंदगी की किताब में पन्ने कहानियों से भरे होते हैं
कुछ अधूरे, कुछ पूरे, बाकी कुछ कोरे होते हैं।

कुछ नटखट, निश्छल से बचपन की दुनियां बन जाते हैं
कुछ कल्पनाशील, कागज की नाव से सागर पार कर आते हैं
कुछ हँसी ठहाको और कुछ आँसुओ से समाते हैं
कुछ सुनहरे रंग बिरंगे, खुशियों से भरपूर होते हैं
कुछ पतझड़ से, बेरंग से, उदास और मजबूर होते हैं
कुछ रात से भी काले, छू लो तो जैसे शूल होते हैं !!

हर पन्ने में हर लम्हे की एक कहानी छपी होती है
आंखों की बयानी, शब्दों की जुबानी छपी होती है
हर किस्से में कुछ पात्र भी शामिल होते हैं
कभी हमें समझते और कभी खूब परखते हैं
हमारे लिखे में अपना भी वह लिख जाते हैं
कभी अपना बनते, कभी आघात भी कर जाते हैं !!

पन्नो को एक-एक कर जब भी पलटती हूँ
हर किस्से को अब मैं भी खूब परखती हूँ
हर भार मेरा है, यही निष्कर्ष पर निकलता है
जितना भी लिखा है, मैंने लिखा है
गिरना भी मेरा है उठना भी मेरा है
रुकना भी मेरा है चलना भी मेरा है
किताब मेरी है बिखरा हुआ हर रंग मेरा है

कुछ सपने मेरे मर भी गये
उन्हें जिंदा करने का अरमान, अब भी ख्याली है
चाहे अनचाहे अब भर ही गये
पर पन्ने अभी तो कितने ही खाली हैं
जिंदगी उदास तुम मुझे कितना भी कर जाना
नित खुशरंगों से भरते जाने की अब मेरी बारी है

खत्म नहीं हुई स्याही मेरे कलम की
आखिर पन्ना भरने तक स्वयं को लिखते जाना
अभी ये काम मेरा जारी है !!

लेखिका:
रचना शर्मा


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