हिंदी कहानी “18 साल एक दिन” भाग-2

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नेहा बोली अमित मैं मजाक के मुड में बिलकुल नही हूँ; तभी मास्टर जी आ गये। दोनों की बात लंच में फिर शुरू हुई , अमित नें साफ़-साफ़ कह दिया कि मुझे नहीं पता तुम क्या सोच रही हो पर मुझे लगता है हमें भाग चलना चाहिए। पर मैं यह नहीं जनता कि भागना गलत है या सही… लेकिन पिछले एक साल में ऐसा लगा कि तुम साथ हो तो जिंदगी ज़िंदगी आसानी से कट जायेगी। इस बात पर नेहा बोली पागल हो तुम; भागना आसन है क्या… क्या करेंगे भागने के बाद , कहां जायेंगे सोचा है? अमित आज मैं तुम्हारे साथ हूँ तो बस इसलिए कि मुझे लगता था तुम अलग हो और तुम भागने की सोच रहे हो। नेहा के हाथों को थामते हुए अमित नें कहा यार तुम्हारे पापा (गुजराल साहब) कभी नहीं राज़ी होंगे हमारी शादी के लिए। अमित के गाल खीचते हुए नेहा बोली बड़ी ज़ल्दी है शादी की तुमको! पता है मैं अभी बस 17 साल की हूँ।

दोनों के बीच मे धीरे-धीरे सब आम हो गया। रोज बात होने लगी, फ़ोन भी करने लगे दोनों एक दूजे को; लेकिन काल का चक्र कहिये या कुछ और एक रात अमित की आँखों से नींद गायब थी, पाठक जी की पिटाई को भी महीनो बीत चुके थे इसलिए उस दिन की पिटाई वो भूल चूका था। तभी तो रात में नेहा को फ़ोन लगा दिया और गुजराल साहब (नेहा के पापा) तो काले नाग की तरह कुंडली मार के बैठे थे दोनों की प्रेम कहानी पर; दुर्भाग्य की फ़ोन इस रात उन्हीं के हाथ लग गया। फ़ोन पर अमित की आवाज़ सुन उन्होंने पटक के तोड़ दिया और इस बार तो उन्होंने नेहा को भी खूब सुनाया। नेहा नें भी साफ़ कह दिया आज हो कल हो या कभी और शादी तो अमित से ही करुँगी। गुजराल साहब की बीवी और नेहा की माता जी नें कहा बेटी सारी उम्र यहीं रहो हम बैठा कर खिलाएंगे लेकिन हमारे परिवार में ये सब नहीं होगा। गुजराल साहब भी तनतनाते हुए बोले वो पंडित से बोला था लड़के को सुधार ले पर शायद सुनाई नहीं दिया उसे। पापा जी उसकी कोई गलती नहीं है जैसे ही नेहा नें यह कहा गुजराल साहब नें नेहा की तरफ़ गुस्से से नज़रे घुमाई और कहा तेरी गलती नहीं है तूने जो माँगा हमने दिया यही गलती है हमारी लेकिन तु मर या जिंदा रह तेरी शादी अमित से तो नहीं होगी।

शादी की बात!! अभी उम्र कितनी है इसकी? (नेहा की माँ बोली) गुजराल साहब बाहर चले गये तो माँ नें नेहा को समझाया बेटा देख तू ही नही है तेरी छोटी बहन भी तो है ना और पापा की इज्ज़त का क्या तुझे तो सब पता है कैसे ये घर बना है और कितनी मेहनत से पापा ने कंपनी खड़ी की है। नेहा गर्दन झुकाए चुप-चाप अपने पलंग पर चली गयी अब उसकी आँखों में अब सिर्फ एक सपना था अमित और नेहा साथ-साथ। जिसे कंपनी का नाम पूरी दुनिया मे करना था आज वो नेहा अपनी अलग दुनिया बनाने के ख़्वाब बुन रही थी। सुबह हुई गुजराल साहब नें कह दिया स्कूल जाने की कोई जरुरत नहीं , लेकिन नेहा की माँ के कहने पर भेज दिया। गुजराल साहब इस बार अमित के घर गये तो पाठक जी नें उल्टा सुना दिया कि लड़की संभाली जाती नहीं जाती और चले हैं हमको सीख देने। उन्होंने गुजराल को तो सुना दिया लेकिन अमित के आते ही कहा सुधर जाओ वर्ना मेरे हाथ से कुछ बुरा हो जायेगा। क्या पिता जी….अमित लड़खड़ाती जुबान से बोला जिस पर पिता जी ने अमित के कान खीचते हुए कहा कि थोडा बोले है ज्यादा समझना।

नेहा और अमित दोनों को ये बात समझ में आ गयी थी कि गुजराल हों या पाठक साहब कोई नहीं चाहता की हमारी शादी हो। अब दोनों अलग-अलग रहते थे स्कूल में भी कोई बात नहीं होती थी फिर भी प्यार कम नहीं हुआ। जिंदगी में उठा-पटक चल रही थी तभी तिनके का सहारा बन कर अमित की बुआ का लड़का आ गया; उसने सब सुना तो कहा बबुआ अभी भागे तो देखो नेहा नाबालिग है और तुम हो उससे बड़े तो बुरे फंस जाओगे। कुछ महीने और बीते और फिर 12वीं की परीक्षा शुरू हो गयी। बैचेनी और बढ़ने लगी क्योंकि इसके बाद मिलना तो दूर एक दुसरे को देख भी नही पाएंगे क्योंकि पता नहीं नेहा आगे की पढाई पंजाब से करेगी या कहीं और से लेकिन अमित क्या करे उसे समझ नहीं आ रहा था। अमित की ख़ामोशी उसके फ़ोन के बजने से टूट गयी नंबर अनजान था लेकिन फ़ोन उठाते ही जो आवाज सुनाई दी वो नेहा कि थी। अमित कुछ कहता उससे पहले नेहा नें कहा कि मुझे तुम्हारे साथ रहना है कुछ भी करो, अमित नें कहा 18वें जन्मदिन के अगले दिन मिलना तब बात करूँगा। पेपर खत्म हो गये परिणाम का इंतंजार होने लग इसी बीच नेहा की उम्र हो गयी “18 साल एक दिन” उसने फिर अमित को फ़ोन किया और चुपचाप दोनों पंजाब से दिल्ली के लिए निकल गये।

कल जो नेहा लड़ रही थी कि भागना गलत है आज वो अमित के साथ भाग रही थी। दिल्ली में वही बुआ का लड़का मिला लेकिन इस बार मदद मिली, नेहा और अमित की शादी भी करवा दी उसने और अमित की एक मेडिकल पर नौकरी भी लगवा दी। नेहा नें अपनी पढाई जारी रखी और इंजीनियरिंग पूरी की गुजराल साहब को पता तो चला की दोनों कहाँ हैं लेकिन उन्होंने कुछ किया नहीं क्योंकि जिसने आज तक नेहा को हाथ नहीं लगया वो उसे जान से मारने की तो सोच भी नहीं सकता था। पाठक साहब दिल के मजबूत थे अमित को अपनी जमीन से बेधकल कर के खुश हो गये। नेहा की नौकरी लगी तो पैसे ज्यादा जुड़ने लगे जिससे दोनों ने किस्तों पर अपना घर ले लिया। आज तो बेटी भी है उनकी एक; 18 साल एक दिन और उसके 10 साल बाद सब बदल गया था। गुजराल साहब अपनी पोती को देख कर खुश हैं लेकिन अमित उन्हें आज भी नहीं अच्छा लगता क्योंकि उन्हें लगता है कि वो नेहा के साथ सिर्फ पैसे के लिए है। नेहा को सब पता है लेकिन आज उसे फ़िक्र नहीं क्योंकि अमित उसके साथ है; उसे दुःख है तो इस बात का की पापा नें एक बार उसकी पसंद को परखा तो होता क्योंकि अगर ऐसा होता तो अमित और वो साथ होते अपने परिवार के 10 साल का वनवास न गुजराते दिल्ली में।

 

18 साल एक दिन, कहानी का पहला भाग -1 यहां पढ़ें


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