दीवारों के केवल कान नहीं आँखें भी होती हैं

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” सीता राम चरित अति पावन !
मधुर सरस अरु अति मन भावन !!
पुनि-पुनि, कितनेहू सुने सुनाये
हिय की प्यास, बुझत ना बुझाये !
सीता राम चरित अति पावन !
मधुर सरस अरु अति मन भावन !! “

सन 1987 दिन रविवार समय सुबह 9:30 मिनट पर टीवी सीरियल ‘रामायण’ की यह चौपाईयाँ गीत के रूप में शुरू हो जाती हैं।
उस ज़माने में शम्भू शर्मा ही अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिसके यहाँ टेलीविज़न था; अतः मोहल्ले के तमाम बुजुर्ग, परुष , महिलायें , नौजवान व छोटे बच्चे द्वार पर लगे शटर वाली टीवी के सामने ज़मीन पर बिछी दरी पर बैठ जाया करते। करीब 5 कट्ठे में फैला विशाल मकान जिसका अधकांश हिस्सा खपड़ैल और मिट्टी का था तो कुछ आगे का हिस्सा सीमेंट से पक्का करा दिया गया था।

शम्भू शर्मा के घर में 3 बेटे, 3 बहुयें और 5 नात नातिन थे जो अभी अपनी बाल्यावस्था में मगन विशाल घर में इधर से उधर दौड़ लगाते रहते। द्वार पर खड़ा नीम का पेड़ और गईया बछिया द्वार की शोभा बढ़ाते।

शम्भू शर्मा बड़े ही उदारवादी स्वभाव के इंसान थे ; रामायण के शुरू होने से पूर्व वे अपनी बहुओं को 25 – 30 आमदी के लिए चाय बनाने को बोल देते। ये 25-30 आदमी कोई और नहीं बल्कि मोहल्ले के लोग हुआ करते थे जो हर रविवार को रामायण देखने के लिए द्वार पर एकत्रित हो जाते थे।

रामायण शुरू हो चुका है, द्वार पर एकत्रित सभी दर्शक टकटकी लगाये सीता मईया, भगवान राम, भ्राता लक्ष्मण की वाणी को ध्यानपूर्वक सुन रहे हैं। बुजुर्गों का ध्यान भगवान राम के प्रवचनात्मक शब्दों पर होता, तो बच्चे उस इंतज़ार में रहते कि कब रावण आये, कब हनुमान आये, कब कोई राक्षस आये और कब तीर तथा गदा चले।
भगवन, भ्राताश्री, गुरुदेव व माता जैसे शब्द सुनकर सभी का मन आत्मविभोर हो उठता। इन शब्दों से निकलने वाली तरंगें घर के चारों कोनों में फ़ैल जाया करती। आधे मिट्टी और आधे सीमेंट का बना हुआ घर भी अपने कान व आँखें खोले यह मोहक दृश्य देखता रहता।

सोनू…सबको चाय पिलाओ बेटा,
द्वार पर बैठे टीवी देख रहे अपने नाती को शम्भू शर्मा आज्ञा देते हुए यह बात कहते हैं।

सोनू घर के अंदर प्रवेश करता है और पीतल के एक बड़े थाल पर सजे कुल्हड़ में चाय डालकर लाता है। चूंकि दर्शकों की संख्या 25 से 30 होती अतः सोनू को 2 से 3 बार चाय लानी पड़ जाती। मजा तो तब आता जब रामायण में किसी राक्षस का युद्ध, तीर-कमान और गदा का टकराव चल रहा हो और बाबा शम्भू शर्मा कह दें…सोनू बेटा सबको चाय पिलाओ !!
ऐसे मौके पर सोनू का मुँह लटक जाता और वो आधे अधूरे मन से यह सोचते हुए घर में प्रवेश करता कि हमको कुछ देखने ही नहीं देते, हम ही मिले हैं सबको चाय पिलाने के लिए।

टीवी पर रामायण का दृश्य –
“दुष्ट पापी तेरा सर्वनाश हो जाय ! ये ले मेरा प्रहार संभाल अपने आप को…”
टीवी पर आ रहा यह दृश्य अचानक झिलमिलाने लगता है।
बाबा शम्भू फिर बोलते हैं सोनू…जल्दी जाओ छत पर लगा एंटीना घुमाओ तो।

सोनू छत पर –
हा…हू , ही ही ही !! जैसी आवाजें टीवी से आ रही हैं किन्तु दृश्य स्पष्ट नहीं है।
सोनू, थोड़ा दायें घुमाओ…बस बस आ गया, अरे फिर गया !! बायें घुमाओ।
टन, टन तड़ाक, धड़ाक का दृश्य चल रहा है ऊपर छत पर सोनू यह दृश्य देखने को व्याकुल है।
मगर जैसे ही वो नीचे द्वार पर आता है, वह युद्ध का दृश्य समाप्त हो जाता है।
द्वार पर बैठे अन्य मोहल्ले के बच्चे वह दृश्य देखकर काफी प्रसन्न हैं किन्तु सोनू दृश्य देख न पाने से निराश बैठा हुआ है।

रामायण की लीला हर सप्ताह रविवार को यूँ ही चला करती।
रामायण की समाप्ति के बाद सभी दर्शक शम्भू शर्मा को प्रणाम दुआ सलाम करते, अपने-अपने घर या खेत की ओर प्रस्थान करते।
कच्चे मकान की दीवारों पर घर की बहुयें मिट्टी का लेप लगाती और आँगन को गाय के गोबर से लीप कर शुद्ध करतीं। पक्के मकान के हिस्सों को झाड़ू से साफ किया जाता और दीवारों पर चिपके मकड़ी के जालों को साफ़ किया जाता।
रविवार की सुबह ‘रामायण’ को समर्पित थी, तो बाकि समय घर की साफ़-सफाई और खान-पान में निकल जाता।

सभी बच्चे पक्के मकान की छत पर जाकर उछल कूद करते, शोर मचाते एक दूसरे से लड़ते झगड़ते गिरते पड़ते।
संध्या होते ही बाबा शम्भू सभी बच्चों को डांट लगाते हुए कहते – चलो कॉपी किताब उठाओ और लालटेन जलाकर अध्यन करो।
आज पहाड़ा कौन सुनाएगा ? वर्ड मीनिंग किस-किस ने याद की ?

घर की दीवारें शम्भू जी के वाक्यों को सुना करतीं और द्वार के चौखट नटखट बच्चों द्वारा हज़ारों बार लांघे जाते।
शरारतों का आलम यह था कि मिट्टी के दीवारों पर बच्चे अपने हाथ का पंजा बनाया करते। तो कोई इनको कुरेदकर मिट्टी निकाल देता, इन शरारतों से सभी को डाँट तो पड़ती पर माने कौन। छत पर पतंगबाज़ी, गिट्टी के खेल और रात को कथा कहानियों का सिलसिला चला करता।

द्वार पर लगा ऊँचा नीम का पेड़, झूला झूलने और दातून करने के काम आता।
पेड़ पर कौओं के साथ अन्य पंछियों का शोर दिनभर गूंजता रहता था। अंदर घर के झरोखे में गौरईया अपना घोसला बनाये बैठी रहती।
चूल्हे की आग में कच्चे आलू और कच्ची प्याज को पका कर खाने का शौक बच्चों को खूब था।

द्वार पर खड़ी गईया जब बान देती तो बाबा शम्भू फिर बोल पड़ते –
सोनू, देखो गईया को चारा लगा दो; थोड़ा पानी पीला दो !
सुबह गईया का दूध निकालने वाले भोला चाचा, सभी बच्चों को ताज़ा व कच्चा दूध पीने को दे देते हुए कहते – देखें भाई कौन जल्दी दूध पी जाता है ! अपनी बातों में उलझाकर वह सभी बच्चों को कच्चा दूध पीला देते।

जैसे जैसे वर्ष आगे बढ़ता जा रहा था सभी नन्हे बच्चे अपनी किशोरावस्था को प्राप्त करते जा रहे थे। 5 कट्ठे का विशाल घर बच्चों को बढ़ता अपनी आँखों से देख रहा था, मानो जैसे सभी बच्चे उसकी गोद में खेलकर बढ़े हों। घर के हर तरफ बच्चों की निशानियां अंकित थीं; किसी के हाथ के पंजे, किसी के द्वारा बनाये गए फूल, किसी के द्वारा खींची आड़ी तिरछी डंडियां तो किसी के द्वारा उतारे गये सीमेंट और मिट्टियां।
रंग बिरंगी पेंसिल से सभी ने अपना नाम यहां-वहां लिख रखा था, तो कहीं-कहीं क ख ग और A B C D भी लिखा हुआ था।
नीम के पेड़ पर लटके झूले पर झूलने की ज़िद सभी करते। बाबा शम्भू शर्मा एक-एक कर सभी बच्चों को झूलने का मौका प्रदान करते।
यह सिलसिला यूँ ही आगे बढ़ता गया और धीरे-धीरे सभी बच्चे बड़े होते चले गये।

बीते सालों में शम्भू शर्मा के घर का माहौल अब पहले जैसा न रहा। तीनों बेटे और उनकी पत्नियां अपनी-अपनी मर्जी के मालिक बन चुके थे। अपने बढ़ते बच्चों को शिक्षा देने के लिए सबने शहर की ओर भेज दिया। 2 बेटे तो अपनी पत्नी और बच्चे के साथ शहर को हो लिए और जो 1 बेटा घर में था वह भी शम्भू शर्मा से ज्यादा लगाव न रखता। द्वार पर पहले जैसी रौनक न थी, अब न कोई रामायण और न बहुत ज्यादा लोगों का जमावड़ा।

सन 1987 से लेकर वर्ष 2000 तक आते-आते घर का माहौल पूर्णतः ख़त्म हो चुका था।
सभी बच्चे अब बड़े हो गए थे जिनका आपस में मिलना भी संभव न हो पाता। सन 2005 तक शम्भू शर्मा के तीनों बेटों ने घर का बंटवारा कर लिया। द्वार पर खड़ा नीम का पेड़ काट दिया गया, जानवर की देखभाल कौन करेगा ये सोचकर गईया बछिया को बेच दिया गया। घर का आंगन, द्वार व छत सबने अपने हिस्से के अनुरूप बांटकर दीवारें खड़ी कर लीं।
2010 में शम्भू शर्मा की मृत्यु के पश्चात् स्थिति और भी भयावह हो गयी। घर के तमाम छोटे बच्चे जो कभी एक दूसरे के साथ खेला करते थे उनका एक दूसरे से मिल-पाना और घर आना अब संभव ही न था। बढ़ते बच्चों का आपसी प्रेम भी माता-पिता के आपसी ईर्ष्या की बलि चढ़ चुका था।

कभी रामायण के मीठे वचन, बड़ों की बातें, बहुओं की हंसी ठिठोली और बच्चों का शोर सुनने वाला घर अब वीरान हो चला था। न तो उसकी दीवारों से कोई खेलने वाला था न ही उसकी चौखट को लाँघ कर भागने वाला। ठीक किसी बूढ़े बुजुर्ग कि भांति घर अपने गोद में खेले बच्चों का इंतज़ार कर रहा था।

शहर में रहने वाले 2 बेटों ने अपना मकान शहर में ही बना लिया। जो बेटा गांव के घर में था वह अपने हिस्से के दायरे में ही रहता किन्तु उसके बच्चे भी रोजगार हेतु शहर में ही थे। शहर स्थित अपने-अपने घरों को सजाने में व्यस्त बेटे, पुराने घर का मरम क्या जानें !!
दिन प्रतिदिन जर्जर होता पुराना घर, किन्तु उसे सँवारने वाला कोई नहीं। वक़्त घड़ी की सुई जैसे घूमता हुआ और एक दशक को पूरा करता है। सोनू से लेकर अन्य छोटे बच्चे अब व्यस्क हो चले हैं।

वर्ष 2015, सोनू अपने पिता के साथ गांव स्थित अपने घर के हिस्से को बेचने के लिए आता है –
कितना बदल गया है यहाँ का माहौल…सोनू अपने मन में सोचते हुये स्वयं से ये कहता है।
कहाँ गये वो खुले मैदान, कहाँ गये वो लहलहाते खेत !!

आँखों से गांव के वर्तमान दृश्य को देखते हुए सोनू तलाश करता है उस पुराने दौर की जिसमें कभी उसने अपना बचपन गुजारा।
मुहल्ले की वो बूढ़ी दादी…नहीं है
अरे वो कालू कहां गया जो रामायण देखने आता था…
अरे मेरा स्कूल यहीं तो हुआ करता था, किसने तोड़ दिया…
यहाँ तो हम गिल्ली डंडा और पिट्ठू खेला करते थे…अब तो चारों तरफ सिर्फ ऊँचे मकान हैं!!

दृश्य देखते और खुद से बातें करता सोनू अपने घर के मुख्य द्वार पर खड़ा हो जाता है।
इससे पहले की वो घर को पहचानने की कोशिश करे; घर की दीवारें उसे पहचान लेतीं हैं।
दीवारों के केवल कान ही नहीं बल्कि आँखें भी होती हैं…भला वो अपने बच्चे को कैसे न पहचानें।

द्वार पे खड़ा टकटकी लगाये सोनू, घर कि वर्तमान स्थिति देख दुःखी हो उठता है।
उसका ह्रदय करुणा से भर आता है तथा आखें नम हो जातीं हैं।
मन में उठती बेचैनी और व्याकुलता पर काबू न पाते हुए सोनू अपने बचपन के घर में प्रवेश करता है।
सोनू को अपनी ओर आता देख, दीवारों की बूढी आखें फिर चमक उठती हैं…इस अहसास के साथ कि वो अब उनको छुयेगा सहलायेगा और उनका हाल भी पूछेगा।

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घर की दीवारों पर जमीं पपड़ी

सोनू ने जैसे ही दीवारों को स्पर्श किया, उसपर जमी धूल से भरी पपड़ी उतर कर गिर पड़ती है!
मानों जैसे सदियों बाद किसी को देखने पर आंसू छलक रहे हों।
दीवारें नम थीं, सीलन से भीगी हुई…जैसे कई दशकों से निकलते आंसुओं को उसने सोख रखा हो।
दीवारों की आँखें आज सालों बाद सोनू से नज़रें मिला रही थीं..
जहाँ-जहाँ सोनू दीवारों को स्पर्श करता वहां-वहां की पपड़ियां गिरती चली जातीं, ठीक आंसुओं की बूंद की तरह।

बेशक घर आज कई हिस्सों में विभाजित हो चुका है, किन्तु यादों का विभाजन संभव नहीं।
वो पुरानी कुर्सी जिसपर बाबा शम्भू शर्मा बैठते थे, उनकी लाठी जिसे लेकर वे चला करते थे ! ये सारी वस्तुयें अतीत में गुजरे पलों की याद दिला रहीं थीं।
घर में मिट्टी का बना हिस्सा जिसपर अब सीमेंट की चादरें चढ़ चुकी हैं…बस वही एक नया परिवर्तन था, किन्तु बाकी सारी स्थिति जस की तस है।
सोनू अपने पुराने घर को कुछ इस तरह देख रहा था जैसे हम कोई पुराना ऐतिहासिक क़िला अथवा राजाओं के महल को उत्सुकतावश देखते हैं।

घर के आँगन से होता हुआ सोनू छत पर जाने वाली सीढ़ियों पर चढ़ता है जहाँ कभी वो अपने चचेरे भाई बहनों के साथ उधम-चौकड़ी किया करता था।
छत की फर्श के कई हिस्सों पर सीमेंट टूट चुके थे, मानों जैसे कोई उसपर सदियों से गया न हो।
यहाँ-वहाँ बिखरे सामानों के बीच कुछ ऐसा भी वहां मौजूद था जिसे सोनू ने अपने हाथ में उठा लिया।
बाँस की लंबी डंडी…जिसपर कभी टीवी का एंटीना बांधा जाता था, वह एक कोने में पड़ी दिखाई दी।
सोनू उसे ठाकर उसी जगह पर खड़ा करने का प्रयास करता है जहाँ वो पहले हुआ करता था।

थोड़ा बायें घुमाओ…अरे थोड़ा दायें
बस बस आ गया , फिर चला गया।

इस वाक्ये को याद करते ही सोनू के चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है।…गुजर गया वो जमाना !!
छत के किनारों को घेरती हुयीं छोटी दीवारें भी यह दृश्य देख रही थीं। उन्हें भी यह ज्ञात है कि सदियों बाद कोई उनका अपना आया है।

छत का हाल देख कर सोनू पुनः नीचे आता है और द्वार से जुड़े एक बड़े कमरे में प्रवेश करता है जिसे उस ज़माने में ‘बड़ा हॉल’ कहा जाता था।
अंदर प्रवेश करते ही सोनू की नज़र हॉल की दीवारों पर उभरी उल्टी-सीधी कलाकृतियों पर पड़ती है।

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दीवारों पर बनी कलाकृतियां

ये कलाकृतियां कुछ और नहीं बल्कि – हाँथ के पंजों के निशान, क ख ग, A B C D, पंछियों के चित्र, कॉमिक्स के हीरो की आकृति, अपने लिखे नाम इत्यादि ज्यों के त्यों दीवारों पर उभरे थे।
जहां एक ओर हॉल की ये दशा अतीत को दर्शाती थी, तो दूजी ओर परिवार की लापरवाही को भी बयां कर रही थी…अपने शहर के मकान को सजाने वाले घर के बड़े सदस्य, पुरखों की विरासत को सजा न सके !! जहां सभी जन्में, बचपन को जिये…आज वो घर जर्ज़रता की स्थिति में था।

घर की दीवारों से अपने कान लगा सोनू उसमें दफ़्न आवाज़ों को सुनता है!
…आवाज़ें निकलती हैं रामायण के चौपाईयों की
…आवाज़ें निकलती हैं बाबा शम्भू शर्मा के बातों की
…आवाज़ें निकलती हैं चचेरे भाई बहनों की शरारतों की

सोनू अपने हाथों से दीवारों सहलाता है और फिर उनकी ओर देखता हुआ उनसे बातें करता है…मानों वो दीवारें न होकर साक्षात् मानव का रूप हों।
हां, सच में वे केवल दीवारें नहीं हो सकतीं जो बरसों अतीत को संजों के रख सकें।
यक़ीनन, वे दीवारें मानव का ही रूप हैं…जो अपने अदृश्य कान और आँख से गुजरे अतीत को बयां कर रही हैं।

सोनू अब एक वयस्क पुरुष है, वो ये निश्चित करता है की अपने घर के हिस्से को कभी नहीं बेचेगा।
वहां रह रहे अपने चाचा से बात करते हुए सोनू यह निर्णय लेता है कि वो सम्पूर्ण घर का फिर से कायाकल्प करेगा।
सोनू अपने मन की बात पिता को बताते हुए कहता है –
पिताजी, मैंने पुराने घर की दीवारों को फिर से मरम्मत कराने का फैसला किया है।
क्यों न हम कमजोर दीवारों को फिर से मजबूत बनायें और अपने अतीत को हमेशा संजों के रखें।
शहर की भाग-दौड़ में जब थकान का अनुभव होगा तो हम अपने पुरखों के घर में आकर विश्राम करेंगे।

सोनू आगे कहता है –
पिताजी इसे बेचकर क्या मिलेगा ? सिर्फ कुछ पैसे ही तो मिलेंगे !
मगर जो यादें यहाँ हैं उनका मोल पैसे से नहीं लगाया जा सकता।
बेटे सोनू की बात सुनकर पिता आत्मविभोर हो उठते हैं और उन्हें अपने बेटे का निर्णय स्वीकार्य हो जाता है।

सच में दीवारों के केवल कान ही नहीं बल्कि आँखें भी होती हैं !
सोनू को उनकी आँखों में अपने अतीत की परछाईयां दिखीं।

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा


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