काली – एक प्रेरणादायी कहानी

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काली एक प्रेरणादायी कहानी

शाम का वक़्त था , लता रोज की तरह आज भी बकरियां चरा कर अपने घर जा रही थी। हां वो लोग बकरियां पालते थे और मिटटी के बर्तन भी बनाने का काम भी किया करते थे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, घर में माँ-पिताजी व दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई था। लता सबसे बड़ी थी वह 17 वर्ष की होने को आयी थी परन्तु स्कूल का मुँह अभी तक नहीं देखा था उसने। लता अनपढ़ थी वह परन्तु उसके सभी भाई बहन स्कूल जाते थे। रंग बिलकुल काला और साधारण सा रूप लिए लता प्रतिदिन बकरियां चराने का कार्य करती।



ऐसा रंग और रूप लेकर आई हैं ना जाने कौन ब्याह करेगा इससे…!
मा-बाप , आस-पड़ोस सभी से इस प्रकार की बाते सुनना लता लिए आम बात हो गयी थी । नाम तो लता था परंतु सभी उसे ‘काली’ कहके बुलाया करते थे।
सदा ही उदास देखा था मैंने उसको, दिन भर वह घर के कामो में माँ का हाथ बटाती , मिट्टी के बर्तन बनाती और रोज शाम बकरियां चराने जाती बस यही दिनचर्या थी उसकी। कोई सखी सहेली भी नही थी , अपनी हमउम्र लड़कियों के लिए भी वह हँसी का पात्र थी।

प्रत्येक वर्ष पूरे भारत में नौ दिनों की शारदीय नवरात्रि श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। नवरात्रो में प्रत्येक वर्ष गरबा नृत्य आयोजन किया जाता था। पूरी कॉलोनी में नौ दिनों तक चहल-पहल रहती। नवरात्रो में रोज रात को माँ दुर्गा के समक्ष गरबा अथवा तरह-तरह के नाट्य-नृत्य की प्रस्तुति की जाती अंत में आरती होती और प्रसाद ग्रहण किया जाता। बड़ा ही सुंदर , भक्ति से पूर्ण मनमोहक दृश्य होता नवरात्री के दिनों में। प्रतिदिन नाट्य-नृत्य होते जिसमे लड़कियों को देवी का रूप धारण करना होता कभी माँ दुर्गा , कभी माँ सरस्वती तो कभी माँ काली।




साल में एक यही समय था जब मैं लता को खुश देख पाती। सदा उदास रहने वाली लता नवरात्रो में हमेशा खुश दिखाई दिया करती थी मानो जैसे उसके पर लग गए हों। क्योंकि जब काली माँ का रूप धारण करना होता तो लता को ही चुना जाता जिस बात से उसे अत्यंत प्रसन्ता होती। लता को नृत्य का शौक था इसीलिए जब उसे खुद को प्रस्तुत करने का मौका मिलता तो खुशी से उसके पाँव जमीन पर ना टिकते। वह भी माँ काली के रूप में स्वयं को इस प्रकार प्रस्तुत करती कि देखने वालो को लगता कि स्वयं माँ काली का शक्ति रूप अवतरीत हो गया हो। उसे उस रूप में देखकर मुझे उसमे अद्वितीय शक्ति का अहसास होता और इस वर्ष तो उसे नृत्य की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति का पुरुस्कार भी दिया गया।

वह पुरुष्कार पाकर अत्यंत खुश हुई और उन दिनों उसे अपने काले होने पर गर्व महसूस हुआ। सोचने वाली बात है कि वही लता जो हमेशा अपने काले रंग की वजह से उपहास का पात्र होती उसी काले रंग के वजह से ही उसे माँ काली के रूप के लिए चुना गया और वह अपनी नृत्य कला को प्रस्तुत कर पाई। कमी लता में नहीं उन सभी लोगो की सोच मे थी जो उसके काले रूप का उपहास करते थे।

क्या आपको भी खुद पर गर्व महसूस होता है ? अथवा आप भी अपनी शारीरिक बनावट, रंग-रूप की तुलना किसी अन्य व्यक्ति से करते हैं ?
मनुष्य की प्रवित्ति तुलनात्मक होती हैं और कभी-कभी हमारी यह तुलनात्मक प्रवृत्ति नकारात्मक रूप ले लेती है और तुलना से उत्पन्न घृणा व उपहास हमारे मनोबल को गिरा देता है।

ऐसी स्थिति में इंसान स्वयं को हीन समझने लगता है। रूप रंग, कद काठी तो अनुवांशिक रूप में हमे मिलते हैं और यह हमारे वश में नहीं हैं। कमियां किसमे नहीं होती, परंतु उन कमियों के अलावा बहुत सी ऐसी खूबियां होती हैं जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं।

No One Is Perfect, No Human Is Superior यह अंग्रेजी कहावत बिल्कुल सत्य है कोई भी स्वयं में पूर्ण नही है। आपको पता है कोई भी पूर्ण क्यों नही है ? क्योकि हमे यह याद रहे की हम सभी एक समान हैं, ताकि हम प्रत्येक इंसान का सम्मान कर सकें। प्रत्येक इंसान में खूबियां होती हैं, हुनर छुपे होते हैं हमें अपने अंदर छुपी खूबियों को तलाशना है। अतः अपनी विशेषताओं पर काम करिये खुद को आगे बढ़ने का मौका दीजिये, आप को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।




याद रखिये रात अगर काली ना हो तो हमें सुबह के उजाले का अहसास भी नहीं होगा। इस ब्रम्हांड में चाँद और तारे सदैव अपनी स्थिति में रहते हैं पर दिन के उजाले में उनका कोई अस्तित्व नही होता। चमकने के लिए उन्हें अंधेरी काली रात ही चाहिए, अतः रात का काला होना उसकी विशेषता है ना की कमी।

हर इंसान अपनी कमियों और खूबियों के साथ अपने आप में पूर्ण होता है, खूबसूरत होता है, विशेष होता है और सम्मान का पात्र होता है।

स्वयं की तुलना किसी से न करें – आप स्वयं में विशेष हैं।

लेखिका:
रचना शर्मा


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