मालती और बेटी की शादी – हिंदी कहानी

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मालती आज बहुत खुश , थोड़ी उदास और तनिक व्याकुल लग रही थी; आखिर हो भी क्यों न आज उसकी बेटी की शादी जो है। अपने जीवन में मालती नें बहुत संघर्ष किया उसके जीवन संघर्ष में उसका साथ निभाने वाली बेटी ‘मधू’ आज अपनी माँ से दूर होने जा रही थी। बेटी की जुदाई सोच कर मालती का दिल बैठा जा रहा था पर वो खुश भी बहुत थी क्योंकि अपनी बेटी को दुल्हन रूप में देखने का उसका सपना साकार होने जा रहा था । कुछ ऐसी ही स्थिति मधू की भी थी वो जानती थी कि उसके जाने के बाद उसकी माँ कितनी अकेली हो जायेगी। दोनों का मन एक दूसरे के विचार में खोया हुआ था और दूसरी तरफ घर में साज-सज्जा एवं मेहमानों का शोर जारी था।

12 फरवरी का यह दिन खास था, हल्की सर्दी और हल्की गर्मी के बीच विवाह का यह सुन्दर उत्सव सबके ह्रदय को उत्साहित कर रहा था। पुराने संदूक में रखीं वह पुरानी साड़ियां आज उनकी भी किस्मत जाग उठी थी। मालती नें संदियों से उन साड़ियों को संजों कर रखा था; साड़ियों का वह अदभुत संग्रह जिसपर अतीत की छाप स्पष्ट दिखाई दे रही थी। मालती अपने कमरे में थी.. अपनी साड़ियों और अपने अतीत के साथ, कुछ छण में ही वो अतीत के सागर में इसकदर डूब गई मनो शादी उसकी बेटी की नहीं स्वयं मालती की हो। वो सितारे जड़े लाल रंग वाली साड़ी अपने हाथों में लिए आईने के सम्मुख खड़ी थी..सिर पर काले घने बालों के बीच कुछ चांदी जैसे सफ़ेद चमकदार बाल उसकी ढलती उम्र का परिचय दे रहे थे । चेहरे कि लालिमा , सुरमई आँखें , गोरे गाल , होंट और ललाट जिनपर वक़्त बुढ़ापे कि मुहर लगा चुका था; पर मालती को इसकी फिकर कहाँ वो तो अपने आप को दुल्हन मान बैठी थी। सितारे जड़े लाल रंग वाली साड़ी नें मालती के पूरे बदन को किसी सर्प की भाँती लपेट लिया था जिसमें मालती लगातार जकड़ती जा रही थी। सितारों से जुसज्जित लाल साड़ी की यह जकड़न मालती के दुल्हन भाव को साकार कर रही थी। मालती पूर्णतः अतीत के गिरफ्त में थी, खुद को साड़ी में देख उसे वह दिन याद आ गए जब वह दुल्हन बन इस घर में पधारी । अतीत कि पुनरावृति से उसका मन प्रफुल्लित हो उठा अब उसे लाल साड़ी के जकड़न से आज़ाद होना मंजूर न था ….. तभी….!

ठक … ठक…..माँ… माँ , बेटी मधू दरवाजे पर आवाज लगा रही थी । पर कमरे के अंदर खड़ी मालती इसबात से बेखबर स्वयं को आईने के अंदर निहारे जा रही थी ; ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों मालती को कुछ सुनाई न दे रहा हो । दरवाजे पर हाथ से लगातार पड़ने वाली थाप नें कुण्डी को हिला कर रख दिया और वह बंद दरवाजा जिसमें मालती दुल्हन रुपी साड़ी में खोई हुयी थी खुल उठा । दरवाजे का यूँ अचानक खुलना भी मालती के ध्यान को भटका न सका, पर बेटी मधू नें उसे स्पर्श किया…माँ । बेटी का भावपूर्ण स्पर्श पा कर मालती का ध्यान भंग हुआ वो शर्म से झुक गई। उसे ऐसा लगा कि बेटी मधू क्या सोचेगी उसे इस हालत में देख कर । अपनी माँ को सितारे जड़ी लाल साड़ी में देख मधू मुस्काई और बोली माँ तु कितनी सुंदर लग रही है । मालती निरुत्तर थी…क्या कहती उसे कुछ न सूझा ; दिखावटी घबराहट की आड़ में उसने बेटी को कहा मैं तो तेरे लिए ही ये साड़ी निकाल रही थी । निकालते वक़्त यह सोचा की जरा अपनें तन पर डाल कर देख लूँ कि ये तुझपर कितनी सजेगी । माँ और बेटी के बीच यह प्यारी गुफ्तगू चल ही रही थी कि पड़ोस में रहने वाली प्रभा कमरे में आ धमकी।

प्रभा वैसे तो मालती की खास सहेली थी पर वो मधू से भी कम मजाक नहीं करती और आज तो शादी का पर्व था तो उसे एक विशेष वजह भी मिल गयी थी । प्रभा नें मधू से मजाकिया लहजे में पूछा क्यों री…अपने पिया के गाँव जा कर मुझे क्या याद रखेगी ? अब तो तेरा ध्यान उनपर ही रहेगा, है ना ……इस प्रसंग को छेड़ कर प्रभा नें ग़मगीन माहौल को हास्य में परिवर्तित कर दिया । उसकी बातें सुन मधू और मालती दोनों के चेहरे पर मुस्कान छा गई । प्रभा की बेटी शीतल जो मधू के साथ ही पली बढ़ी थी अपने हाथों में मेहंदी की कटोरी लिए आवाज लगते आई …. मधू मधू । ओह्हो लाजो यहां छुपी बैठी है, देखो तो जरा आज इसका ब्याह होना है और हाथ अभी तक सूने । मधू नें जवाब दिया , हाथ तेरी वजह से ही तो सूने हैं तू तो कह गयी थी कि मैं रात में ही आ जाउंगी मेहंदी लगाने … क्यूँ अब बता शीतल कि बच्ची यह रात है या दिन !! मालती नें भी बीच में कहा अब तुम दोनों आपस में ही लड़ती रहोगी या मेहंदी लगाओगी । प्रभा बोली चल मालती दोनों बेटियों को अपना काम करने दे, हम बूढी औरतें अपना काम करें । ऐसा कहते हुए मालती और प्रभा कमरे से बहार आ गयीं , शादी का दिन था घर में आगंतुकों का आना जाना लगा था । मालती से भला कहाँ इतना कुछ संभल पाता यह उसके अच्छे कर्म ही थे कि गांव के लोगों नें उसकी खूब मदद की ।

गांव के प्रधान भी मालती के द्वार पर आ पहुंचे थे यह देखने की समारोह की तैयारियां कैसी चल रहीं है । प्रधान जी का शुभ नाम गुणीराम था, जैसा नाम वैसा काम गुण ही गुण भरे थे गुणीराम में तभी तो आज तक प्रधानी का चुनाव नहीं हारे। मालती नें गुणीराम के घर में काम कर अपना जीवन गुजारा और बेटी मधू को पढ़ाया ; गुणीराम को वह पिता समान मानती थी । मधू की शादी का सारा खर्च गुणीराम पर ही तो था यहाँ तक की वर की खोज भी प्रधान गुणीराम नें ही की थी । द्वार पर खड़े गुणीराम को देख मालती दौड़ती बहार आयी, गुणीराम नें पूछा का मालती कुछ जरूरत तो नाहीं है ना ?? मालती नें उत्तर दिया मालिक सारी जरूरत तो आपैं पूरी की हैं अब हम का माँगी । आपै के दुआ से तो हमार बिटिया आज ब्याही जा रही है वरना हमरी का औकात जो एतना धूम धाम से बेटी के ब्याह करी । मालती की बात ख़तम होते ही गुणीराम नें कहा अच्छा सुन, शम्भू आये रहा हमरे पास । शम्भू का नाम सुनते ही मालती के कान खड़े हो गये बोली ऊ अब का लेये आया है ? जीवन भर हमका दुःख दीहे अब ओह-के का लेना कि इहाँ आ गया ।

शम्भू मालती का पति था पर पति की जिम्मेदारी उसनें कभी अदा नहीं की । जाने मालती जैसी सुन्दर और सुशील लड़की उसके भाग्य में कहाँ से आ गयी । गुणीराम बोले , देख मालती भले तोके बुरा लगे पर हम शम्भू के इहाँ घुसने ना दिए । ऊ ससुरा पति अउर बाप कहलाये के लायक नाहीं । गुणीराम की बातें सुन मालती की आँखें गीली हों आयीं ; यह देख प्रधान जी बोले तू का रो रही है रे । उ पगलवा के लिए का आँसूं बहाना ! तोहार जीवन बर्बाद किया ऊ, बेटी देके साला जानें कौन दुनियां में जा बसा। अइसा कउन बाप है जो अपना परिवार का दुर्गति करे ! वइसे शम्भू अब ज्यादा दिन जीवेगा नाहीं …शकल से और शरीर से ऊ अब ख़तम हो चुका है दारू पी पी के। प्रभा भी बीच में बोल पड़ी ठीक कीहे मालिक ऊ करम जला; का करी आके। मालती तो सारा जीवन दुःखियारी बन कर रह गई ; कहे-के माँग में सिन्दूर पर….पति होकर भी ना ! चारों तरफ मचे कोलाहल के बीच गुणीराम , मालती और प्रभा की बातों नें अपना एकांत खोज लिया था यह जान पड़ता था कि उनको ये सुध न हो कि उनके आस – पास क्या हो रहा है । बातों की मशगूलता उधर मधू और शीतल में भी थी । देखते ही देखते दिन साँझ में प्रवेश कर गया ; विवाह की सारी तैयारियां पूरी हो चूंकि थीं इंतज़ार था तो केवल बारात आने का ।

माँ मालती और बेटी मधू एक बार फिर साथ एक कमरे में थीं । सितारे जड़ी लाल साड़ी मधू के हाथ में देकर मालती नें कहा , बेटी यह मेरे सुहाग की निशानी है जो मेरी शादी के वक़्त उन्होनें दी थी । मधू जिसनें अभी तक अपने पिता की सूरत को नहीं देखा था आज उसका भी दिल यह जानने को किया कि आखिर उसके पिता हैं कौन और कहाँ हैं । मालती निःशब्द खड़ी रही…पर मधू नें यह सवाल फिर उसके आगे रख दिया ; बताओ माँ कौन हैं मेरे पिता ? मालती जुबान लड़खड़ाते हुए बोली बस यही जान बेटी की तेरे पिता हैं भी और नहीं भी । इतना कहने के बाद मालती नें मधू को वह सितारे जड़े साड़ी पहनाने लगी, मधू कुछ और पूछ न सकी । गाजे-बाजे के शोर के साथ बारात दरवाजे आ लगी थी , गुणीराम व् गांव के अन्य लोग बारात की आव-भगत में लग गए। फिर शुरू हुआ द्वार पूजन का सिलसिला ; घर के छत पर खड़ी पास-पड़ोस की महिलाएं आतुर होकर दूल्हे की एक झलक पाने की ओट में थीं, पर दूल्हे को सबसे पहले देखने का सौभाग्य शीतल को प्राप्त हुआ । शीतल , मधू की सहेली थी अतः उसनें ये सुनिश्चित किया कि वो मधू को उसके होने वाले पतिदेव की शारीरिक सुंदरता से अवगत करायेगी । यह विचार मन में लिए शीतल मधू के कमरे में गई जहाँ उसकी माँ मालती भी थी । शीतल के थिरकते हुए कदम अचानक जकड़ गये; शायद उसनें मधू को कभी इतना सजा-धजा नहीं देखा था । पति की सुंदरता का बखान करने चली थी मगर मधू के दुल्हन रुपी रूप को देखकर वह मधू की सुंदरता का बखान करने लगी । मधू को यह अदभुत सुंदरता प्रदान करने वाली कोई और नहीं बल्कि स्वयं उसकी माँ मालती ही थी ।

ज्यों ज्यों विवाह की रस्में आगे बढ़ रहीं थीं मालती को बेटी के ना होने की चिंता खाये जा रही थी । सब ख़ुशी मंगल निपट गया, रात्रि का अँधेरा छंट कर भोर का रूप ले चुका था बस सूरज की लालिमा न थी । शरद ऋतु में सूरज भी अपनीं आँखें देर से खोलता है। मधू अपनी सहेलिओं का सहारा लिए धीरे-धीरे डोली के पथ पर अग्रसर हो रही थी । दो दिन से हो रहे गाजे-बाजे का शोर , सहेलिओं की शरारतें और हंसी मजाक सब कुछ रुक चुका था। ओस की मोटी बूंदों के समान सबकी आँखों पर पानी एकत्रित हो गया था । अब वह बेला आन खड़ी थी कि मधू अपनी माँ मालती से अंतिम विदाई ले। मालती नें अपनी बेटी मधू को अपनी बाँहों में जकड़ लिया और फिर आँखों से पानी का वो प्रवाह निकला जो थमने का नाम न ले । वहाँ एकत्रित सभी लोग करुणा भाव से यह दृश्य देख रहे थे। साहस कर गुणीराम नें मालती को मधू से अलग किया ; प्रभा और शीतल मधू को इस प्रकार लेकर जा रहीं थीं जैसे कोई किसी को खींच कर रास्ते से हटाता है । मधू अब डोली में सवार हो चुकी थी….माँ माँ करुणामयी कंठ से निकलती आवाज़ मालती के कानों तक पहुँच पानें में असमर्थ थी ।

कुछ दूर मालती नें जाती हुई बेटी की डोली का पीछा किया पर बूढी औरत ज्यादा दूर चल ना सकी । खेतों के मेढ़ पर बैठी मालती तब तक जाती डोली को देखती रही जब तक उसकी नज़रों से वो दृश्य ओझल न हो गया । बेटी का बचपन, उसकी हँसी, उसकी शरारतें, उसका प्यार…सब मालती के ख़यालों में उमड़कर आ रहा था । मालती अब अकेली हो गयी थी पूरी तरह अकेली अब उसके पास कोई न था सिवाय यादों के।

 

 

 


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