“नया सवेरा” हिंदी कहानी

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माँ मैं स्कूल जा रही हूँ, यह कहते हुए रश्मि घर से स्कूल की ओर निकल पड़ी। घर से कुछ दूरी पर ही रश्मि की सहेली सीमा का भी घर था। दोनों साथ ही स्कूल जाया करतीं थीं। हमेशा की तरह आज भी रश्मि ने सीमा को अपने साथ ले लिया। दोनों पक्की सहेलियां थीं और पढ़ाई-लिखाई में भी दोनों बहुत होनहार थीं । इस बार कक्षा 12वीं की परीक्षा देनी थी, तो दोनों इस बार खूब मन लगा कर पढाई में लगी हुई थीं। रश्मि के पिता गांव के प्रधान थे और सीमा के पिता की खुद कि बर्तनों की दूकान थी। रश्मि का एक बड़ा भाई जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था और सीमा की एक छोटी बहन थी जिसका नाम गुड़िया था, जो अभी सिर्फ 4 वर्ष की हुई थी । स्कूल जाने के लिए उन्हें ऑटो रिक्शा से शहर जाना पड़ता था क्योंकि गावं में प्राइमरी स्कूल सिर्फ कक्षा 8 तक था। जिसे भी उससे आगे पढ़ना होता वे शहर के स्कूल में दाखिला लेता था। शहर ज्यादा दूर न था ऑटो रिक्शा से जाने पर सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर थी । गावं में कितनी ही लडकियां कक्षा 8 तक पढ़ने के बाद स्कूल ही नहीं जाती थीं; क्योंकि शहर में अपनी लड़की पढ़ने भेजना उनके माता-पिता की नजर में सही न था। कुछ ऐसा भी मानते थे कि लड़की को आगे पढ़ने की जरुरत क्या है? इतना पैसा लगाओ और फिर ब्याह भी तो करना है; दहेज कैसे देंगे तो? अन्य अभिभावक लड़की की सुरक्षा के बारे में सोच कर उन्हें शहर पढ़ने नहीं देना चाहते थे।

स्कूल पहुंचकर जैसे ही कक्षा शरू हुई टीचर नें वार्षिक परीक्षा का टाइम टेबल बता दिया, मार्च महीने की 2 तारीख से परीक्षाएं शुरू हो रही हैं उन्हें यह भी समझाया की वह 12वीं कक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद आगे कौन-कौन सी पढ़ाई कर सकती हैं और उन्हें पढ़ना क्यों जरुरी हैं। टीचर की बातों को रश्मि और सीमा दोनों ही बड़ी ध्यान से सुन रही थीं। बस क्या रश्मि और सीमा दोनों ने ठान लिया था की वह आगे भी पढ़ाई जरूर करेंगी और खूब मन लगा परीक्षा की तैयारी करने लगीं। इतना ही नहीं दोनों घर आकर घरेलू कामकाज में अपनी माँ का हाथ भी बटाती थीं। परीक्षाएं शुरू हुईं, दोनों ही सहेलियों नें अच्छी तैयारी कर रखी थी; हर प्रशन पत्र के साथ उनका प्रदर्शन अच्छा होता जा रहा था। आखिरकार सभी प्रशन पत्र समाप्त हुए जिसके साथ परीक्षाएं भी समाप्त हो गयीं। अब रश्मि और सीमा दोनों ही अपने-अपने रिजल्ट के इन्तजार में लगीं थीं।

इन्तजार का समय बीत गया और 10 जून को रिजल्ट अखबार में प्रकाशित हुआ। सीमा अपने हाथ में अखबार लिए 12वीं कक्षा का रिजल्ट देखते ही भागते हुए रश्मि के घर पहुंची। दोनों अपना रोल नंबर प्रथम श्रेणी के कॉलम में ढूंढ रही थीं और वही हुआ जो हमेशा होता आया था। दोनों नें ही 12वीं की परीक्षाएं ‘प्रथम श्रेणी’ से उत्तीर्ण की। दोनों बहुत खुश थीं और अब वह आगे क्या पढ़ें कहां दाखिला लें उसकी सोच में पड़ गयीं। चूँकि गावं में लड़कियों का 8वीं के बाद पढ़ना मुश्किल था; परन्तु ये दोनों 12वीं पास कर चुकी थीं; फिर दोनों ने निश्चय किया की वो आगे और पढेंगी अपने पैरो पर खड़ी होंगी l

12वीं के रिजल्ट आये अभी कुछ दिन ही बीते थे कि एक दिन शाम के वक्त रश्मि की माँ रश्मि के पिता की पंचायत भवन से घर आने की राह देख रही थीं शायद उन्हें उनसे कुछ जरुरी बात करनी थी, वैसे राह तो वह रोज ही देखा करती थी पर आज कुछ अधिक व्याकुल लग रहीं थी। रश्मि के पिता घर आ आये , आकर हाथ मुँह धोकर बैठे ही थे कि रश्मि आकर अपने पिता जी से बोली ” पिता जी मुझे आगे और पढ़ाई करनी है भैया की तरह मैं भी आगे पढ़ना चाहती हूँ मेरा रिजल्ट भी तो बहुत अच्छा आया है; आप मेरा दाखिला शहर के डिग्री कॉलेज में करा दो “। इतना रश्मि नें कहा ही था कि रश्मि की माँ जिससे पहले से रश्मि के पिता से बात करनी थी आकर बोली … क्या आगे पढ़ना है? अरे क्या करोगी आगे पढ़ कर! अरे हम तो तुम्हारे पिता जी से आज ही कहने वाले थे की लड़की बड़ी हो गयी है। अब तो 12वीं पास भी कर ली; शादी के लिए रिश्ता देखो और तुम कहती हो आगे पढ़ना है!! रश्मि बोली हां माँ टीचर जी नें हम सभी को समझाया था की पढ़ना कितना जरुरी है। हम आगे पढ़ेंगे तो भविष्य में अपने पैरो पर खड़े होने के काबिल बनेंगे। अरे..बिटिया तुम्हारी देख-रेख के लिए हम हैं ना! तुमको और कुछ करने की ज़रूरत नहीं है; और तुम्हारी शादी अच्छे घर में ही करेंगे ताकि तुम्हें कोई दिक्कत ना हो आगे और जहाँ भी तुम्हारी शादी होगी तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हें नौकरी थोड़े ही करने देंगे! ज़माना कितना भी बदला होगा, मगर आज भी अच्छे घर के लोग अपनी बहु बेटियों से नौकरी नहीं करवाते।

रश्मि के पिता बोले, रश्मि बेटा तुम्हारी माँ सही कह रही हैं कोई जरूरत नहीं है आगे पढ़ने की और कॉलेज में तुम दाखिला के लिए बोल रही हो वहां तो लड़का लड़की साथ-साथ पढ़ते हैं। हमने तो तुम्हें 12वीं तक पढ़ने के लिए शहर जाने की इजाजत दे दी थी क्योंकि वहाँ लड़कियों का ही स्कूल था। रश्मि की माँ नें कहा बिटिया ज़माना बहुत खराब है कुछ ऊंच-नीच हो गयी तो तुमसे ब्याह कौन करेगा?। रश्मि बोली, पर सीमा के पिताजी तो उसे आगे कॉलेज में दाखिला दिलवाने के लिए राजी हैं; हम दोनों साथ ही जायेंगी पढ़ने हम अकेले कहां होंगे माँ?। इतना सुनते ही रश्मि के पिता गुस्से से भड़क उठे दिमाग खराब हो गया है…. चीख कर बोले, दूसरा जो कर रहा है करने दो उन्हें जो करना है। पर तुमको पढ़ लिख कर आगे कलेक्टर नहीं बनना! चूल्हा चौका ही करना है अब तुम घर के कामकाज में ध्यान दो सिर्फ। इतना कह, रश्मि के पिता जी गुस्से से अपने कमरे में चले गए और रश्मि की माँ पिता जी के सामने कुछ ना कर सकी।

आनन फानन अगले ही महीने रश्मि के पिता जी नें रश्मि की शादी भी तय कर दी। लड़का भी अच्छा था पढ़ा लिखा, सरकारी बैंक में CA की पोस्ट पर कार्यरत था घर परिवार में पैसे रूपये की कोई कमी नहीं थी। अपने माता-पिता का बड़ा लडका था छोटा भाई अभी पढ़ाई कर रह था ; रश्मि की शादी तय तारीख पर हो गई। और अब रश्मि के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो गया था। दूसरी तरफ सीमा नें कॉलेज में दाखिला ले लिया था और अब वह पढ़ाई पूरी करने में लग गयी पढ़ने में होशियार तो थी ही, तो उसने कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपना ग्रेजुएशन पूरा कर लिया । प्रथम स्थान प्राप्त करने की वजह से सीमा को आगे और पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति भी मिल गयी। सीमा के पिता नें उसे आगे पढ़ने की भी मंजूरी दे दी। सीमा नें एम.ए पूरा किया और यह सिलसिला चलता ही चला गया।

समय का पहिया अपनी तीव्र गति से घूम रहा था; पूरे छः वर्ष बित चुके थे। इधर सीमा पढ़ाई पूरी कर शहर के ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थी और सीमा की भी शादी हो चुकी थी। उधर रश्मि अपनी गृहस्ती में पूरी तरह रम चुकी थी, इन छह वर्षो में रश्मि ने एक नया जन्म ले लिया था उसकी दो बेटियाँ हो गयीं थी। बड़ी लड़की तीन वर्ष व् छोटी लड़की जो अभी सिर्फ दो साल की थी। रश्मि के सास-ससुर दो बेटियाँ होने की वजह रश्मि से नाखुश थे और अब डॉक्टर नें भी कह दिया था कि रश्मि तीसरी बार गर्भवती नहीं हो पायेगी l रश्मि जो एक आत्म विश्वासी लड़की हुआ करती थी वह घर की चार दीवारी व् जिम्मेदारियों के बीच कंही खो सी गई थी। बस अब उसे पति , बच्चों और गृहस्ती की ही सुध रहती इसके आलावा उसके जीवन का कोई उद्देश्य नहीं बचा था।

सब कुछ अपनी गतिशीलता के साथ चल रहा था कि अचानक रश्मि की जिंदगी में तूफ़ान आ गया और समय की ऐसी गाज गिरी जिसने सब कुछ तहस नहस कर दिया रश्मि के पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी। रश्मि की आँखों के सामने जैसे अँधेरे सा छा गया उसे जीवन ख़त्म सा लग रहा था वह एकदम अकेले हो गई थी। अब जीवन में कुछ भी दिखाई दे रहा था पर बच्चों को देख उसने खुद को संभाला। रश्मि का जीवन उदासीन सा हो चला था सास-ससुर पहले ही पोता ना होने की वजह से दुःखी थे रश्मि से और अब उनके बेटे के जाने के बाद रश्मि व् उसकी दो बेटियां उन्हें बोझ सी लगने लगी थी; जैसे मानो उनसे उनका कोई रिश्ता ना हो। अब उन्हें वारिस देने वाली छोटी बहू घर में आ चुकी थी। रश्मि बहुत ही असहाय महसूस करने लगी थी उसे अपने और बच्चियों के भरण-पोषण तक के लिए सास ससुर के सामने हाथ फैलाने पड़ते। एक दिन आया की उसके सास ससुर नें रश्मि से कहा कि अब वो यहाँ ना रहे, अपने मायके चली जाय और देवर देवरानी नें भी उसका साथ ना दिया। अंततः वह अपनी बच्चियों के साथ अपने मायके माँ पिता जी के पास आ गयी।

यहां मायके में भी अब पहले जैसी बात कँहा रह गयी थी, माँ पिता जी अब बूढ़े हो चले थे। पिता जी तो लकवे शिकार हो गए थे उन्हें लाचार रूप से दिनचर्या बिस्तर पर ही बितानी पढ़ रही थी। भैया की शादी हो गयी थी, भाभी अब घर संभालती थीं और भैया शहर में नौकरी करते थे। माँ की अब कुछ भी ना चलती थी; फिर भी मायका माँ का घर होता है रश्मि को यहाँ कुछ सुकून था। बच्चे भी नाना नानी के दुलारे थे, भला वो क्यों उन्हें कुछ कहे । अब बात थी घर की आर्थिक व्यवस्था की जो एक व्यस्क (रश्मि) और दो बच्चियों के आने से डगमगा रही थी। घर में सभी उसे और बच्चों को बहुत प्यार करते, भर कोशिश उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने देते। समय बीतता गया घाव भरने लगे थे, दो वर्ष हो गए रश्मि को अपने मायके में रहते हुए। जैसे जैसे उसकी लडकियां बड़ी हो रही थीं वैसे वैसे रश्मि को अपनी बेटियों के भविष्य की चिंता सताने लगी थी। उसका और बेटियाँ का बोझ आखिर कब तक भैया भाभी उठायेंगे मन ही मन अब वह खुद को बहुत कमजोर व् असहाय महसूस कर रही थी।

इन्हीं दिनों सीमा भी अपने मायके आयी; अपनी माँ से रश्मि के बारे में सुनकर तुरंत ही उससे मिलने चली आयी आज बचपन की सहेलियां फिर से एक बार आमने सामने थी। दोनों के आँखों में आंसू थे गम और ख़ुशी के भाव दोनों के ही आँखों में झलक रहे थे । मानो जैसे बचपन से साथ बिताये हर पल का सफर पलक झपकते आँखो के सामने से गुजर गया हो। सीमा बोली कैसी हो रश्मि? कितने साल हो गए तुझसे मिले हुए और ये सब क्या हो गया । उदास स्वर में रश्मि बोली सब समय का खेल है और उदासीनता के साथ मुस्कुराते हुये उसने कहा आ बैठ। तू बता तू कैसी है बड़ी मेडम जी दिख रही है; हाँ रश्मि अब मैं प्रोफेसर हूँ कॉलेज में; तू बनना चाहती थी ना टीचर मुझे आज भी याद है। पर देख मैने बाजी मार ली, इतना कहकर सीमा हँस पड़ी; रश्मि सीमा के आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व को बस निहारे ही जा रही थी। सीमा की बातों में उसका ध्यान अब ना था, कही ना कही वह खुद की तुलना सीमा से करने लगी थी। खुद को उससे बहुत ही कम आंक रही थी और तुलना भी क्यों ना करती एक समय पर दोनों एक दूजे से कम ना थे, पर आज उसे सीमा को अपने पैरों पर खड़े देखकर उसे उसके आत्मनिर्भता से जलन सी होने लगी थी और अपनी निर्भरता पर अफसोस । वह एक गहरी सोच में डूब चुकी थी; रश्मि … रश्मि सीमा की आवाज़ से उसका चिंतन भंग हुआ ! सीमा बोली कहाँ खो गई? कुछ मत सोच सब ठीक हो जायेगा मैं अब चलती हूँ शाम को ही वापस जाना है कॉलेज में कल से परीक्षायें शुरू हैं ।

सीमा के जाने के बाद भी रश्मि यूँ ही काफी देर तक आँगन में खेलती हुई अपनी बेटियों को देखती रही; शायद उसकी अंतरात्मा उसे आवज़ दे रही थी कि अँधेरे की चादर जो चारो ओर फैली हुई है उसे हटाने का समय आ गया है पूरानी रश्मि जो इतनी वर्षों में गुम हो गयी थी आज लौट आई। अपनी बेटियों के भविष्य की खातिर ; रश्मि माँ के पास जाकर बोली सीमा कितनी बदल गई है ना माँ ….. हाँ बिटिया मास्टरनी जो बन गई है ! कमाती है, उसे किसी का डर क्यों होगा किसी पर निर्भर भी तो नहीं है; बड़ी अच्छी किस्मत पाई है लड़की नें। अनजाने में रश्मि की माँ के मुँह से वह बात निकल गयी जो सीधे रश्मि को घायल कर गयी। रश्मि खीज भरे स्वर में बोली हाँ माँ बड़ी अच्छी किस्मत है उसकी; माँ वह किसी पर निर्भर नहीं है सच कहा तुमने पर …….. उस वक़्त जब पढ़ने लिखने की उम्र में आपने मुझे आगे और पढ़ने नहीं दिया; आज मैं जीवन में किस राह पर आ खड़ी हूँ? ये तो तुम देख ही रही हो ! मुझे आज अपने और अपने बच्चों के पालन पोषण के लिए आप लोगों पर आश्रित होना पड़ रहा है। मैं जानती हूँ आप लोग कुछ कहते नहीं, पर मैं सब समझती हूँ। रश्मि की भाभी बोली नहीं दीदी ये घर आपका भी है; यहाँ आपका हक है। इतना सुनते ही रश्मि बोली नहीं भाभी लड़की तो सदा से ही परायी होती है यह घर आपका है सिर्फ आपका । रश्मि की माँ के आँखो में अश्रुधारा बह निकली उन्हें भी अब बात समझ में आ चुकी थी; पर अब रश्मि के आँखों में ज़रा भी आँसू ना थे सिर्फ चेहरे पर बस एक तेज नज़र आ रहा था।

रश्मि बोली……मैंने फैसला कर लिया है माँ, मैं अब आप लोगों पर निर्भर नहीं रहूंगी । मै फिर से आगे की पढ़ाई पूरी करुँगी और नौकरी करुँगी मैं आत्मनिर्भर बनूँगी और अपनी बेटियों को भी जीवन में स्वावलंबी बनाउंगी । वर्षों से बीत रही लम्बी रात के बाद नया सवेरा हो चुका था, आज एक बार फिर रश्मि का आत्मविश्वास पूरी तरह जाग उठा था। फिर से वह उठ खड़े होने को तैयार थी । जीवन की उस कठिन राह पर अब वह अकेले नहीं थी अब उसका विश्वास उसके साथ था। कहते हैं न जब जागो तभी सवेरा !! आज रश्मि जाग उठी थी उसे कोई रोकने वाला नहीं था; अतीत को भुला वह एक नए भविष्य की ओर अग्रसर होना चाहती थी। मन में प्रतिज्ञा लिए रश्मि में अपनी आगे की पढ़ाई को जारी किया जिसमें उसका सफल होना तय था। अंधकार को ढकते हुए नया सवेरा उदित होने को आतुर था जिसमें रश्मि का भविष्य निहित था।

 

कहानी समाप्त !!


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