हिंदी कहानी – समाज

कृपया अपने मित्रों को भी Share करें

एक तरफ़ पहाड़ झाड़ियां तीन तरफ़ मैदानी इलाका, उस गाँव में गेहूँ मक्का से ज़्यादा बाग़-बागीचे तो कहीं अमरूदों के पेड़। खुशहाल गाँव के लोग एक दूसरे की अधिक से अधिक इज्जत करते जो गाँव का सरपंच कह दे, सारा गाँव उसे खिले माथे मान लेते। गाँव में लोग पशु-पालना बैलगाड़ीयाँ रखने में बड़ा उत्साह रखते खेती के लिए बढ़िया से बढ़िया बैल लाते और बेचते। सरपंच की लड़की गुरदेव कौर के विवाह में बीस दिन थे।

लोग बड़े उत्साह के साथ गेहूँ की कटाई करके वेहले हो गए। धर्मों हरदीप सिंह सरपंच को कह रहा था – क्या “चाचा, “गुरदेव का विवाह इतनी धूम-धूम के साथ करना है कि आस-पास इलाका में पता लग जाये, कि हम ने भी कोई विवाह किया है,” आगे से हरदीप कहने लगा “क्या धरमे अगर ईश्वर ने चाहा तो इसी तरह होगा, हम बाराती की जी भर कर सेवा करेंगे।

निश्चित समय सिर बाराती आए कुछ बाराती बैलगाड़ीयाँ पर और कुछ पैदल थे। बारात आने की सभी गाँव में ख़ुशी के साथ बारातियों को पाँच दिनों के लिए बारात को रखा गया। विवाह के रीति-रिवाज़ पूरे कर पाँच दिनों के बाद…!

हरदीप ने कहा “बारात कल को प्रातःकाल विदाई कर देंगे…
परन्तु बारातियों में से एक आवाज़ आई – सुनो, एक बंदा कह रहा था। “यार अगर हम पके हुए गर्मी के मौसम में आते तो हम आम चूस कर जाते।
यह बात हरदीप सिंह (सरपंच) ने सुनी, बहुत निर्माता के साथ कहा – क्या हम बारातियों को दो महिनें और रखेंगे।
लड़के के पिता दादा ने बारातियों को पूछा और वह मान गए; उन्हें ने पूरे दो महीने जी-जान के साथ सेवा की।

आम पकने शुरू हो गए, गाँव के लोग रोज़ चार-पाँच टोकरे भर के बाराततियों को दे जाते।
महीनो के बीत जाने के बाद, दूल्हे और पिता व दादा ने पूछा “हम अब जाना चाहते हैं, हरदीप ने बहुत निर्माता के साथ गुरदेव कौर को विदा कर दिया।

बारात चलने के बाद हरदीप को याद आया, आगे कच्चा रास्ता ख़राब है। उन की बैलगाड़ीयाँ फँस जाएंगी, हरदीप बारात के पीछे कस्सी लेकर चल पड़ा, अभी कुछ दूरी पर जा रहा थी कि उनकी बैलगाड़ीयाँ आगे जा कर फंस गई..!
हरदीप जब थोड़ा सा पास पहुँचने वाला था तो कुछ बाराती गालियों निकाल रहे थे ” सालों ने इतने-इतने भार कर भेज दिए, सालों को पता था की फँस जाएंगी, एक कस्सी तक नहीं दी।

हरदीप यह सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ, अब हरदीप के मन में बहुत तरह के विचार आ रहे थे, कभी तो यह सोचता, कि यह कितने घटिया लोग हैं, कभी वह यह सोचता कि मुझे इतना कुछ करने के बाद भी गालीयां ही पड़ीं” ।
वह सोचता और मन ही मन बड़बता कि “मेरे घर गुरदेव न पैदा हुई होती तो, मुझे यह कुछ न सुनना और देखना न पड़ता..!

Samaj-Hindi-Kahani-Story

उसदिन हरदीप ने सारे गाँव को इकट्ठा किया और कहने लगा “हम बारातियों की इतनी सेवा की, हमें एक रस्सी के बदले बाराती ने जी भर कर गलियां निकाली। अब सभी ने यह बात सुन कर बड़ा दुख महसूस किया।
एक बंदो में से एक ने कहा – “लड़कियाँ ही हमारी बेइज़्ज़ती का कारण हैं जब भी किसी के घर लड़की पैदा हुई, उसे मार कर शमशान में दबना शुरू करो।
सभी गाँव ने यह मान लिया और कह दिया “जो भी लड़की को ज़िंदा रखने की कोशिश करेगा, उसे गाँव में से बेदख़ल कर दिया जायेगा। गाँव के लोगों ने यह रीति-रिवाज़ अपनाना शुरू कर दिया।

परन्तु ‘धरमें’ नाम का व्याक्ति अपने मन में सोचता कि जो गाँव में बारात लेकर आए वह घटिया किस्म के लोग होंगे। जिन को यह नहीं पता था की इज्जत के बदले इज्जत किस तरह दी जाती है !!
परन्तु मन में सोचता हमारे घटिया समाज की सोच कारण हमारे गाँव की लड़कियाँ बली चढ़ रही हैं। हमारा गाँव पहले कितना ख़ुशहाल था पर मन ही मन वो अपने ख़यालों को दबा लेता ।

वक्त आया, कि धरमे का भी विवाह हो गया…
कुछ समय बाद धरमे की घरवाली माँ बनने वाला थी। अब धरमे के मन में डर पैदा हो गया, अगर मेरे घर लड़का पैदा हुआ तो कोई बात नहीं, परन्तु अगर लड़की पैदा हुई तो हम उसको जीते-जी किस तरह अपने हाथों के साथ मरागें ?
“ज़िंदगी और मौत तो पैदा करने वाले के हाथ में हैं, हमें किसी को मारने का कोई हक नहीं; अब धरमें को इस बात की फिक्र दिन रात रहती।

दिन आ गया, जिस दिन का धरमे को डर था…
उसके घर लड़की पैदा हुई, आस-पास सब को पता लग गया। सब लोगों ने धरमें को लड़की मारने को लेकर दबाव बनाने लगे।
धरमें ने आपनी घरवाली के हाथ में से लड़की को छीनने की कोशिश की…उस समय धरमे की एक न चली, वह चुप कर गया।

अगले दिन धरमें ने अपनी घरवाली से आँख चुरा कर…लोगों के डर से लड़की और रस्सी लेकर श्मशान की तरफ ले चल पड़ा।
गाँव के लोग गला दबाकर, मारकर, ज़मीन में दबा देते थे….! परन्तु धरमा गला अपने हाथ के साथ दबाने में असमर्थ रहा..!

धर्मों खड़ा होकर, गड्ढा खोदने लगा…
एक हाथ में लड़की, एक हाथ में रस्सी के साथ गड्ढा खोदने लगा।
लड़की का मुँह चूमा… उसका शरीर गड्ढे में रखा, बेजान शरीर के साथ मिट्टी डालने लगा…

थोड़े सी मिट्टी डालने के बाद धरमे ने देखा…
उसने जो चादर लगाई हुईं है उसका एक सिरा गड्ढा में दब गया है धरमे ने मिट्टी निकाली, उस ने देखा…..!
उसकी चादर का एक कोना, उसकी बेटी ने मज़बूती के साथ पकड़ा हुआ था..!

धरमे ने किसी की परवाह न करते हुए अपनी लड़की को घर पर ले अाया..! गाँव के लोगों ने उस के साथ बोलना चालना छोड़ दिया और उसे ताने मारते रहते…! धरमा मेहनत के साथ खेती करता और अपना गुज़ारा करता ।

समय बीतता गया..
गाँव के बाकी घरों में बरकत भी जाने लगी…सबके घर दुःख का माहौल बनने लगा।

इधर धरमा की लड़की अब काफ़ी बड़ी होती गई….
धरमे का घर गाँव और घरों की अपेक्षा, सबसे खुशहाल होता गया….!
धरमे ने किसी की परवाह न की…!!

जब धरमा थका हारा घर अाता उस की बेटी उस के लिए कभी लस्सी ले कर अाती, कभी उसके साथ नादानी भरी बातें करती और हंसी हंसाती ।
वह अपनी घरवाली को हमेशा कहता “इित्थे सब अापनी किस्मत का लेकर अाउुदे हैं, देने वाला तो परमात्मा है, इस का नसीब इस के साथ है ” ।

धीरे-धीरे धरमे की ख़ुशहालभरी ज़िंदगी का प्रभाव गांव के अन्य लोगों पर भी पड़ने लगा। अब धरमे के घर की शक्ल ही बदल गयी उसके घर में बरकत और ख़ुशहाली आने लगी थी। अब गाँव के लोग को धरमें का घर देखकर अक्ल आने लगी।

जो लड़की को मारते थे, वह अब बंदे बन गए ।
उहनें को पता लग गया बेटिया को मारना कितना बड़ा गुनाह है। समाज के लोग जो बेटिया के साथ गलत विवार करते हैं, वह ज़मीर के कितने घटिया लोग होते हैं आप सोच सकते हैं।

सभी गाँव ने धरमें से प्रेरणा ली और इकठ्ठा होकर फिर से कसम खाई..!
“हम आज के बाद कसम खातें हैं, लड़की को मरने नहीं देंगे, जो पीछे कर चुके हैं, वह कभी नहीं दोहरायेंगे।
गाँव के लोग अब लड़के लड़कियों में कोई फ़र्क नहीं करते। गाँव जो ऊज्जड़ चुका था, अब खुशियों का खेड़ा बनकर सामने आया…!

लड़कियों के बिना तो समाज का अस्तित्व ही नहीं।
क्योंकि समाज का संचालन ही लड़कियां करती हैं क्या उनके बिना मर्द का कोई वजूद बचेगा ? विचारणीय है।

लेखक:
संदीप कुमार नर बलाचौर


कृपया अपने मित्रों को भी Share करें
कृपया नीचे अपना Comment जरूर दें :