‘टॉफियां’ एक हिंदी कहानी

‘बचपन’ कितना प्यारा होता है, हमारा बचपन । ना किसी बात की चिंता और ना ही जिम्मेदारी; सिर्फ खिलौनों , खेल तमाशों , चॉक्लेट व् टॉफियों में ही बीत जाया करता है नटखट बचपन। छोटी – छोटी बातों पर खुश होकर फिर रूठ जाना यही तो बचपन की निशानियां हैं । स्कूल से आते ही खेलने दौड़ जाना , देर शाम को आकर डांट सुनना फिर मुस्कुराना । माँ से मनपसंद चीजों के लिए जिद करना और खाने में सब्जिओं को देखकर मुँह फेर लेना ; खिलौनों चॉक्लेट टॉफी के बिना तो बचपन की कल्पना भी नहीं कर सकते यही सब तो भाता है बच्चों को । बिलकुल भोला और भावुक सा बचपन होता है सभी बच्चों का; पर कई बार उस अबोधावस्था में भी बच्चे मनोभाव को समझते हैं, वे अपनीं भावनायें न बोलते हुए भी व्यक्त करते हैं जिनकी शायद हम वयस्क परवा भी नहीं करते ।

सभी बच्चों की तरह ऐसा ही नीता का बचपन भी था । नीता , उसके पिता रामजी वर्मा, उत्तरप्रदेश के एक से छोटे से गांव रामपुर के निवासी थे । वह एक किसान थे उनका मुख्य व्यवसाय खेती ही था । नीता की माँ गृहिणी थी, उनकी एक पुत्री ‘नीता‘ 6 वर्ष व एक पुत्र ‘मोनू‘ जो की अभी केवल 4 वर्ष का था । नीता के दादा जी का निधन हो चुका था पर दादी अभी भी जीवित थी ।

टॉफियां एक हिंदी कहानी

एक दिन हाथो में सामान का थैला लिए नीता मोहन बाबा की दुकान कि तरफ दौड़ती हुई जा रही थी । दादी के दिए हुए रुपयों को हाथो में कस कर पकड़े वह मोहन बाबा की दुकान जा पहुंची । उसने देखा कि बाबा की दूकान पर तो बहुत ही भीड़ है फिर भी उसने पीछे से ही बाबा को आवाज लगाई बाबा …. बाबा मुझे सामान पहले दे दो, दादी राह तांकती होंगी; मुझे डांट खानी पड़ जायेगी दादी से अगर देरी हुई सामान ले जाने में तो। पर मोहन बाबा शायद भीड़ में ग्राहकों की लेनी देनी के शोर में नीता की आवाज सुन ना पाए । फिर क्या, नीता वहीँ दुकान के बाहर बने चबूतरे पर बैठ गयी । मन ही मन वह किसी बात से बहुत खुश थी, बार – बार वह उठकर दुकान में भीड़ को झांकती और बैठ जाती ; बहुत जल्दी थी उसे आज सामन लेने की । मंद – मंद मुस्कराते हुए दादी की कही बातों को वह याद कर रही थी जो दादी ने उसे पर्ची थमाते हुए कहा था कि नीता ये ले पर्ची और रूपये जरा मोहन बाबा कि दुकान से यह सामान तो ला दे और जो कुछ पैसे बच जाएं उसके अपनी कोई पसंद वाली टॉफीयाँ ले लेना । अरे भाई इसी बात की तो जल्दी थी नीता को, कि कब वह सामान ले और उसे टॉफियां खाने को मिलें । नीता ने देखा कि दूकान में अब भीड़ काफी कम हो गयी है केवल एक दो ग्राहक ही बचे हैं । वह झट से उठी और मोहन बाबा को पर्ची थमाते हुए बोली बाबा ये लो पर्ची और जल्दी से मुझे सामन दे दो , देर हो रही है … मुझे मुँह बनाते हुए बोली; बाबा भी बोले देता हूँ देता हूँ पढ़ तो लूँ क्या लिखा है तेरी दादी नें। बाबा नें पर्ची में लिखे सभी सामान एक – एक करके नीता को दे दिया और उसने झट से सारा सामन थैले में डाल लिया । नीता नें हाथ आगे बढ़ाते हुये दुकानदार से कहा यह लो बाबा पैसे जितने हुए काटकर बचे पैसे वापस कर दो। उसकी बातों को सुनकर मोहन बाबा भी मुस्कुरा उठे और बोले क्यों री…नीता आज जल्दी किस बात हो रही है तुझे ? हमेशा तो तेरी बातें ही ख़त्म ना होती थीं पर आज तो बस तेरी गाड़ी ही छूटी रही है जैसे। यह ले तेरे बचे पैसे पूरे 2 रुपये ; हाथो में नीता पैसे लेते हुए खुश होकर बोली अरे बाबा जरा वह खट्टी-मिट्ठी वाली टॉफियां देना 2 रूपये में पूरी 6 आएँगी ना ? बाबा उसकी बात समझ गए और हंस पड़े, बोले हां री 6 ही आएँगी। तू तो बहुत पक्की है हिसाब की, अब मैं जान गया क्यों तेजी हो रही थी तुझे यह ले अपनी खट्टी – मिट्ठी टॉफियां पूरी 6 की 6 हैं गिन ले । नीता टॉफियों को लेकर बहुत खुश हुई और सामान का थैला लिए वह टॉफियों को हाथ में ही थामे घर की ओर चल पड़ी ।

रास्ते भर वह टॉफियों को ही बार-बार गौर से देख रही थी गिन भी रही थी । एक ….. दो ….. तीन ….. चार ….. पाँच और पूरी 6 टॉफियां । कभी उसका मन करता कि वह कुछ टॉफियां रास्ते में ही खा ले फिर सोचती नहीं नहीं आराम से घर जा कर खाउंगी । फिर कभी हिसाब लगाने लगती की दादी आधी टॉफी तो मोनू को दे देंगी और आधी मुझे । यही हिसाब लगाते हुए वह घर पहुंची, और दादी के पास जाकर बोली ये लो दादी आपका सामान बड़ा भारी लगता है यह सामान का थैला । अब ना जाउंगी सामान लाने कभी ; ये भी लो 2 रुपये बचे थे तो मैंने उसकी 6 टॉफियाँ ले ली । यह कहते हुए नीता नें सारी टॉफियों को लालच भरी नजरों से देखते हुए दादी के हाथ में दे दिया ।

दादी नें आवाज लगाते हुए कहा …… मोनू लल्ला, इधर तो आना देख नीता क्या लाई है । मोनू सुनते ही दौड़ कर आया और दादी नें टॉफियों को लेकर गिनते हुए सभी 6 टॉफियां मोनू के हाथ में थमा दी । मोनू ने झट से एक टॉफी खोली और फट से मुँह में डाल कर खाने लगा और नीता टॉफियों को सिर्फ देखती ही रह गयी मानों उसकी कोई बहुमूल्य चीज छीन ली गई हो उससे । उदासी भरे मन से , मोटे – मोटे आंसुओं को आँखों में लिये नीता यह सब देख रही थी , तभी दादी बोली तू क्या चुप-चाप खड़ी है ? जा तेरी माँ तुझे बुला रही थी कोई काम पड़ा होगा । नीता भावुक हो अपनी आँखों में आंसू भरे कमरे में जाकर माँ की गोद में बैठ गयी और रोने लगी। माँ के पूछने पर भी उसने कुछ ना कहा , मन ही मन सोचती रही कि अगर मैं मोनू (लड़का) होती तो सारी टॉफियां मुझे खाने को ही मिलतीं ।