चिंटू चायवाला

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चिंटू उम्र 6 वर्ष, शरीर पर धूल-मिट्टी लगाए घर में घुसते हुए माँ…ओ माँ..सुन ना! माँ मुझे भी पढ़ना है, स्कूल जाना है पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनना है। रामवती (चिंटू की माँ) आश्चर्य से चिंटू की ओर देखते हुए!! क्या बोल रहा हैं, कौन बोला तुझको को ये सब, पढ़ना हैं बड़ा आदमी बनना हैं ??

वो माँ, जिस स्कूल के सामने मैं गुब्बारे बेचता हूं उसके मास्टर जी ने बोला..!
गुब्बारे खरीदने को आये थे वो पूछे कि तुम इतने छोटे हो, स्कूल नहीं जाते और उन्होंने बताया मैं पढूंगा तो बड़ा आदमी बनूँगा।
रामवती बोली, देख चिंटू हमको खाने पहनने को भी परेशानी है। हम झोपडी में रहते हैं, मैं रास्ते से कबाड़ इक्क्ठ्ठा करती हुं, सेठ को बेचती हूं तब जाकर कुछ पैसे आते हैं तेरे तीन छोटे भाई बहन हैं।

रामवती आगे बोलते हुए – तेरे बाबा तो इस दुनियां में अब हैं नहीं। घर का खर्च निकालना मुश्किल हैं तो पढ़ने के लिए पैसे कहा से आएंगे ?
ये सब बड़े लोगो की बात हैं हम गरीब आदमी हैं बेटा। तू काम पर ध्यान दिया कर, तू बड़ा है समझदार है घर तुझको संभालना है आगे।

चिंटू 6 वर्ष की छोटी आयु में भी माँ की बातों को समझ रहा था। वह चुप-चाप चला गया; शायद वह सच मे घर का बड़ा था।
समय बीतता गया चिंटू बड़ा हुआ और स्थितियां भी कुछ-कुछ बदल गई। चिंटू स्कूल में पढ़ तो नही पाया पर जीवन के स्कूल में उसने खूब मन लगाकर पढ़ाई की। …कई छोटे बड़े काम किये जैसे अखबार बेचना, गाड़ियां साफ करना, घूम-घूम कर प्लास्टिक का सामान व छुटपुट खिलौने बेचना आदि।

chintu-chaiwala

आज चिंटू 16 वर्ष का है, उसकी खुद की चाय और समोसों की दुकान है और वह उसका मालिक।
चाय गरम चाय, चिंटू की स्वादिस्ट चाय और समौसे। चिंटू मजे से आज भी चाय बेचने में मगन था तभी चाय की दुकान के सामने एक गाड़ी रुकी। गाड़ी में से स्कूल यूनिफार्म में 4 लड़के उतरे, जिनकी उम्र 15, 16 वर्ष रही होगी।

चिंटू की दुकान पर जाकर बोले, चिंटू सबको चाय पिला और वो सब एक जगह इक्क्ठे बैठ गए।
सिगरेट की डब्बी निकाली और वो सभी सिगरेट पिने लगे। चिंटू यह सब देख रहा था, चाय लेकर गया और बोला तुम लोगों को शर्म नहीं आती!!
तुम लोगों की सिगरेट पिने की उम्र है ??…चिंटू ने उन लड़कों से गुस्से में यह कहा।

स्कूल टाइम पे छुट्टी मार के तुम लोग गलत काम करते हो सिगरेट पीते हो, पढ़ लिख के कुछ बनने का नहीं है क्या ?
इतने बड़े स्कूल में पढ़ते हो, तुम लोग पढोगे नहीं तो क्या करोगे ??

भला एक चाय वाले के ताने वो लड़के कैसे बर्दास्त करते –
सिगरेट के धुँए उड़ाते…उन लड़को में से एक बोला !!
ज्यादा ज्ञान मत बाँट अब तू हमको सिखाएगा क्या बनना हैं हमें !! हमारे माँ बाप का पैसा है, हम पढ़े या ना पढ़े तेरा क्या जाता है।
तेरे को पैसा चाहीये ये ले कितना हुआ चाय का ?? बोल और दे दें क्या तुझे ? ले और पैसा ले ले !!

नहीं, नहीं तुम लोग जाओ यंहा से..पैसा नहीं चाहीये मुझे – चिंटू ने कहा।
लड़के चिंटू का मजाक उड़ाते हुए बोले, चल-निकल चाय वाला होकर हमको आर्डर देता हैं।
चल भाग यंहा से, हम लोगों को यंहा बैठने दे। चिंटू खामोश हो गया और खुद को एक छोटा सा चाय वाला जान वह वापिस अपना काम करने लगा।

चिंटू कोई छोटा इंसान नही था,
चिंटू अशिक्षित होकर भी उन लड़कों से बेहतर था समझदार था सफल था। चिंटू का इस उम्र में इस मुक़ाम पर पहुंचना कोई छोटी बात नहीं।
ना जाने ऐसे कितने ही चिंटू हैं जो छोटी सी उम्र में भी अपने घर के बड़े भी हैं समझदार भी हैं। जो पढ़ना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, परंतु जीवन की विपरीत परिस्थियों की वजह से कुछ नहीं कर पाते। और जंहा लोगों की पररिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं वंहा प्राप्त सुविधाओं की कद्र नहीं होती।

क्या सिर्फ स्कूल में जाकर किताबी ज्ञान प्राप्त कर लेने भर से इंसान शिक्षित होता जाता हैं ?
और क्या सिर्फ पैसों से हम अपने बच्चे को जीवन मे सफल बना सकते हैं ?

हम बहुत आधुनिक हो चुके हैं, एकल परिवार में रहते हैं। माता पिता दोनों ही कार्यरत रहते हैं खूब पैसे कमा भी रहे हैं। किन्तु उनको स्वयं के बच्चों के लिए भी समय नही हैं। ना ही वे अपने बच्चों को जीवन की सीख दे पा रहे हैं।
अगर आज के माता पिता अपने बच्चों को कुछ दे रहे हैं तो – सिर्फ पैसा और पैसों से खरीदी गई चीजें।
आज जहां हम बच्चों को सारी सुविधाएं मुहैया कराते हैं, अच्छे स्कूल में पढ़ाते हैं सब कुछ उनके बोलने से पहले ही उनके सामने रख देते हैं।
वंही कुछ लोगो की परिस्थियां ऐसी भी होती हैं की उनकी आधारभूत आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पाती !!
हम आज जीवन के आधारभूत मूल्यों को अपने बच्चों को सिखाने में असफल होते जा रहे हैं और अपने बच्चों को असक्षम भी बना रहे हैं।

जरूरी है कि हम उन्हें हर चीज का महत्व बतायें। अपने मेहनत से कमाए गए पैसों का मूल्य व शिक्षा का महत्व समझायें।
लोगो का सम्मान करना सिखायें, जीवन मे आवश्यकताओं का मूल्य समझायें, काम का महत्व समझायें, जिम्मेदार बनायें, विनम्र व संस्कारी बनायें और हम स्वयं भी उनके समक्ष उदाहरण बनें क्योंकी वह जितना कहने से नही सीखेंगे उससे कहीं ज्यादा हमें देखकर ही सीखेंगे।

लेखिका:
रचना शर्मा


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