कैसे बनेगा हमारे सपनों का भारत ?

कैसे बनेगा हमारे सपनों का भारत

सन 1948 से लेकर अब तक भारतवर्ष की प्रगति पर अगर ध्यान दें तो देश में मूल सुविधाओं में कुछ खासा बदलाव नहीं आया है। आज़ादी के 70 वर्षों के बाद भी अगर हमारे नेता अपनी चुनावी सभाओं में बिजली, पानी, दूध, अनाज, तेल, सड़क, यातायात, नौकरी, व्यवसाय, स्कूल, कॉलेज व् सुरक्षा इत्यादि की बातें करते हैं तो यह यकीन हो जाता है कि भारत 70 वर्षों में भी नहीं बदला। 2016 तक के आंकड़ों को अगर हम ध्यान से देखें तो भारत की कुल आबादी 1.324 Billion जान पड़ती है; यह बात गौर करने योग्य है कि इतनी बड़ी आबादी वाला देश 21वीं सदी में आकर भी अपने देशवासियों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मुहैया करा सका। क्षेत्रफल की दृष्टिकोण से भारत दुनियां का सातवां सबसे बड़ा देश होने के बावजूद महज अपने 4 महानगरों तक ही सिमित रह गया है। विकास और उन्नति के नाम पर सिर्फ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई के अलावा हमारे पास कुछ नहीं है। यह भी सत्य है कि अन्य कुछ शहर भी समय के साथ आगे बढे हैं पर वे वही शहर हैं जो महानगरों से सटे हुए हैं। पर हिन्दुस्तान तो गांव में बसता है, छोटे छोटे शहरों में बसता है वहां के विकास और उन्नति का क्या? इसमें कोई गुरेज नहीं है की इसके लिए देश की राजनीति जिम्मेदार है।

आज देश में मौजूद किसी भी युवा, पुरुष या स्त्री से यह सवाल करें की क्या वे सभी देश के हालात से खुश हैं तो उनका जवाब होगा ना !! देशवासियों का 70 वर्ष की आज़ादी के उपरांत भी खुश न होना देश की राजनिति पर सवाल खड़ा करता है। विगत 70 सालों में हमने तमाम राजनितिक दलों का बनना और बिखरना देखा पर देश वहीँ का वहीँ रहा। चुनावी सभाओं और नारों में समाज कल्याण, विकास एवं भाईचारे की बातें करने वाले हमारे राजनेता, चुनाव उपरांत फिर वही जोड़ तोड़ की राजनिति में लीन हो जाते हैं।

देश में अबतक कुल 1700 से भी ज्यादा राजनितिक दल बन चुके हैं। ये सभी दल बदलाव और विकास के नारों के साथ आगे बढे, पर सब ने एक जैसा ही काम किया। अपने अपने वर्चस्व को लालाहित ये सभी राजनितिक दल जाति, धर्म, अमीर, ग़रीब के आधार पर समाज को निरंतर तोड़ते आये। गौर किया जाय तो भारत जो अपनी भिन्नताओं के लिए प्रसिद्ध था आज वही भिन्नताएं अभिशाप बन गयीं हैं। मैं मैं मैं…..के पेंच में फंसा आम नागरिक भी कम दोषी नहीं है; 70 वर्षों के छलावे के बाद भी आम नागरिक नहीं बदला। सिर्फ राजनेताओं को देश की बर्बादी का जिम्मेदार ठहरना पूर्णतः उचित नहीं होगा क्योंकि उन राजनेताओं की नींव हम आम नागरिकों नें ही रखी है।

स्वयं के अधिकार की मांग करता भारतीय समाज असल में अपना विभाजन करता जा रहा है और यही विभाजन राजनेतओं की राजनिति का केंद्र बिंदु हैं। वक़्त आ गया है कि हिन्द समाज भी देश की तरक्की व् उन्नति में अपना योगदान दे ताकि अपने समाज को एकजुट और मजबूत बनाया जा सके। धार्मिक विभाजन के बाद जातिगत विभाजन देश की अखंडता को कमजोर बनाता जा रहा है। अपने ही समाज या आस पड़ोस में देखें तो आम नागरिक का बिखराव साफ़ झलकता है जो कहीं न कहीं समाज की एकता और समृद्धि को लगातार चोट पहुंचा रहा है। कौन है इन सबका जिम्मेदार? क्या सिर्फ नेता?….सिर्फ नेताओं के ऊपर दोषारोपण कर हम अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकते।

“सपनों का भारत” हम सबकी की जिम्मेदारी है। देश का नागरिक होने के नाते खुद के कर्तव्यों को नहीं झुठलाया जा सकता। समाज अपने अधिकार की मांग करते करते आज सिर्फ चुनावी सभावों की भीड़ बन कर रह गया है; समय अब मांग कर रहा है कि हम खुद को नेताओं का पिछलग्गू बनने से बचायें। जनमानस को अगर विकास व् तरक्की के रास्ते पर लाना है तो हमें स्वयं इसकी पहल तेज़ करनी होगी। अपने अपने कौशल और ज्ञान के हिसाब से समाज में उपस्थित पिछड़े वर्ग, ग़रीब लाचार व्यक्ति, आर्थिकरूप से कमजोर लोगों की सहायता के लिए आगे आना होगा। सहायता का अर्थ उनको पैसे मुहैया कराना नहीं बल्कि उनको निःस्वार्थभाव से अपनी सेवाएं प्रदान करना।

कुशल शिक्षक अपनी दिनचर्या में से कुछ वक़्त निकालकर ग़रीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे, डॉक्टर सप्ताह में एक दिन अपनी तरफ से कमजोर लोगों के लिए निःशुल्क चिकित्सा दे, वकील एक दिन अपनी फीस की चिंता छोड़ असहायों की पीड़ा को समझे, समाज का बड़ा व्यापारी या कारोबारी निर्धन लोगों को रोजगार मुहैया कराये, शहरों में रहने वाले हुनरमंद पुरुष और महिलाएं गाँव का भी ख्याल रखें वे अपने हुनर को गांव में रहने वाले लोगों को भी समझाएं ताकि उन्हें भी काम मिल सके। ऐसे ही कई प्रकार की सहायताएं हम अपने समाज को प्रदान कर सकते हैं; सिर्फ जरूरत है तो एक निष्ठाभाव की, कर्मभाव की। देश में सामाजिक पिछड़ेपन का कारण नेता तो हैं ही पर आखिर हम अपने कर्तव्यों से क्यों दूर भाग रहे हैं? क्या ये इतना मुश्किल है की हम समाज की सेवा नहीं कर सकते।

सपनों का भारत सिर्फ एक वाक्य नहीं एक दृष्टिकोण है जिसको अंजाम तक पहुँचाना हम सभी का दायित्व है। जिस दिन आम नागरिक का मददगार एक आम नागरिक होगा उस दिन कोई नेता हमारे साथ छलावा नहीं कर पायेगा। कुर्सी को विरासत मान उन नेताओं को समझाना होगा की सुधर जाओ वरना हम तुम्हारा वजूद मिटा देंगे। असल में एकता ही समाज की ताकत है; अगर हम यूँ ही चुनावी सभा के भीड़ बनते रह गए तो “सपनों के भारत का निर्माण” सिर्फ एक सपना बनकर ही रह जायेगा।

 

लेखक:
प्रेम कुमार यादव