कन्या भ्रूण हत्या – निबंध विचार

कृपया अपने मित्रों को भी Share करें

कन्या भ्रूण हत्या अर्थात मादा भ्रूण को गर्भ में ही खत्म कर देना। उसकी सांसों का फैसला क्यों उसके जन्म लेने से पहले ही सुना दिया जाता है ? क्या लड़की होना अभिशाप है !! क्यों उसे कोख में ही मार दिया जाता है ? कुछ लोग इस हद तक भी क्रूर होते है कि जन्म के बाद भी कन्या शिशु की हत्या करने में पीछे नही हटते। आखिर कब तक मरती रहेंगीं बेटियाँ? आज जब एक तरफ हम चाँद और मंगल की दूरी तय करने की समर्थता रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की दूषित मानसिकता हमारे देश में अभी तक जीवित है।

Shishu-Bhrun शिशु भ्रूण हत्या

जनगणना सन 1901 के अनुसार,
भारत में लिंगानुपात – प्रति एक हजार 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 972 थी।

जनगणना सन 2001 के अनुसार,
भारत में लिंगानुपात – प्रति एक हजार 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 933 थी।

सेंसस, ऑफिस फॉर नेशनल स्टेटिस्टिक्स यूनाइटेड किंगडम 2011 के अनुसार,
भारत में लिंगानुपात – प्रति एक हजार 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 943 थीं।
ग्रामीण इलाकों में 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 949 थीं।
शहरी इलाकों में 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 929 थीं।

यूनाइटेड नेशन के आंकड़ों 2019 के अनुसार,
भारत में लिंगानुपात – प्रति एक हजार 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 930 हैं।

सन 1901 से लेकर वर्तमान वर्ष 2019 के आंकड़ों पर नज़र डालें तो हम साफ देखते हैं की भारतीय समाज अभी भी कितना पिछड़ा है। अमूमन तौर पर इस परंपरा के वाहक अशिक्षित समाज व ग्रामीण इलाकों में रहने वाले सामान्य लोगों समझा जाता था किन्तु आंकड़े शहरी लोगों की पोल खोलते नज़र आते हैं। स्वयं को शिक्षित मानने वाला, सदा हाई फाई बातें करने वाला, मॉर्डन लिबास पहनने वाला, बड़े अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों से शिक्षा ग्रहण करने वाला अत्याधुनिक शहरी समाज ‘ कन्या भ्रूण हत्या’ के अपराध में ज्यादा लिप्त नज़र आता है। किन्तु यहां प्रश्न कौन ज्यादा और कौन कम का नहीं है प्रश्न है केवल ‘कन्या भ्रूण हत्या’ आखिर अभी भी क्यों जारी है !

kanya-bhrun-hatya-essay-nibandh-hindi
कन्या शिशु भ्रूण हत्या

आपको बताना चाहूंगी की भारत के सर्वाधिक समृद्ध राज्य दिल्ली , पंजाब और हरयाणा में स्त्री लिंग अनुपात पुरुषों के मुकाबले काफी कम है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के शिक्षा स्तर में सुधार तो हुआ है किन्तु शिक्षा भी लोगों के विचार बदलने में नाकामयाब रही।शायद हमारी भोगवादी शिक्षा प्रणाली ही दोषी है जो 100 वर्षों के उपरांत भी समाज के ज्ञानचक्षु को खोल पाने में असमर्थ है।

बेटी को बोझ मानना, उसके होने पर दुःखी रहना, उसके जन्म को सम्मान घटोत्तरी का परिचायक समझा जाना। कब तक इस तरह की सोच के आगे अनेक बेटियों से उनकी साँस लेने का अधिकार छीना जायेगा। लड़कों को प्राथमिकता देता यह पुरुषप्रधान समाज यह क्यों भूल जाता है की यदि बेटी ही नही रहेगी तो कैसे बचेगा इस संसार का अस्तित्व ! कौन देगा बेटों को संसार देखने का अधिकार !!

कन्या शिशु भ्रूण हत्या की मुख्य वजह है बालिका शिशु पर बालक शिशु की प्राथमिकता। लड़के को आय का स्त्रोत माना जाता है, मान वृद्धि का कारण माना जाता है जबकि लड़की को केवल उपभोक्ता के रूप में ही लिया जाता है। आज के दौर में यह सोच पूरी तरह गलत है आज लड़कियाँ भी परिवार को सहयोग कर रही हैं माता-पिता के सम्मान में वृद्धि का कारण बन रही हैं।

पुरुषवादी भारतीय समाज के मानसिक विकार और तकनीकी उन्नति के कारण कन्या भ्रूण हत्या में तेजी से बढ़ावा हुआ। पछले तीन दशकों में बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण हत्या के कुप्रभाव गिरते लिंगानुपात और विवाह योग्य लड़कों के लिए वधुओं के आभाव में सामने आये हैं। कन्या भ्रूण हत्या ने बुराई की एक श्रृंखला को जन्म दिया है। लड़कियो को अगवा करना, उत्पीड़न, बलात्कार आदि इसी से जुडी कड़ियाँ हैं जिससे समाज मुख नहीं मोड़ सकता।

कानून इसे आपराधिक गतिविधि के अंतर्गत रखता है। कानूनी रूप से देखें तो भारतीय दंड संहिता के प्रावधान के तहत कई नियम और क़ानून भी बनाये गए हैं। पर केवल कानून बना देना सामाजिक बुराई का अंत नही हो सकता। जब तक विचारों में नवीनता नहीं आएगी ऐसे अपराध दोहराये जाते रहेंगे।

हमारे देश में महिलाओं के प्रति भेदभाव आम बात है खास तौर पर कन्या के प्रति उपेक्षा हमारे समाज में जड़ों तक धसी है। आम जनता को महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध भेदभाव रखने वाली प्रथाओं के उन्मूलन के लिए संवेदनशील बनने की तत्काल आवश्कयता है।

बेटियाँ बोझ नहीं हैं अपितु इस संसार का सार हैं, दुनियां का अस्तित्व उन्ही से है। बेटियों को बचाएँ, सस्नेह पोषित करें और पढ़ाएँ। आज हर क्षेत्र में बेटियाँ अपना और खुद से जुड़े हर व्यक्ति का नाम रौशन कर रहीं हैं, जीत का परचम फहरा रहीं हैं। बेटी की उम्मीदों को ख्वाबों को पाँव तले न रौंदीए, उसमे हौसला भरकर तो देखिये, उसे भी वह खुला आकाश चाहिए जहाँ वो स्वच्छन्द साँस ले सकें। एक हाथ आशीष भरा उसके सिर पर भी फेर कर देखिये वह भी बेटे से कम नही हैं, यह बात वो हर रोज़ सिद्ध करके दिखा देगी ।

लेखिका:
शाम्भवी मिश्रा


कृपया अपने मित्रों को भी Share करें