भारतीय समाज Indian Society – भारत और समाज Archive

सरल बनें सहज नहीं

इस बात में कोई संदेह नहीं कि आपको बचपन से ही यह सिखाया होगा कि आपका स्वभाव अत्यधिक सरल होना चाहिए और कई हद तक यह बात सच भी है या फिर यूँं कहें कि यह बात पूर्णतः सत्य है। आप जितना सरल रहेंगे आपका जीवन उतनी ही सरलता से व्यतीत होगा। एक सरल

जब भी बोलें उचित बोलें

संसार में अपने भाव व्यक्त करने का सबसे मूलभूत आधार है संप्रेषण। यह समस्त मानव विकास की आधारशिला है। अमूमन हर शख्स 3 साल की उम्र तक बोलना सीख लेता है। लेकिन कब, कहाँ, कैसे और कितना बोलना है, यह गुण सीखने के लिए उसे सारी उम्र का फ़ासला भी कम पड़ जाता है।

आप क्या बनना चाहते हैं ?

आप क्या बनना चाहते हैं यह सब सम्पूर्ण रूप से आप पर ही निर्भर करता है। कामयाब हो जाना और एक बेहतर इंसान बन पाना दोनों में बहुत फर्क है। अमूमन हर शख्स ही जिंदगी के दायरों को हासिल कर ही लेता है, जो जिंदगी को जिंदगी बनाने के लिए काफी है। एक अच्छी

क्योंकि यह ज़िंदगी है

ज़िंदगी, यह जितना खूबसूरत लफ्ज़ है शायद उतना ही जटिल भी या यूँ कहें कि हम इसे जटिल बनाने पर उतारू होते है, उन परिस्थितियों को उत्पन्न करते हुए जो वास्तव में आधार शून्य हैं; या फिर जिनको भ्रम की आधारशिला प्रदान कर दी गई हो। फिर इस पथ पर साहस, दृढ़ निश्चय और

भ्रष्टाचार का स्वभाव- एक कष्टकारक रोग समान

भ्रष्टाचार क्या है? मनुष्य एक सामाजिक सभ्य और बुद्धिमान प्राणी है उसे अपने समाज में कई प्रकार के लिखित, अलिखित नियमों अनुशासनों और समझौतों का उचित पालन और निर्वाह करना होता है। उस से अपेक्षा होती है कि वह अपने आचरण को संतुलित और नियंत्रित रखें। इसके विपरीत कुछ भी करने पर वह भ्रष्ट

सुप्रीमकोर्ट की बचकानी नसीहतें

देश का सर्वोच्च न्यायालय यानी “सुप्रीमकोर्ट” जिसकी पहचान किसी से छिपी नहीं है। सुप्रीमकोर्ट वो जगह है जहाँ कोई फरियादी अपनी अंतिम आस लेकर पहुँचता है। यह कहना गलत नहीं होगा की देश के सर्वोच्च न्यायालय नें हर सच्चे फरियादी को न्याय दिया है, ऐसा बहुत कम ही देखने को मिला है कि सुप्रीमकोर्ट

कैसे बनेगा हमारे सपनों का भारत ?

सन 1948 से लेकर अब तक भारतवर्ष की प्रगति पर अगर ध्यान दें तो देश में मूल सुविधाओं में कुछ खासा बदलाव नहीं आया है। आज़ादी के 70 वर्षों के बाद भी अगर हमारे नेता अपनी चुनावी सभाओं में बिजली, पानी, दूध, अनाज, तेल, सड़क, यातायात, नौकरी, व्यवसाय, स्कूल, कॉलेज व् सुरक्षा इत्यादि की

सचिन बनेगा क्या ? खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब

सचिन बनेगा क्या ? “खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब” ये कहावत भारत जैसे विशाल देश में खासी प्रचलित है । क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और जब भी किसी किसान का बच्चा खेलने के बारे में सोचता भी था तो उसे इसी कहावत के आधार पर खेलने से

महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता उनका अधिकार है

आर्थिक स्वतंत्रता एक ऐसी स्वतंत्रता है जिससे व्यक्ति में आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता स्वयं ही आ जाता है और व्यक्ति अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने तथा अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम होता है फिर चाहे वह लड़का हो या लड़की । आज यंहा मैं सिर्फ महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के बारे में अपने

कामयाबी सफलता कैसे प्राप्त करें, बाहर निकालें नाकारात्मक विचारों को

समाज में भांति-भांति के लोग हैं, सबकी अपनी इच्छाएं हैं सबकी अपनी कामनाएं हैं। जहाँ तक भारतीय समाज कि बात की जाय तो यह देखने में आता है कि लगभग सभी लोग एक जैसी ही ज़िन्दगी जी रहे हैं। घर में अच्छा कमाने वाला एक व्यक्ति जिसके ऊपर घर , परिवार , बीवी व्